लीज होल्ड या फ्री होल्ड प्रॉपर्टी की परिभाषा समझ कर ही खरीदें प्रॉपर्टी

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रियल एस्टेट की दुनिया में लीज होल्ड या फ्री होल्ड शब्द काफी मायने रखते हैं। ये प्रॉपर्टी के मालिकाना हक की स्थिति को दर्शाते हैं। यानि ये प्रॉपर्टी के टाइटल से संबंन्धित होते हैं। यह सभी तरह की प्रॉपर्टी जैसे- प्लॉट, उस पर बनी बिल्डिंग, डीडीए या अन्य अथॉरिटी के फ्लैट, ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी फ्लैट, इंडिपेंडेंट फ्लोर आदि पर लागू होते हैं।

लीज होल्ड या फ्री होल्ड प्रॉपर्टी का मतलब

लीज होल्ड प्रॉपर्टी का मतलब होता है कि प्रॉपर्टी का मालिकाना हक कुछ समय के लिए ही खरीदार को ट्रांसफर किया जाता है। यह समय कुछ हफ्तों या महीनों का न होकर, कई दशक या सैकड़ों साल का होता है। आमतौर पर 99 साल की लीज की जाती है। यह समय सीमा पूरी होने के बाद मालिकाना हक दोबारा पहले पक्ष के पास चला जाता है। इस तरह की प्रॉपर्टी का टाइटल कभी भी क्लियर नहीं कहा जा सकता। इस तरह की प्रॉपर्टी की डील लीज डीड के माध्यम से की जाती है। डीड का रजिस्ट्रेशन खरीददार के नाम से ही होता है, लेकिन लीज का टाइम पूरा होने के बाद इसका रिन्यूअल कराना पड़ता है। यहां हम कह सकते हैं कि इस तरह की प्रॉपर्टी बेची नहीं जाती, बल्कि लीज डीड के माध्यम से उपयोग करने के लिए दी जाती है। लीज होल्ड प्रॉपर्टी को किसी तीसरे पक्ष को सीधे नहीं बेचा जा सकता। इसके लिए पहले पक्ष (जैसे डीडीए) की अनुमति लेनी जरुरी है। इसके लिए कुछ फीस भी चुकानी पड़ती है। लीज होल्ड प्रॉपर्टी की डील सेल डीड के माध्यम से नहीं की जा सकती, इसलिए अधिकारों के ट्रांसफर के लिए जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी, स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी, एग्रीमेंट टू सेल, वसीयत आदि का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ को रजिस्टर्ड कराना जरूरी है, तो कई बिना रजिस्ट्रेशन के भी मान्य होते हैं।

कुछ महत्वपूर्ण बातों का ख्याल रखना भी जरुरी

सर्वप्रथम आप पावर ऑफ अटॉर्नी से डील करने से पहले वकील से इसके फायदे-नुकसान की पूरी जानकारी ले लें। कई पावर ऑफ अटॉर्नी प्रॉपर्टी बेचने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद अपने आप खत्म हो जाती हैं। ऐसे में स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी बनवाना ठीक रहता है। इसके बाद आप इसके लिखे गए प्रावधान पर भी गौर करें क्योंकि लीज होल्ड प्रॉपर्टी के इस्तेमाल पर मूल मालिक की ओर से कई तरह की बंदिशें लगाई जा सकती हैं, जो डीड में लिखी होती हैं। इनमें से किसी भी शर्त को तोडऩे पर लीज खत्म भी हो सकती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि लीज होल्ड प्रॉपर्टी के लिए होम लोन मिलना मुश्किल होता है। अगर मिला, तो फाइनैंसर उस पर फ्री होल्ड प्रॉपर्टी के मुकाबले ज्यादा ब्याज वसूल सकता है।

फ्री होल्ड प्रॉपर्टी के प्रावधान में प्रॉपर्टी का मालिकाना हक अनिश्चितकाल या हमेशा के लिए खरीददार को ट्रांसफर कर दिया जाता है। देश  में ज्यादातर प्रॉपर्टी का टाइटल फ्री होल्ड है, लेकिन जो जमीन सरकार के पास है, वहां पर लीज होल्ड प्रॉपर्टी का चलन ज्यादा है। इस तरह की प्रॉपर्टी का टाइटल क्लियर कहा जाता है। फ्री होल्ड की डील कन्वेंस या सेल डीड के जरिए पूरी की जाती है। इसके लिए संबन्धित राज्य में लागू स्टाम्प ड्यूटी चुकाकर डीड को सब रजिस्टार के ऑफिस में रजिस्टर्ड कराया जाता है। इसके बाद प्रॉपर्टी बेचने वाले का उस पर किसी तरह का कोई अधिकार बाकी नहीं रह जाता। इस प्रकार की प्रॉपर्टी को कभी भी तीसरे पक्ष को बेचा जा सकता है। इस पर कोई रोक नहीं होती। इसके लिए नए खरीददार के साथ सेल डीड साइन करके उसे सब रजिस्ट्रार के पास रजिस्टर्ड कराना होगा।

रखें इन बातों पर खास ध्यान

इस प्रकार की प्रॉपर्टी में जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी से डील की जाए या कन्वेंस या सेल डीड के जरिए प्रॉपर्टी का ट्रांसेक्शन, सभी पर लगभग एक जैसी ही स्टाम्प ड्यूटी चुकानी पड़ती है। इसमे महत्वपूर्ण बात यह है कि ज्यादातर बैंक और हाउसिंग फाइनैंस कंपनियां लीज होल्ड की तुलना में फ्री होल्ड प्रॉपर्टी पर लोन देना ज्यादा पसंद करते हैं। इस मामले में प्रॉपर्टी खरीदने से पहले डीलर या बिल्डर से टाइटल के कागज जरुर मांगे। गौर कर लें कि प्रॉपर्टी लीज होल्ड है या फ्री होल्ड। फ्री होल्ड प्रॉपर्टी के लिए रजिस्टर्ड कन्वेंस या सेल डीड होना जरूरी है, जबकि लीज होल्ड प्रॉपर्टी के मामले में लीज डीड, जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी जैसे कागज दिखाए जाएंगे।

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