जिम कार्बेट नेशनल पार्क

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जिम  कार्बेट नेशनल पार्क पर्यटकों के लिए आकर्षक स्थान है। यह प्राकृतिक सौन्दर्य के आगोश में समटा हुआ है।  यहां पर बहने वाली नदी रामगंगा के कलकल करते ध्वनि से प्राकृतिक सौन्दर्य का रंग और निखार देता है। विभिन्न जीव-जन्तु, कई  किस्मों के पेड़-पौधे और प्राकृतिक तत्वों से भरपूर यह स्थान आकर्षक छटा बिखेरती है। खासकर, यहां की जीप सफारी और हाथी सफारी करने का एक अपना ही मजा है।  जब कभी भी पर्यटकों को मौका मिलता है, वह प्राकृतिक सौन्दर्य के खूबसूरत वादियों को अपने यादों के झरोखों में कैद करते हैं। यहां पर विभिन्न वन्य प्राणियों का वास-स्थान है, जो आपमें रोमांच का अहसास कराता है। प्राकृतिक सौन्दर्य के तत्वों से भरपूर जिम  कार्बेट आपको प्रकृति के नज़दीक और निहारने का वह मौका देता है, जहां पहुंच कर आप इसके आलौकिक सौन्दर्य में खो से जाएंगे। वर्तमान समय में प्रत्येक साल देश-विदेश से यहां पर घूमने के लिए करीब 70 हज़ार लोग आते हैं।

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जिम कार्बेट नेशनल पार्क देश का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल और बिजनौर जिले में विस्तृत है। वर्तमान समय में पार्क 1358.54 स्क्वेयर किमी. के संरक्षित क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें 520 स्क्वेयर मीटर का क्षेत्र कोर एरिया और 797.72 स्क्वेयर किमी. का क्षेत्र बफर एरिया में आता है। इसका कोर एरिया का उत्तरी भाग कांडा रिज से घिरा हुआ है । इस रिज का सबसे ऊंचा भाग करीब 1043 मीटर है। संरक्षित क्षेत्र का पूरा भाग शिवालिक और हिमालय से घिरा हुआ है। यहां पर बहने वाली नदी रामगंगा के कलकल करते ध्वनि से प्राकृतिक सौन्दर्य के रंग और निखर देता है। राम गंगा,गंगा की सहायक नदी है। रामगंगा यहां की प्राकृतिक सौन्दर्य को कई गुणा बढ़ा देती है। यह पूर्व से पचिश्म की ओर बहती है। संरक्षित क्षेत्र के दक्षिणी और पश्चिमी भाग के अंतिम छोड़ पर कालगढ़ बांध स्थित है, जिसे वर्ष 1974 में निर्माण किया गया था। आजादी के बाद इसका नाम रामगंगा नेशनल पार्क कर दिया गया था लेकिन वर्ष 1956 में इसका नाम प्रसिद्ध शिकारी जीम कार्बेट के याद में जीम कार्बेट नेशनल पार्क रख दिया गया। भारतीय बाघों के संरक्षण के लिए यहां पर वर्ष 1973 में एक महत्वाकांक्षी परियोजना चलााई गई।
 इतिहास के आइने में जिम कार्बेट नेशनल पार्क
जिम  कार्बेट नेशनल पार्क सन् 1815-20 के मध्य यहां के स्थानीय शासकों का व्यक्तिगत संपत्ति  के रूप में था। जब अंग्रेज़ों के हाथ में इस पार्क का अधिकार मिला तो उसने भी पार्क पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इनका एकमात्र उद्देश्य था कि यहां की प्राकृतिक संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाय और जंगलों से मुनाफा कमाया जाय। सिर्फ वर्ष 1858 में मेजर रामशे ने जंगलों की संरक्षण को लेकर पहली बार योजना बनाई। उन्होंने इस योजना को कड़ाई से पालन भी कराया, जिसके कारण वर्ष 1896 तक आते-आते जंगलों की स्थिति में सुधार भी आया। उनके इसी सोच के कारण कालान्तर में फोरेस्ट्री साइंस की उप्पति हुई।  