आगरे का किला

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Photo Credit -http://famousplacesinindia.in

आगरे के किला वास्तु का अनुपम उदाहरण पेश करता है। भारतीय वास्तु शैली के साथ ईरानी वास्तु शैली का अनोखा संगम इसे अद्भूत रूप प्रदान करता है। इस किला का मुगल काल में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से काफी महत्व था। यहां से प्रमुख मुगल शासकों ने देश में राज किया था। उस समय देश की राजधानी आगरा होने के कारण यह किला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

आगरा किले के निर्माण के पीछे उस समय की राजनीतिक कारक मुख्य भूमिका निभाया थी। अकबर मात्र 14 साल की उम्र में ही भारत की गद्दी पर बैठा। उस समय आगरा देश की राजधानी थी, इसलिये सुरक्षा के मद्देनज़र और साम्राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिये उन्होंने आगरा किले को एक नये सिरे से निर्माण करवाया। इसे वर्ष 1565 से लेकर 1573 के मध्य बनाया गया। इस किले के समकक्ष ही दिल्ली में हुमायूं का मकबरा का निर्माण हुआ था। यह मूल रूप से ईंटों का किला था। इस किले पर प्रारंभ में सीकारवार राजपूतों का अधिकार था। इस बात का जिक्र 1080 ई. में इतिहासकारों ने किया है। बाद में महमूद गजनवी की सेना ने इस पर कब्ज़ा कर लिया था। आगरा का किला लोधी वंश के शासन काल के समय ध्वसत मिट्टी  के अनियमित स्वरूप में था, जो किले की दीवार को बरकरार रखा था। कालान्तर में यह किला सुरक्षा की लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा। लोधी वंश का प्रथम शासक और दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान सिकंदर लोधी आगरा के किले में रहा करता था। इस स्थान से उसने देश पर शासन किया। सिकंदर लोधी ने आगरा को देश की राजधानी बनाया। उसकी मृत्यु इसी किले में 1517 ई. में हुई थी। सिकंदर लोधी की मृत्यु के उपरान्त उसके पुत्र इब्राहिम लोधी ने नौ वर्षों तक राज किया। उसने अपने शासन काल में यहां कई स्थान पर मस्जिदें व कुएं बनवाये थे। इब्राहिम लोधी को प्रथम मुगल शासक और मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध 1526 ई. में जब हराया तो मुगलों ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया। उस समय किले पर अधिकार के बाद मुगलों को खूब संपत्ति हाथ लगी थी। कहा जाता है कि उस संपत्ति में सबसे मूल्यवान कोहिनूर हीरा भी मुगलों को मिला था। यहां पर मुगल शासक अकबर, जहांगीर, शाहजहां के समय लाल पत्थर और उजले संगमरमर से कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य किये गये, जो किला को काफी आकर्षक और सुन्दर बना दिया। इस किले का आकार मानव कान की संरचना से काफी मिलता-जुलता है। इसकी दीवार उसके परिधि से 20 मीटर ऊंचा और 2.5 मीटर चौड़ा है। किला खाई से घिरा हुआ है। अकबर के समय यह किला सेना के अंग का रणनीतिक हिस्सा होने के साथ-साथ राजशाही महल भी था। अकबर के बाद इस किले में जहांगीर और शाहजहां के समय कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्य कराये गये। यहां का ज्यादातर निर्माण कई वास्तु शैलियों का मिश्रण है। किले में कई वास्तुशिल्प को अपने अंदर समाहित करने के कारण, इसकी भव्यता और सुन्दरता दोनों बढ़ गयी है। उदाहरण के तौर पर जहांगीर महल जिसे अकबर ने बनबाया था। यह महल इस्लामिक और हिन्दू वास्तु शैलियों का अनोखा संगम है। यहां कई और निर्माण मिश्रित शैलियों के युग्म से बना है, जो इसे काफी आकर्षित बनाता है। इस किले को भारतीय वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है, जो मुगल काल के स्थापत्य कला को यह एक नये कलेवर और फ्लेवर में प्रस्तुत करता है। यमुना के दांये किनारे पर बसी इस विश्व धरोहर इमारत को लोधी वंश के शासकों ने कई महत्वपूर्ण रूप दिये थे। इसे आगरे का लाल किला भी कहा जाता है। इस प्रसिद्ध स्मारक के लगभग 2.5 किमी. उत्तर-पश्चिम में विश्व प्रसिद्ध ताजमहल स्थित है। इसे लोग प्राय: चहारदीवारी से घिरी नगरी कहते हैं। यहां प्रसिद्ध मुगल शासक पूरे भारत पर यहीं से शासन किया करते थे। शासन के केन्द्र में होने के कारण यहां राज्य का सर्वाधिक खज़ाना, सम्पत्ति व टकसाल थी। यहां विदेशी