विनिर्माण क्षेत्र में क्रान्तिकारी खोज -ग्रीन सीमेंट

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ग्रीन सीमेंट का कॉन्सेप्ट विनिर्माण के क्षेत्र में क्रान्तिकारी खोज है। इको-सिस्टम के दिन -प्रति- दिन खराब सेहत को दुरूस्त करने में यह सीमेंट अमोघ अस्त्र भी बन सकता है। इसे बनाने में अन्य सीमेंट की अपेक्षा ऊर्जा की ज़रूरत भी कम होती है और साथ ही वातावरण से कार्बन डायऑक्साइड का अवशोषण भी करता है। इंग्लैंड के वैज्ञानिकों ने इसे निर्माण क्षेत्र के लिये एक खूबसूरत तोहफा बताया है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर के लोगों के माथे पर बल पड़ गये हैं। इसी कारण इको-सिस्टम की हालत दिन-प्रति- दिन खराब होती जा रही है। इससे बचने के लिये वैज्ञानिक हमेशा कुछ न कुछ उपाय करते रहते हैं। इको-सिस्टम को दुरूस्त करने के लिये वैज्ञानिकों ने इस बार विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े सीमेंट को टारगेट किया है। इस उद्योग के बारे में कहा जाता है कि जितना एविएशन सेक्टर कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जन करता है, उससे कहीं ज्यादा कार्बन डाय ऑक्साइड उत्पादन यह सेक्टर करता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सीमेंट बनाने का कॉन्सेप्ट तैयार किया है, जो ग्रीन हाउस गैस को अवशोषित कर लेगा। इससे निर्माण क्षेत्र में क्रान्ति आ सकती है। प्राकृतिक वातावरण को सामंजस्य कराने में भविष्य में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो जाएगी। ग्रीन बिल्डिंग के कॉन्सेप्ट में यह अनोखा सीमेंट एक इतिहास रचने को तैयार है। यूके के वैज्ञानिकों ने हाल में कहा है कि इस सीमेंट के निर्माण के समय कम कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन होने के साथ प्रयोग करते समय वातावरण में मौजूद कार्बन डाय ऑक्साइड का अवशोषण भी करता है,जिससे वातावरण में प्रदूषण पैदा करने वाली समस्या खत्म हो जाती है। कार्बन डाय ऑक्साइड पैदा करने में सीमेंट का वर्तमान में 5 प्रतिशत का योगदान है, जो पूरे विश्व के एविएशन सेक्टर में कार्बन डाय ऑक्साइड के उत्पादन से कहीं ज्यादा है। अनुमान है कि विनिर्माण क्षेत्र में 2020 ई. तक ग्रोथ रेट 50 प्रतिशत की रफ्तार में होगा। ऐसी स्थिति में यह सीमेंट वायु प्रदूषण से बचने का अमोघ अस्त्र बन सकता है। इस सीमेंट को नोवासेम कंपनी द्वारा विकास किया गया है। इस सीमेंट को बनाने के समय कई रॉ मैटेरियल्स का प्रयोग पुराने पोर्टलैंड सीमेंट के समान ही किये गये हैं। इसे बनाने के बारे में कंपनी के वरिष्ठï वैज्ञानिक Nikolaos Vlasopoulos कहते हैं कि जब इसे विकास किया जा रहा था, तब हम लोग चाहते थे कि यह एक ऐसा प्रोडक्ट्स बने जो कार्बन निगेटिव हो और हम लोगों का प्रयास सफल रहा। पुराने पद्धति पर पोर्टलैंड सीमेंट को बनाते समय लाइम स्टोन और क्ले के मिश्रण को 1,500 डिग्री सेल्सियस पर विशाल भट्टी में गर्म किया जाता है। सीमेंट के साथ जिप्सम बनाने का यही आधार है। अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि प्रत्येक टन सीमेंट बनाने में 0.83 टन कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, इतना ही नहीं भट्टी में लाइम स्टोन के साथ क्ले को मिलाने के समय लाइम स्टोन को डिकम्पोज करने में बहुत ज्यादा मात्रा में ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है, इस ऊर्जा के इस्तेमाल करने के समय ज्यादा मात्रा में प्रदूषण पैदा करने वाले तत्व वातावरण में मिल जाते हैं। इस रासायनिक