वर्ष 1861-62 में  इन इलाकों के नीचे की घाटी में खेती पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यहां पर पालतू जानवरों के लिए लगे बाड़े को हटा दिया गया। यहां पर पालतू जानवरों को जंगल में घुसना मना कर दिया गया। स्थायी रूप से यहां कर्मचारियों की नियुक्ति की गई, जो जंगलों को आग और अवैध कटाई से बचाते थे। इमारती लकड़ी वाले वृक्ष को लकड़हाड़ा को काटने की लाइसेंस दी गई और पेड़ो की भी गिनती भी शुरू की गई। वर्ष 1868 में जब वन्य विभाग की स्थापना के बाद जंगलों की जिम्मेदारी उस पर सौंप दी गयी। जंगलों के संरक्षण के लिए 1879 में वन्य जीव अधिनियम बना।  बाद में 3 जनवरी, 1907 में सर माइकल किन ने प्रथम बार इसे वन अभयारणय के रूप में ढालने का प्रयास किया लेकिन योजना सफल नहीं हो पाई। बाद में इस योजना को अमली जामा 1934 में गर्वनर सर मलकोल्म हैली ने पहनाया। उन्होंने माइकल के इस प्रस्ताव को सर्मथन किया। वे चाहते थे कि एक अध्यादेश के तहत जंगलों की रक्षा के लिए कानून बने। बाद में मेजर जीम कार्बेट ने पार्क को 1936 में द यूनाइटेड प्रोविन्स नेशनल पार्क एक्ट के अनुसार चारों तरफ से चाहारदीवारी लगवायी और इसका सीमांकन किया गया। इसके बाद यह देश का पहला संरक्षित वन क्षेत्र बन गया। इसका नाम इसके संस्थापक सर मल्कम हैली के नाम पर रखा गया था। शुरुआत में पार्क केवल 323.75 स्क्वेयर किमी. का था लेकिन यहां पर बाघ और हाथी जैसे जंगली जानवरों के वास-स्थान को देखते हुए इसका क्षेत्रफल 520 स्क्वेयर किमी. कर दिया गया। वर्तमान में इसका कोर एरिया का क्षेत्रफल भी यही है जो वर्ष 1966 में था। वर्ष 1973 में वाइल्ड लाइफ को संरक्षित करने के उद्देश्य से इसे विशेष दर्जा दिया गया । इस मुहिम के तहत के विश्व के सभी देशों में बाघ संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट टाइगर कार्यक्रम के अन्तर्गत विश्व का सबसे बड़ा पर्यावरण संरक्षण प्रोजेक्ट चलाया गया । इस प्रोजेक्ट की शुरूआत भारत का पहला नेशनल पार्क से किया गया था।

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मुख्य आकर्षण 
जंगली जीव- जीम कार्बेट नेशनल पार्क विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं का निवास स्थान है। यहां के बाघ पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण है। पार्क में  हाथी, पैंथर, जंगली बिल्ली, फिशिंग केट्स, हिमालयन केट्स, हिमालयन काला भालू, स्लोथ बीयर, हिरन, होग हिरन, बार्किग हिरन, घोरल, जंगलीबोर, पैंगोलिन, भेडि़ए, मार्टेन्स, ढोल, सिवेट, नेवला, ऊदबिलाव, खरगोश, चीतल, सांभर, हिरन, लंगूर, नीलगाय आदि जंगली पशुओं की क्रियाविधि को कैमरे में आप कैद कर सकते हैं। वाइल्ड लाइफ के प्रत्येक पहलुओं से रूबरू होने का मौका यह पार्क आपको देता है। पार्क में बहने वाली नदियों में घडिय़ालों को भी देखा जा सकता है।
पक्षी-जिम  कार्बेट में चिडिय़ों का संसार आपके मन को मोह लेगा। इसके कलरव ध्वनि आपमें नई ताज़गी और उमंग भर सकता है। यहां पर लगभग  600 चिडिय़ों की प्रजातियां पाई जाती हैं। बगुला, डार्टर, जलकौवा, टिटहरी, पैराडाइज फ्लाईकैचर, मुनिया, वीवर बर्ड्स, फिशिंग ईगल, सर्पेन्ट ईगल, जंगली मुर्गा, मैना, मोर, बार्बेट, किंगफिशर, बत्तख, गीज, सेंडपाइपर, नाइटजार, पेराकीट्स, उल्लू, कुक्कू, कठफोड़वा, चील आदि यहां की दुनिया को प्राकृतिक रस में सराबोर कर देता है।