राजदूत, यात्री व उच्च पदस्थ लोगों का आना-जाना लगा रहता था। इस स्थान की गौरवपूर्ण सभ्यता और संस्कृति में यह किला चार चांद लगाता है। मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने इस किले को अपने आधिपत्य में करने के बाद यहां एक बावली बनवायी। आगरे के इसी किले में 1530 ई. में मुगल सम्राट हुमायूं का राजतिलक भी हुआ। हुमायूं 1540 ई. में बिलग्राम के प्रसिद्ध युद्ध में शेरशाह सूरी से हार गया। इसके बाद सूर वंश का संस्थापक और शंहशाह शेरशाह का इस किले पर कब्ज़ा हो गया। इस किले पर अफगानों का कब्ज़ा पांच वर्षों तक रहा। पानीपत के द्वितीय युद्ध 1556 ई. में मुगल शासक बाबर ने दिल्ली के शासक हेमू को पराजित करने के बाद यह किला पुन: मुगलों के अधीन आ गया। इस स्थान की केन्द्रीय स्थिति को देखते हुये अकबर ने इसे अपनी राजधानी बनाना निश्चित किया। यहां वे 1558 ई. में आये। अकबर के समकालीन इतिहासकार अदुल फज़ल के शब्दों में ”यह किला वस्तुत: एक ईंटों का किला था, जिसका नाम बादलगढ़ था। यह तब खस्ता हालत में था। इसी कारण अकबर को इसे दोबारा बनवाना पड़ा था। उन्होंने इसे लाल बलुआ पत्थर से बनवाया। इसकी नींव प्रसिद्ध वास्तुकारों ने रखी थी। इसे अंदर से ईंटों से बनवाया गया और बाहरी आवरण के लिये लाल बलुआ पत्थर लगवाया गया। इसके नये रूप को बनाने में चौदह लाख, चौवालीस हजार कारीगर व मज़दूरों ने आठ वर्षों तक मेहनत की।”
मुगल शासक शाहजहां ने इस स्थल को वर्तमान स्वरूप दिया। उसने किले के निर्माण के समय, कई पुरानी इमारतों व भवनों को तुड़वा भी दिया, जिससे कि किले में कई इमारतें भी हैं, जहां पर शाहजहां ने श्वेत संगमरमर और सोने व कीमती रत्न जड़वाए।
सोमगढ़ युद्ध जो 1658 ई. में हुआ था, उसके बाद औरंगजेब ने इस किले को अपने अधीन करके , वहां पानी सप्लाई को बंद करवा दिया था। चूंकि शाहजहां कुंए का पानी नहीं पीता था, इसलिये नदी के पानी को औंरगजेब ने जब बंद करवा दिया तो उसने औरंगजेब की अधीनता स्वीकार कर ली। जीवन के अंतिम दिनों में शाहजहां को उसके पुत्र औरंगजेब ने इसी किले में बंदी बनाकर रखा था। एक ऐसी सजा, जो कि किले के महलों की विलासिता को देखते हुए उतनी कड़ी नहीं थी। यह भी कहा जाता है कि शाहजहां की मृत्यु किले के मुसम्मन बुर्ज में ताजमहल को देखेते हुए हुई थी। इस बुर्ज के संगमरमर के झरोखों से ताजमहल का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखता है। बंदी के रूप में शाहजहां यहां पर आठ साल तक रहा और 1666 ई. में उसका देहांत हो गया।
1638 ई. में शाहजहां ने औपचारिकता रूप से आगरा से देश की राजधानी दिल्ली बना दिया था। उसके बाद शाहजहां दिल्ली में ही रहने लगा। उसके निधन के बाद आगरा ने अपनी वैभवशाली चमक खो दी। औरंगजेब ज्यादातर समय दक्षिण के युद्ध में ही व्यस्त रहा। हालांकि कुछ समय के बाद यहां की रौनक फिर लौटने लगी। औरंगजेब यहां पर रहने लगा और राज कार्य भी यहीं से संचालित करने लगा। यहां पर दरवार फिर से सजने लगा। यहां के दीवान-ए-खास में औरंगजेब शिवाजी से 1666 ई. में मिला था। इस मिलन के समय में ही औरंगजेब शिवाजी को गिरफ्तार करना चाहता था लेकिन शिवाजी चालाकी से यहां से भाग निकले। औरंगजेब के 1707 ई. में निधन हो जाने के बाद मुगलों का पराभव शुरू हो चुका था। उसके बाद उत्तरोतर मुगल शासकों के बीच इतनी शक्ति नहीं रह गयी थी कि इस किले की महानता और गौरव की रक्षा कर पाते। मराठा और  जाट के शासकों ने कुछ दिनों तक देश की इस शान की रक्षा की। लेकिन वे भी अंग्रेज़ों के चाल से निपट नहीं पाये और अंतत: 1803 ई. में मराठा से अंग्रेज़ों ने इसे छीन लिया। उसके बाद अंग्रेजों ने इस किले का उपयोग सैनिक छाबनी और अस्त्र-शस्त्र के रूप में किया। इस किले से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी जुड़ा हुआ है। प्रथम भारतीय स्वत्रंता संग्राम 1857 ई. के समय यह किला युद्ध स्थली भी बना। इस प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के कारण ही भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य समाप्त हुआ। उसके बाद लगभग एक शताब्दी तक ब्रिटेन का भारत पर सीधे शासन चला और उसके बाद 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली।

