समय की मांग है अफोर्डेबल हाउस…..

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अफोर्डेबल  हाउसिंग की डिमांड कितनी?   
हाल ही में एक सर्वे के द्वारा यह बात सामने आई है कि 2020 तक भारत में करीब  40 मिलियन अफोर्डेबल  रेंज के मकान की ज़रूरत होगी। रियल एस्टेट जानकारों का मानना है कि जिस तेज़ी से आम आदमी के माली हालात में सुधार हो रहा है, उससे घर की मांग और बढ़ेगी और इस सेग्मेंट की घर की आपूर्ति न होने से डिमांड और सप्लाई का गैप और बढ़ेगा। इस समस्या को कैसे निपटा जाए इसके लिए न तो डेवलपर्स कुछ सोच रहे हैं और न ही सरकार। ऐसे में स्थिति और गंभीर होगा और रहने के लिए एकमात्र विकल्प झुग्गी-झोपड़ी ही होगा। इससे जहां स्वास्थ और सर्वभौमिक विकास में बाधा आएगी वहीं विकसित देश बनने का सपना भी पूरा संभवत: नहीं हो जाएगा।

समस्या का समाधान क्या है?
समस्या विकराल रूप अख्तियार कर ले उससे पहले इसका निदान ज़रूरी है। डेवलपर्स ज़मीन की बढ़ी हुई कीमत, रॉ-मैटीरियल और लेबर कॉस्ट का दुहाई दे कर सस्ते प्रोजेक्ट बनाने में असर्मथता जता रहे है। पर एक बात गौर करने वाली है कि आज जो भी टाउनशिप या प्रोजेक्ट डेवलप किए जा रहे है। उसमेें वल्र्ड क्लास की सुविधा उपलब्ध हो, इस पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। पर आज भी हमारे देश में  50 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ एक छत की ज़रूरत है, जिसमें वह रहकर ढंग से अपना रात गुजार सके। उनके लिए न तो जीम ,न ही गोल्फ कोर्स , न ही मॉड्यूलर किचन, न ही खास प्रकार के इंटीरियर, न ही पार्क और क्लब की ज़रूरत है। वातानुकूलित और 24 ऑवर पॉवर बैकअप तो दूर की बात है। ज़रूरत है तो बस एक छत और दो कमरे की, जिसमे वे अपना एक छोटा सा परिवार को रख सके। फिर ये डेवलपर्स तमाम तरह के सुविधाओं के ताम झाम से क्यों अनायास ज्यादा कीमत लोगों पर थोप रहे हैं।  यदि डेवलपर्स आज भी एक साधारण प्रोजेक्ट डेवलप करे तो वह बड़े ही आसानी से 15-25 लाख में हर किसी को उनके सपने का आशियाना उपलब्ध करा सकते हैं।  इस गंभीर मुद्दे पर सोचने की ज़रूरत है और समय रहते इसका निदान हो, जिससे सबका भला हो। ऐसा न हो कि समाज का एक तबका अपने को आसमान में बैठा पाए और दूसरा पताल में।

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