घर लेते समय यह बात भी जानें

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घर का सपना हर एक किसी का होता है। इस सपने को पूरा करना इतना आसान नहीं है। खासकर, आज -कल की बढ़ती महंगाई में। लेकिन इसके साथ लोगों की आमदनी में भी अच्छी -खासी बढ़ोत्तरी हो रही है। घर लेना पहले जि़न्दगी  की अंतिम पड़ाव माना जाता था, पर आज के दौड़ में युवा पीढ़ी 30-35 साल के होते ही घर लेने के बारे में सोचने लगता है। इसके पीछे दुनिया का अर्थशास्त्र काम करता है। इन सभी बातों के साथ घर लेने के समय कुछ महत्वपूर्ण बातें भी काफी मायने रखती हैं- जानते हैं कैसे।

जि़न्दगी भर  की  जमा-पूंजी का सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में घर होता है। एक अदद आशियाने के सपने का सकार करना आज कल लोगों  का मुख्य ध्येय बनता जा रहा है। खासकर, इस माममे में युवा पीढी  तीस की उम्र के आसपास ही इसकी योजना बनाने लग ते हैं। स्मार्ट बैंकिंग  और हाउस लोन ने उनके इस सपने को पूरा करने के लिए ज़मीन भी तैयार की है। बड़े शहरों में मकानों और फ्लैट्स की एक सीमित क्षमता होने के चलते ऐसे लोगों  के लिए आसपास के इलाकों में जाने का विकल्प बचता है। लेकिन यहां कुछ महत्वपूर्ण बातों पर गौर करें तो आपका वर्तमान और भविष्य दोनों ही सुरक्षित रहेगा । जिस डेवलपर से आप फ्लैट लेने जा रहे हैं, सबसे पहले बाज़ार में उसकी विश्वसनीयता की जांच कर लें। उसने पहले कौन से प्रोजेक्ट तैयार किए हैं, ये ज़रूर देखलें। अगर फ्लैट्स निर्माणाधीन हैं तो यह पता कर लें कि इससे पहले उस डेवलपर ने अपने प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे किए या नहीं। उन प्रोजेक्ट्स में रहने वालों लोगों से मिलकर यह पता कर लें कि क्या उन फ्लैट्स में वे सारी सुविधाएं मौजूद हैं, जिनके वादे किए गए थे। यह भी पता कर लें कि वह डेवलपर ग्रुप  हाउसिंग  या टाउनशिप प्रोजेक्ट्स से जुड़ा हुआ है अथवा नहीं। डेवलपर की विश्वसनीयता जांचने के बाद कानूनी पहलुओं को देखना भी ज़रूरी है। एक डेवलपर को तमाम विभागों  जैसे, नगर निगम, वन, पर्यावरण आदि से इजाजत लेनी पड़ती है। यह देख लें कि उसकी लापरवाही की वजह से बाद में आपको किसी कानूनी पचड़े में न फंसना पड़े। इसके साथ ही यह भी जांच लें कि प्रोजेक्ट को बैंक से लोन मिला है या नहीं। दरअसल यदि बैंक ने लोन दिया है तो इसका मतलब यह होता है कि प्रोजेक्ट के लिए कानूनी औपचारिक ताएं पूरी कर ली ग ई हैं। यह भी ज़रूरी है कि प्रोजेक्ट निर्माणधीन होने की स्थिति में डेवलपर के साथ एग्रीमेंट  साइन कर लें। ये काम आप जितनी जल्दी कर लें उतना ही अच्छा  है क्योंकि साइन करने के बाद आप समय समय पर प्रोजेक्ट की ग ति देख सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि आपका फ्लैट आपकी मर्जी के मुताबिक बन रहा है या नहीं। आपको