                                                   जहांगीर महल

Jehangir’s Place, built by Akbar for his son Jehangir. In front is Hauz-i-Jehangir, a huge bowl carved out of a single block of stone, possibly used for bathing.

Third Party Imageजहांगीर महल पहला उल्लेखनीय भवन है जो अमर सिंह प्रवेश द्वार से आने पर अतिथि सबसे पहले देखते हैं। यहां से आप जब दांयी ओर बढ़ते हैं, तो पवित्र दरगाह की ओर चले जाते हैं। महल के अहाते में हरित क्षेत्र से अच्छादित अच्छा खासा बड़ा लॉन है, जहां रहकर आप प्रकृति से अपने को करीब पाएंगे। अकबर ने इस महल का निर्माण राज घराने के औरतों के रहने के लिये करवाया था। यह स्थान जनाना घर के नाम से भी जाना जाता है। यह महल अपने में सादगी को लपेटे हुये सुन्दरता की एक बेहतर मिसाल है। इसे बालू पत्थर के द्वारा बनबाया गया था। लेकिन यहां पर जो निर्माण वर्तमान में दिख रहा है, उस में से कुछ ही निर्माण ऐसे बचे हैं, जिसका अकबर के देखरेख में निर्माण हुआ था। इस महल के सिर्फ जनाना कक्ष women’s quarters  ही वर्तमान में अस्तित्व में है, जिसका निर्माण अकबर ने करबाया था। इस महल की वास्तुशिल्प में सबसे सुन्दर भाग महल से लगे खम्भे को पत्थरों के द्वारा सहारा देकर अलंकृत किया जाना है। इमारत के सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी सजावटी पत्थर द्वारा महल के बीम (धरन)को मज़बूती प्रदान करना है। वास्तव में इस प्रकार के वास्तुशिल्प और तकनीकी का प्रयोग सर्वप्रथम इसी महल में हुआ है, बाद में देश के अन्य महत्वपूर्ण इमारत में इसकी नकल की गयी। जहांगीर महल के सामने पत्थर से बना एक बड़ा कटोरा आकार का जलपात्र भी है, जिसमें संभवत: नहाने के लिये गुलाब जल रखा जाता था। महल में ईरानी शैलियों के वास्तुकला का प्रयोग जहांगीर ने करवाया था। इस शैली ने महल की बाहरी सुन्दरता को और भी निखार दिया था। आगरा किले में स्थित जहांगीर महल का निर्माण अकबर ने कराया था। आगरा किले में यह सबसे बड़ा आवासीय भवन है। इस भवन में हिन्दू और एशियाई वास्तुकला का बेहतरीन मिश्रण देखने को मिलता है। अकबर ने जहांगीर महल के पास अपनी मनपसंद रानी जोधा बाई के लिए एक महल का निर्माण भी कराया था।

