फ्लैटस का बढ़ रहा है प्रचलन

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Mascot Patel Neotown

एक समय था जब लोगों की चाहत होती थी कि उनका एक बडा सा घर हो, उसमें खुला आंगन हो, कुछ पेड-पौधे और सैर-सपाटे के लिए भी पर्याप्त जगह भी मौजूद  हो। हांलाकि यह चाहत आज भी जीवित है और आज भी कई लोग प्लॉट खरीदकर मकान बनाने को तरजीह देते हैं लेकिन, शहरी इलाकों में तेजी से बढ रही आबादी और मकान बनाने के लिए कम हो रही जगह के कारण अब लोगों का रूख फ्लैटस की ओर बढ रहा है- इसकी दूसरी वजह प्लॉट्स की आसमान छूती कीमतें भी हैं।

दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में तो यह स्थिति और भी बदतर हो चुकी है, यहां अधिकतर लोग या तो किराए पर मकान लेकर रहते हैं या फिर बिल्डरों द्वारा तैयार किए गए फ्लैटस खरीदते हैं-प्लॉटस के लिए जगह तो लगभग समाप्त ही हो चुकी है बढती आबादी, विकास और बढती कीमतों के मिले जुले प्रभाव के कारण अब लोगों को फ्लैट कल्चर ही रास आने लगा है।
क्यों बढ रहा है चलन: भारत जैसे दिल्ली, मुंबई, जयपुर, नोएडा, गुडगांव आदि में पिछले दस वर्षों में जितने फ्लैट बने हैं इससे पहले कभी नहीं बने थे- इसका कारण बिल्डरों द्वारा लोगों की समस्या और जरूरत को समझते हुए मौके को भुनाया जाना है। दक्षिण दिल्ली स्थित एक प्रॉपर्टी डीलर सुरेश धींगडा का मानना है कि ‘पिछले कुछ सालों से दिल्ली में फ्लैटस का चलन इसलिए बढा है क्योंकि एक तो यहां मकान बनाने के लिए जगह नहीं बची ऐसे में शहर में बने-बनाए मकान को कौन नहीं खरीदना चाहेगा। दूसरे, फ्लैटों में उपलब्ध सुविधाएं भी लोगों को आकर्षित करती हैं।
शहरों में खाली पडी जमीन अब तेजी से घिरती जा रही है, इसमें शॉपिंग मॉल्स, स्टेडियम,अस्पताल, शिक्षण संस्थान और अन्य विकास कार्यों के लिए जगह खरीदी जा रही है। प्रॉपर्टी डीलर धींगडा के अनुसार ‘जब से दिल्ली में मैट्रो और फ्लाई ओवरों के काम ने जोर पकडा है तभी से विभिन्न विकास कार्यो में प्रगति हुई है, जिस कारण जिस जमीन की कीमत पहले तीन से चार हजार रुपए प्रति वर्गमीटर थी, वही अब बारह से पंद्रह हजार रुपए प्रति वर्गमीटर में बिक रही है।
इनमें क्या है खास :
 आकर्षक सुविधाएं- फ्लैटस की यही सबसे बडी खासियत होती है कि वहां आपको तमाम सुविधाएं आपके पहुंचने से पहले ही तैयार मिलती हैं, जिनमें पूरी तरह तैयार कमरे, बिजली और पानी का कनेक्सन व रहने के लिए पूरी तरह तैयार सुविधाएं शमिल है, वहीं प्लॉट खरीदकर मकान बनाने और उसमें अपनी जरूरतों के अनुसार तमाम सुविधाएं जुटाते समय धन और वक्त दोनों ही लगते हैं जिनका कि आज के समय लोगों के पास अभाव है।
रियल एस्टेट में  बढ रहे कम्पीटीशन के कारण भी अब कई नामी गिरामी बिल्डर अपने फ्लैटस में तमाम वह सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं जिनसे यह फ्लैटस किसी पॉश कॉलोनी से कम नहीं लगते। कुछ प्रमुख बिल्डर जैसे अंसल, जयपुरिया, डीएलएफ, ओमैक्स और गौडसंस जैसे बिल्डर अपने फ्लैटस में स्विमिंग पूल, स्र्पोटस ग्राउंड, क्लब और जिमनेजियम जैसी तमाम आकर्षक सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं।
एनसीआर के फ्लैटस तो इतने आधुनिक हैं कि इनमें अधिकतर एनआरआई ही रहना पसंद कर रहे हैं। हांलाकि इसके लिए उन्हें बहुत बडी रकम भुगतान करने पडते हैं। यह फ्लैटस अरेंज्ड व ऑथराइज्ड भी होता है। इन फ्लैटों में रोड मैप भी अवस्थित होता है, जिससे आप एक अव्यवस्थित शहर में कुछ तो सही पा ही सकते हैं। अब हरियााणा के धारूहेडा को ही लें, यहां बसाए जा रहे सेटेलाइट टाउन में आप शॉपिंग मॉल, हॉस्पिटल, स्कूल, बैंक, और तमाम बैंकों के एटीएम जैसी तमाम सुविधाएं पा सकते हैं।