फ्लैट की वास्तविक लोकेशन की जानकारी भी होनी चाहिए ताकि डेवलपर उसमें कोई बदलाव न कर सके। इस बात का ध्यान रखें कि एक बार कब्ज़ा मिल जाने के बाद आपको लोकेशन चार्ज, क्लब मेंबरशिप या कारपार्किंग  के नाम पर अलग  से पैसा न देना पड़े क्योंकि डेवलपर आपसे छिपाकर इस तरह का घालमेल कर सकते हैं। इसके साथ ही उस प्रॉपर्टी पर आपको कितना टैक्स देना पड़ेगा, यह भी पता कर लें।
खरीदते समय याद रखें
-प्रॉपर्टी का चयन-यह निर्धारित करना सबसे जरूरी है।
-प्री लांच प्रॉपर्टी की खरीदारी-यह प्रॉपर्टी बाजार के रेट से 10-15 प्रतिशत सस्ती होती है।
-ब्रोकर फीस-प्रॉपर्टी के हिसाब से होती है।
-खरीदारी के लिए बजट तैयार करना
-शब्दों के जाल में फंसने की बजाय यह सुनिश्चित कर लें कि जो प्रॉपर्टी आप लेने जा रहे हैं, उसके लिए आपको कितना भुग तान करना होगा ।
-टोकन मनी -बुकिंग  तय होने पर इसका भुग तान करना होता है। प्रापर्टी की कीमत के हिसाब से 50,000 से पांच लाख के बीच हो सकती है।
-डाउन पेमेंट – निर्माणाधीन और तैयार फ्लैट्स के लिए डाउन पेमेंट की दर अलग  होती है।
-बैंक लोन – बैंक से लोन लेने की प्रक्रिया टोकन मनी देने से पहले ही पूरी कर लेनी चाहिए।
-कुछ विश्वसनीय बिल्डर्स का बैंक से समझौता होता है, जिसके चलते वह इस काम में आपकी मदद भी कर सकते हैं।
-प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन-डाउन पेमेंट और बैंक लोन के बाद प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन करा लें ।
-फ्लैट का कब्ज़ा -सभी सुविधाओं को जांच लें।
-बिल्डर द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं
-यह देख लें कि बिल्डर बाद में कि तने समय तक किसी सेवा के लिए जि़म्मेदार होगा । हाउसिंग  सोसाइटी का निर्माण सोसाइटी एक्ट के तहत बिल्डर सोसाइटी का निर्माण कराते हैं।
क्या आप जानते हैं
डिलीवरी की तारीख
बिल्डर के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह अपार्टमेंट की बुकिं ग  के समय खरीदार के करार में डिलीवरी की तारीख का वर्णन करें। लेकिन बिल्डर को किसी भी देरी के लिए कुछ भुग तान करना होगा यह शर्त में अनिवार्य नहीं होता।
निश्चित मुआवजा
बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें बिल्डर ने प्रोजेक्ट में देरी की और खरीदने वाले को अधर में लटका दिया। यदि आप चाहते हैं कि आपको किसी भी देरी के लिए मुआवज़ा मिले तो डिलीवरी तारीख की शर्त के साथ मुआवजे की शर्त को भी करार में शामिल करें।इस बात को उस वक्त भी दिमाग  में रख सकते हैं जब आप बिल्डर का चुनाव करते हैं। याद रखें यह तभी लागू  होगा जब बुकिंग  प्रोजेक्ट के सॉफ्ट लॉन्च के दौरान की गई हो। प्रोजेक्ट की औपचारिक घोषणा के पहले की स्थिति इसके तहत आती है। सामान्य रूप से बिल्डर इस दौरान छूट भी देते हैं।
कितना मुआवजा होगा ठीक ?