दीवान-ए-आम                             Third Party Image

जब आप किले की उत्तर की तरफ आप रूख करते हैं, तो आप दीवान-ए-आम से रूबरू होते हैं। इसे दी हॉल ऑफ पब्लिक ओडियन्स यानि आम जनता के दरबार के नाम से जाना जाता था। यह स्थान मछ्छी भवन के सामने स्थित है। दीवान-ए-आम पहुंचने के लिये आपको नीचे लगे सीढियों  का सहारा लेना होगा। यह मुगल बादशाह का प्रमुख सभागार था। यहां पर मयूर सिंहासन या तख्ते ताउस स्थापित था। दीवान-ए-आम का प्रयोग आम जनता से बात करने और उनकी फरियाद सुनने के लिये होता था। यहां पर मुगल बादशाह अपने अधिकारियों से भी मिलते थे। प्रारंभ में इसके ढ़ांचे का निर्माण मूल रूप से लकड़ी से किया गया था। बाद में मुगल शासक शाहजहां ने उसे वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। यहां पर शाहजहां शैली के प्रभाव को स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यहां पर लगे संगमरमर पर की गई फूलों की नक्काशी ने इसकी सुन्दरता को काफी आकर्षक बना दिया है। यहां से एक रास्ता नगीना मस्जिद और महिला बाजार की ओर जाता है, जहां केवल महिलाएं ही मुगल औरतों को सामान बेच सकती थीं। इस सभागार की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि प्रवेश करने वाले को कोई नहीं देख सकता था लेकिन तख्ते ताउस पर बैठा शंहशाह प्रवेश करने वाले शख्स को आसानी से देख सकते थे। यहां पर उपस्थित सभा जन के हर एक गतिविधि को राजा तख्ते ताउस से आसानी से देख सकता था। लेकिन यहां प्रवेश करने वाले को यहां उपस्थित जन नहीं देख पाते थे क्योंकि पीछे मुडऩे पर कोई  न कोई पीलर सामने आ जाता था। लेकिन उपस्थित सभा जन जो सभागार के दांये या बांये ओर होते थे, उनको सिंहासन पर बैठा शंहशाह दिखाई देती थी। यहां की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस सभागार में जहां मयूर सिंहासन था, उसके ठीक दीवार में जालीनुमा खिड़की लगी हुयी थी, जो दूर से या नज़दीक से दिखाई भी नहीं देता था लेकिन इस जालीनुमा स्थान के पास राजघराने की महिलाएं दरबार की हरेक गतिविधियों को देख सकती थी। जब शाहजहां अपनी राजधानी आगरे से हटाकर दिल्ली कर दिया तो इस तख्ते ताउस को दिल्ली के लाल किले में ले आया। जिसे कालान्तर में ईरानी शासक और लुटेरा नादिरशाह लुटकर ले गया।

शीश महल

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किले का एक महत्वपूर्ण बिल्डिंग शीश महल है, जो मुस्समन बुर्ज  के विपरित दिशा में है। यह महल दीवान-ए-खास के नीचे है। यह स्थान देश के उन चुनिंदा स्थानों में आता है, जहां पर शीशे के द्वारा बेहतर सजावट की गयी है। यह राजघराने की महिलाओं का ड्रेसिंग रूम था। महल की दीवारों पर छोटे-छोटे शीशे के आइने गढ़े हुये थे । इस महल को ग्लास मौजेक करके सजाया गया था। यह अलंकारिक रूप से शीशे से सजाया गये महलों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर था। यह महल वस्तुत दो बड़े हॉल्स के मिलने से बना है। इन दोनों बड़े हॉल्स की लंबाई 11.15 मीटर और चौड़ाई 6.40 मीटर है। ये दोनों ग्लास हॉल्स बड़े मेहराब के सहारे महल के केन्द्र से जुड़े हुये हैं । यह महल दोनों तरफ से एक संर्कीण गलियारे की ओर खुलता है। शीश महल के हमाम के अंदर सजावटी पानी की अभियांत्रिकी का उत्कृट उदाहरण है।
                                                         दीवान-ए-खास

