डिमांड और सप्लाई के बीच बढ़ रही है खाई

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एनसीआर में नई आवास परियोजनाओं की संख्या को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल  तक एनसीआर में तकरीबन 5 से 6 लाख नए फ्लैट तैयार होंगे। 2 से 3 साल में परियोजनाएं पूरी होते ही  प्रॉपर्टी की कीमत  बढ़ भी सकती हैं। यहां पर निर्माण की दुनिया भले ही रफ्तार में हो लेकिन  कीमत के मामले एंड यूजर्स को चौंका ज़रूर रहा है। यहां पर डिमांड और सप्लाई के बीच खाई बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में यहां पर डेवलपर्र्स को प्राइस करेक्शन का दौर जारी करना ज़रूरी है। सूत्रों का कहना है कि कई रियल एस्टेट कंपनियों के प्रोजेक्ट्स में कम ग्राहक रूचि दिखा रहे हैं।

यहां पर जहां डेवल्पर्स को ऐसी स्थिति में प्रोजेक्ट्स पूरा करने के दवाब से दो-चार होना पड़ रहा है, वहीं उनका भविष्य की योजनाएं भी प्रभावित हो रही है। सही मायने में देखा जाय तो निकट भविष्य में इससे समस्याएं बढेंगी ही, घटेगी नहीं। इससे बचने का सबसे बेहतरीन तरीका है कि सभी डेवलपर्स मिलकर प्राइस को इस प्रकार से नियंत्रित करें कि उपभोक्ता की रूचि बढ़े। हालांकि यहां पर एक बात तो साफ है कि बढ़ती महंगाई के ग्राफ पर ही काफी हद तक कीमत की दुनिया को प्रभावित कर रखा है। इसे एक रणनीति के हिसाब से नियंत्रित करना शायद इतना आसान नहीं हो लेकिन कुछ बातें तो हकीकत के काफी करीब है, इसे समझ कर ऐसा करना ज़रूरी भी है। इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में यह स्थान नूतन काल में ढंग से नहीं आ पाया है। जब तक इसे व्यवस्थित नहीं किया जाता तब तक डेवलपर्स को कुछ खास तो सोचना ही होगा। यह बात तो दिगर है कि रियल एस्टेट में प्राइस करेक्शन, नए प्रोजेक्ट लॉन्च, कस्टमर इन्क्वायरी में बढ़ोतरी और सबसे बढ़कर अफोर्डेबल  हाउसिंग के मंत्र ने रियल एस्टेट मार्केट  को फिर उम्मीद दिखाई है। रियल एस्टेट सेक्टर भी यह समझ चुका है कि भारत में मध्यम वर्ग की संख्या सबसे ज्यादा है तो इसी पर फोकस करना पड़ेगा। कई सर्वे से यह बात साफ हो गया है कि रियल एस्टेट सेक्टर में अफोडेर्बल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की मांग लगातार बढ़ रही है।

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