मुआवजे की ग णना करने के दो रास्ते हैं। पहला यह कि मुआवजा फ्लैट के किराये के लग भग  बराबर होना चाहिए। दूसरा तरीका यह होता है कि मुआवजा 5 से 7 रुपये प्रति वर्ग  फीट होना चाहिए।होम लोन लेने से पहले पूरे खर्च का आकंलन करना ज़रूरी है। इसके लिए बैंक चुनते समय ज्यादातर ग्राहक  अपना ध्यान सिर्फ ब्याज दर पर ही रखते हैं जबकि लोन के साथ कुछ दूसरे खर्च भी जुड़े होते हैं, जिनके बारे में भी जानकारी होना
ज़रूरी है-
एप्लीकेशन फीस
एप्लीकेशन फीस वह राशि है, जो लोन देने वाली कंपनी या बैंक लोन की एप्लीकेशन के साथ चार्ज करते हैं। कुछ बैंक, फीस के तौर पर निश्चित रकम लेते हैंं जबकि कुछ बैंक फीस के तौर पर कुल लोन अमाउंट का .5 प्रतिशत से .7 प्रतिशत अमाउंट लोन की एप्लीकेशन पर चार्ज करते हैं। यह अमाउंट आामतौर नॉन रिफंडेबल होता है।
प्रोसेसिंग  फीस
प्रोसेसिंग  फीस में डॉक्यूमेंट वेरीफिकेशन, क्रैडिट कैपेसिटी, प्रॉपर्टी की जांच और पहले किए ग ए लोन्स आदि से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए फीस ली जाती है। इसके लिए हर लोन कंपनी के पास लीग ल और फाइनेंस एक्सपटर््स समेत प्रशासनिक स्टॉफ की टीम होती है।
कितनी राशि पर ब्याज
आज के दौर में बैंक कि सी भी प्रॉपर्टी के लिए शत प्रतिशत फाइनेंस नहीं कर रहे हैं। बल्कि वे प्रोजेक्ट की कंस्ट्रक्शन के अनुसार ही फाइनेंस क र रहे हैं। इसलिए पता कर लें कि अग र आपने दस लाख की एप्लीकेशन लग ाई है और बैंक ने साल भर तक आपको के वल चार लाख का लोन कि या तो क हीं वह शेष छह लाख पर तो कोई बयाज नहीं लग ाने जा रहा। अक्सर ब्याज के वल दिए ग ए धन पर ही लग ता है लेकिन कुछ संस्थान पूरे अमाउंट पर भी ब्याज चार्ज करते हैं। इसलिए इस बारे में बैंक या वित्तीय संस्थान से पहले ही जानकारी हासिल क र लें।
प्री पेमेंट पेनाल्टी
लोग  अपना लोन जल्द से जल्द चुकाना चाहते हैं। यदि उन्हें कहीं से कोई बड़ा अमाउंट मिलता है तो वे लोन चुकाने को वरीयता देते हैं। एक मुश्त भुग तान से बैंक को मिलने वाले ब्याज का नुकसान होता है, इसलिए ‘यादातर बैंक इस पर पेनाल्टी चार्ज क रते हैं, जिसे प्री पेमेंट पेनाल्टी क हा जाता है। इसलिए जांच लें कि आपका बैंक भी तो आपसे एक मुश्त भुग तान की स्थिति में प्री पेमेंट पेनाल्टी चार्ज तो नहीं लेने जा रहा ।
दाम पता करें इस उम्मीद पर कि इंटरेस्ट रेट नहीं बढ़ेंगे, अमूमन लोग  फिक्स्ड रेट पर ही होम लोन लेना पसंद क रते हैं। फिक्स्ड रेट आमतौर पर फ्लोटिंग  रेट से ‘यादा होते हैं। फिक्स्ड रेट पर लोन लेने वाले तमाम लोगों  की लोन रेट रिवाइज किए जाने की शिकायत रहती है। इससे कई बार फिक्स्ड रेट, फ्लोटिंग  रेट के बराबर या ‘यादा हो जाते हैं। इसलिए लोन एग्रीमेंट  साइन करते समय ध्यान रखें कि बैंक फ्लोटिंग  रेट को रिवाइज करने जैसी शर्त तो नहीं रख रहा ।
ध्यान रखें
कुछ बैंक क स्टमर पर लीगल और टेक्निकल फीस जैसे चार्ज भी लग ाते हैं जबकि कुछ बैंक रजिस्ट्रेशन फीस और स्टाम्प ड्यूटी कस्टमर पर ही चार्ज करते हैं। इनके अलावा मेंटीनंस,फर्निशिंग  और वुड वर्क, प्रॉपर्टी टैक्स और एसोसिएशन की फीसआदि ऐसे तमाम खर्चे भी ज़रूरी हैं, जिनका ध्यान रखें।

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