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यह सभागार शीश महल की दांयी ओर स्थित है। शंहशाह इस सभागार में राज कार्य और अन्य कामों के लिये वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक करते थे। यह इनका व्यक्तिगत सभागार था। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह महल संगमरमर रंगसाजी का उत्कृष्ट नमूना है। सभागार की आंतरिक और गृहमुख पर बेहतर नक्काशी की गयी है। यहां पर संगमरमर की पीलरर्स को बेहतर अलंकारिक रूप में सजाया गया है। शाहजहां द्वार निर्मित पूरी तरह से संगमरमर का बना हुआ खास महल विशिष्ट हिन्दू -इस्लामिक शैली में है। दीवान-ए-खास को बादशाह का सोने का कमरा या आरामगाह भी माना जाता था। खास महल में सफेद संगमरमर की सतह पर चित्र कला का सबसे सफल उदाहरण दिया गया है।
                                                                    मुसम्मन बुर्ज
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यह खास महल की बांयी ओर स्थित है। इसका निर्माण शाहजहां ने कराया था। यह सुंदर अष्टभुजी स्तंभ से अलंकारिक है। बुर्ज का खुलापन ऊंचाइयां और शाम की ठण्डी हवाएं इसकी कहानी कहती है। यही वह स्थान है जहां शाहजहां ने ताज को निहारते हुए अंतिम सांसें ली थी
                                                            ले-आउट डिज़ाइन
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Third Party Image इस किले की रूपरेखा काफी प्रभावित करने वाली है। यहां भारतीय संस्कृति के कई रूप और रंग देखने को मिलते हैं। हिन्दू, इस्लामी सभ्यता और कला के संयोग से बना यह किला बरबस ही किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। यह गंगा-यमुना संस्कृति का अनुपम सौगात है। इस किले में शहर की ओर का दिल्ली द्वार भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है, जिसे हाथी पोल कहते हैं, जिसके दोनों ओर दो पाषाण हाथी की मूर्तियां हैं। इन पाषाण मूर्तियों पर रक्षक भी खड़े हैं। द्वार से खुलने वाला एक पुल है, जो खाई पर बना है। इसमें लगा दरवाजा इसे अजेय बनाता है। इस किले का दिल्ली गेट और लाहौरी गेट प्रसिद्ध है। लाहौरी गेट को अमर सिंह गेट भी कहा जाता है। स्मारक स्वरूप दिल्ली गेट, सम्राट का औपचारिक द्वार था, जिसे भारतीय सेना द्वारा वर्तमान में पैराशूट ब्रिगेड हेतु प्रयोग किया जाता है। किले के उत्तरी भाग को छाबनी रूप में प्रयोग किया जा रहा है। इसी कारण यह जन साधारण हेतु नहीं खुला है। यहां आने वाले पयर्टक लाहौर गेट से एंट्री ले सकते हैं। इस गेट के बारे में कहा जाता है कि इस गेट का ‘मुख’ पाकिस्तान स्थित लाहौर की तरफ होने के कारण इसे यह नाम दिया गया था। स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से यह स्थल अति महत्वपूर्ण है। प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फज़ल लिखते हैं कि यहां लगभग पांच सौ सुंदर इमारतें बंगाली व गुजराती शैली में बनी हैं। कई इमारतों को श्वेत संगमरमर से बनाने के लिये पहले की कई इमारतों को खत्म भी किया गया। अधिकांश निर्माण को अंग्रेजों ने 1803 से 1862 के बीच बैरेक बनवाने हेतु तुड़वा दिया। वर्तमान में दक्षिण-पूर्व की ओर मुश्किल से तीस इमारतें शेष हैं, इनमें से दिल्ली गेट, अकबर गेट व बंगाली महल है। जहांगीर ने अकबर दरवाजे का नाम बदलकर अमरसिंह द्वार कर दिया था। यह द्वार दिल्ली-द्वार से मेल खाता हुआ है। दोनों ही लाल बलुआ पत्थर के बने हैं। यहा स्थित बंगाली महल भी लाल बलुआ पत्थर का बना है। अब यह दो भागों (अकबरी महल व जहांगीरी महल) में बंटा हुआ है। यहां हिन्दू और मुस्लिम स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने देखने को मिलते हैं। निर्माण की स्थापत्यकला में इन दोनों संस्कृतियों के मेल किले की खूबसूरती को और भी बढ़ा देते हैं। किले में अजदहे, हाथी व पक्षी, इस्लामी अलंकरणों में ज्यामितीय नमूने, इबारतें, आयतें आदि फलकों की सजावट में दिखाई देती हैं। इसके ऐतिहासिक महत्व का देखते हुये इसे वर्ष 1987 में यूनेस्को ने विश्व विरासत की सूची में शामिल कर लिया।

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