सुरक्षा भी भरपूर- दिन-प्रतिदिन अपराध के बढ रहे ग्राफ को देखते हुए आजकल दिल्ली जैसे शहरों में जीना दूभर हो गया है, प्रत्येक व्यक्ति अपने घर के लिए सिक्युरिटी की व्यवस्था तो कर नहीं सकता जिसके चलते चोरी, डाका होने का डर सदैव बना रहता है-इसके विपरीत फ्लैटों में चौकीदार या सुरक्षा प्रहरी की व्यवस्था होती है- साथ ही घरों के आस-पास होने के कारण चोरी जैसी वारदात भी कम ही होती है, इस प्रकार सुरक्षा की दृष्टि से भी फ्लैट लोगों की फस्र्ट ‘वाइस बनते जा रहे हैं।
निवेश में भी फायदेमंद-रियल इस्टेट को फ्लैट निर्माण के चलते दिन दुगुना और रात चौगुना मुनाफा हो रहा हैं, धींगडा के अनुसार ‘ फ्लैट बनाने में बिल्डरों को दुगुने से भी अधिक का फायदा होता है। यदि कोई बिल्डर फ्लैट बनाने के लिए एक एकड जमीन एक करोड में खरीदता है तो उसमें वह करीब पचास फ्लैट बनाकर प्रत्येक को बीस लाख रुपए में बेचता है, ऐसे में आप स्वयं देख सकते हैं कि उसने कितना मुनाफा कमाया।
दूसरी ओर, फ्लैट खरीदने वाला व्यक्ति भी घाटे का सौदा नहीं करता उसे भी शहर में रहने के लिए वाजिब दाम में एक बढिया सा मकान मिल जाता है, इससे बढकर और क्या फायदा होगा और ऐसे मेें बेचने वाला भी खुश और खरीददार भी। केवल उद्योगपति और प्रॉपर्टी में निवेश करने वाले ही नहीं, बल्कि अब तो मध्यम आय वर्ग के लोग भी इन फ्लैटों की ओर कूच कर रहे हैं।
सवाल कीमत का: दिल्ली और एनसीआर की बात करें तो यहां पिछले पांच वर्षों से कीमतों में भारी उछाल आया है। मैट्रो और शॉपिंग मॉल्स के कारण न केवल प्लॉट बल्कि फ्लैटस भी काफी मंहगे हो गए हैं। फ्लैट की कीमत एरिया लोकेशन, बिल्डर और सुविधाओं के हिसाब से तय होती है-अमूमन दो बेडरूम के फ्लैट की कीमत बारह से बीस लाख रुपए के बीच रहती है। वहीं तीन बेडरूम या इससे ज्यादा के फ्लैट जिनका क्षेत्र एक हजार वर्गफुट तक है, औसतन ४५ से ६० लाख रुपए में बिक रहे हैं। धारुहेडा में इस समय कीमत जमीन की कीमत १५०० से २००० रुपए प्रति वर्ग फुट है जो निकट भविष्य में दुगुनी होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। हांलाकि यह कीमतें लोकेशन के अनुसार घटती-बढती भी रहती हैं। इस समय दिल्ली और एनसीआर यथा गुडगांव, गाजियाबाद, धारुहेडा के इलाके में फ्लैटस की कीमत आसमान छू रही है।
शहरों की चकाचौंध-फ्लैटस के बढ रहे चलन का सबसे महत्वपूर्ण कारण लोगों के शहर में रहने की तमन्ना भी है। दूसरे राज्यों से आए अधिकतर युवा जब राजधानी जैसे शहरी इलाकों में रहने लगते हैं तो वह भी यहीं बसने का ख्वाब देखने लगते हैं। आखिर देखें भी क्यों नहीं, आजकल युवा मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर रहे हैं जहां उन्हें मोटी रकम तन्ख्वाह के रूप में मिलती है, इससे वह आसानी से फ्लैट खरीद लेते हैं और अपनी चाहत पूरी करते हैं।
शहरों में एक वर्ग ऐसा भी है जो एक लंबे अर्से से यहां किराए पर जिंदगी बसर कर रहा है लेकिन अपना एक मकान पाने की हसरत भी मन में बिठाए रहता है। यह लोग अधिकतर रिटायरमेंट के बाद या फिर बचत के परिणामस्वरूप अंतत: फ्लैट के रूप में एक मकान हासिल कर लेता है। कुल मिलाकर इन सभी कारणों की वजह से शहरों में फ्लैट कल्चर को बढावा मिला है।
दूसरा पहलू भी-फ्लैटों में रहना और सुरक्षित भले ही हो, लेकिन सदैव आरामदायक और मनोनुकूल नहीं हो सकता। स्वनिर्मित मकान में रहने पर जितनी स्वतंत्रता हो सकती है उतनी फ्लैटस में नहीं होती। अकसर छोटी-छोटी बातों को लेकर फ्लैटस में लडाई-झगडे चलते रहते हैं। इनका कारण सीमित जगह होने के कारण हर कोई अपने हदबंदी कर लेता है ओर यदि ने किसी ने उसकी सीमा के अंदर अपना सामान रख दिया तो झगडा हो गया समझो।
फ्लैट देखने में भले ही भव्य और आकर्षक क्यों न लगते हों जब तक उनमें सुरक्षा के सभी उपाय न किए जाएं तो उनकी भव्यता भला किस काम की। मुनाफा कमाने के चक्कर में कई बिल्डर निर्माण के समय घटिया सामग्री का प्रयोग करके लोगों की जान-माल दोनों से खिलवाड करते हैं। भूकंपरोधी और अग्निशमन के तमाम उपाय करना भी बिल्डर का कर्तव्य बनता है।

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