प्रक्रिया में उत्पन्न गैसें प्रदूषण पैदा करने में महत्ती भूमिका निभाते हैं। Nikolaos Vlasopoulos के अनुसार यदि आप इस उत्पादन के समय कुछ बातों का ख्याल रखें तो Co2 का उत्सर्जन कुछ कम हो सकता है। हालांकि इस सीमेंट के निर्माण के समय चूना पत्थर के बजाय मैग्नीशियम ऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया से पहला फायदा यह है कि मैग्नीशियम ऑक्साइड की मात्रा प्रचूर है और दूसरा के इस विधि से सीमेंट निर्माण में 650-750 डिग्री सेल्सियस ऊर्जा की जरूरत पड़ती है, जिसके कारण कार्बन डाय ऑक्साइड का उत्सर्जन भी कम होता है। वैज्ञानिकों ने इसे बनाते समय मैग्नीशियम सिलिकेट से मैग्नीशियम ऑक्साइड के रूप में परिवर्तित करने के तरीक भी प्रयोग में लाये हैं। इस प्रक्रिया से कम ईंधन के उपयोग के कारण जहां एक तरफ ऊर्जा की बचत होती है, वहीं दूसरी तरफ पूर्व के प्रयोग में सीमेंट बनाने के समय ऊर्जा के रूप में बायोमोस, कोयला, पेड़-पौधे और कोक, टायरर्स और कुड़ा -करकट का प्रयोग से छुट्टी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकता है। इस बावत Vlasopoulos का कहना है कि सीमेंट बनाने वाली कंपनिया भी ऊर्जा बचत की दिशा की ओर पिछले दशक में कई महत्वपूर्ण कार्य किये हैं, जिससे ऊर्जा बचत के साथ वातावरण में कम से कम कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन हो। लेकिन समस्या यह है कि जब आप सीमेंट बनाते समय कोक और कोयला का इस्तेमाल भट्टी  में करते हैं तो तापमान को नियंत्रित रखना इतना आसान नहीं होता। यदि आप कम तापमान पर सीमेंट निर्माण करना चाहते हैं तो उसे भी किया जा सकता है लेकिन एक प्रोसेस के तहत। पोर्टलैंड सीमेंट बनाने के समय कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन Novacem’s सीमेंट के अपेक्षा ज्यादा होता है। यह Novacem’s सीमेंट उत्पादन के समय कार्बन डायऑक्साइड अवशोषित करके वातावरण को प्रदूषित होने से बचाता है। जहां Novacem’s सीमेंट के निर्माण में 0.3 से 0.5 टन कार्बन डायऑक्साइड वातावरण से अवशोषित करने की क्षमता है, वहीं पोर्टलैंड सीमेंट के निर्माण में जहां 0.2 से लेकर 0.5 टन कार्बन डायऑक्साइड ही अवशोषित कर पाता है। Vlasopoulos कहते हैं कि सामान्य तौर पर एक टन सीमेंट उत्पादन में 0.4 टन कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, लेकिन इस नये कॉन्सेप्ट से 1.1 टन सीमेंट उत्पादन में मात्र 0.7 टन कार्बन डायऑक्साइड वातावरण से अवशोषित होता है, जो अपने आप में एक बड़ी बात है। गौरतलब है कि सामान्य तौर पर 1 टन स्टिल के निर्माण में 1.7 टन कार्बन डायऑक्साइड पैदा होता है। इस मामले में सीमेंट का वातावरण प्रदूषित करने में स्टिल के अपेक्षा कम भागीदारी भी इसे थोड़ा अलग भी करता है।
इस सीमेंट को बनाने वाली कंपनी की टीम मैग्नीशियम ऑक्साइड सीमेंट की रिसाइक्ल करने पर भी काम कर रही है। इसे प्रक्रिया से फायदा यह होगा कि सीमेंट को पुन: बनाया जा सकता है। इस प्रोसेस की अवधि भले ही लंबी हो लेकिन सफलता प्राप्त करना, इस टीम की एक मात्र ध्येय है। इस सीमेंट के बारे में Vlasopoulos का कहना है कि आने वाले दिनों में कर्मशल रूप में मैग्नीशियम सिलीकेट प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाने से इस ग्रीन सीमेंट का कॉन्सेप्ट अपनी उफान पर रहेगा,जो विनिर्माण क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा।
1.पूरी दुनिया में प्रत्येक साल 2 बिलियन टन कार्बन डायऑक्साइड उत्सर्जन होता है, सीमेंट के उत्पादन में, जो पूरी दुनिया में उत्सर्जित कार्बन डायऑक्साइड का लगभग 5 प्रतिशत है।

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