पेड़-पौधे- जिम  कार्बेट नेशनल पार्क प्राकृतिक सौन्दर्य से लवरेज है। यहां की प्राकृतिक सुन्दरता किसी को मन मोह सकता है। यह स्थान पहाडिय़ों और नदियों के मध्य प्राकृतिक आगोश में लिपटा नज़र आता है। इसका नीचे का भाग खूबसूरत शाल के पेड़ों से घिरकर हरियाली से अच्छादित है। ऊपरी हिस्सा में कई प्रकार के पेड़-पौधे पाए जाते हैं। यहां पर पेड़-पौधे में विविधता इस रूप में है कि प्राकृतिक सौन्दर्य की खूबसूरती को अपने आप बढ़ा देता है। इसके कई भाग में चिर, अनौरी और बकली के पेड़ देखने को मिलते हैं। यहां पर बांस की कई किस्में देखी जा सकती है, जो हर प्रकार के मौसम में हर रूप में प्राकृतिक छटा बिखेरती है।
जीप सफारी– जिम कार्बेट में जीप सफारी करने का एक अपना ही अंदाज है। पार्क में घूमने के लिए यह एक बेहतर माध्यम है। जीप सफारी से इसके प्राकृतिक सौन्दर्य के हर रूप का आंनद उठा सकते हैं। कैमरा से प्राकृतिक सौन्दर्य के हर रूप को आप कैद करके अपने एलबम बना सकते हैं।  खासकर, जीप सफारी से जंगल और जंगली पशुओं को देखने का अपना ही मजा है।
हाथी सफारी-यहां पर बाघों को देखने के लिए हाथी की सवारी सबसे बेहतर और उपयुक्त मानी जाती है। इस सफारी का अनुभव अविस्मरणीय होता है। पार्क के पेड़-पौधे की विविधता से भरी दुनिया और जीव-जन्तु की अनोखी दुनिया से रूबरू होने के लिए हाथी सफारी करने का अपना ही एक अलग आंनद आता है। बाघ को देखने के लिए हाथी सफारी काफी बेहतर माना जाता है।
वर्तमान समय में जिम कार्बेट नेशनल पार्क पर्यटकों का पसंदीदा स्थान बन गया है। यहां के कुछ चुने हुए स्थानों पर ही पर्यटक को आने-जाने को आज्ञा है। जब कभी भी पर्यटकों को मौका मिलता है, वह प्राकृतिक सौन्दर्य के खूबसूरत वादियों को अपने यादों के झरोखों में कैद करते हैं। यहां पर विभिन्न वन्य प्राणियों का वास-स्थान है, जो आपमें रोमांच का अहसास कराता है। प्राकृतिक सौन्दर्य के तत्वों से भरपूर जिम कार्बेट आपको प्रकृति के नज़दीक और निहारने का वह मौका देता है, जहां पहुंच कर आप इसके आलौकिक सौन्दर्य में खो से जाएंगे। वर्तमान समय में प्रत्येक साल देश-विदेश से यहां पर घुमने के लिए करीब 70 हज़ार लोग आते हैं।
सामान्य जानकारी
मौसम और भूस्थलाकृति के बारे में 
जिम कार्बेट नेशनल पार्क समुद्र की सतह से करीब 1143 मीटर की ऊंचाई पर है। सालाना यहां पर करीब1000-2800मिलीमीटर वर्षा होती है।जाड़े के समय तापमान करीब 4 डिग्री सेल्सियस और गर्मी में करीब 42 डिग्री सेल्सियस रहता है।
कैसे पहुंचे- जीम कार्बेट पार्क सड़के और रेल से बेहतर रूप से देश के मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है। नई दिल्ली से आप रेल से भी पहुंच सकते हैं। जयपुर, आगरा, देहरादून,ऋषिकेश, हरिद्वार, दिल्ली, लखनऊ और अन्य महत्वपूर्ण शहरों से आप बाई बस भी आ सकते हैं।
हवाई सेवा-फूलबाग, पंतनगर निकटतम हवाई अड्डा है, जो रामनगर से करीब 50 कि0मी0 दूर है। निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा दिल्ली 300 कि0मी0 दूर है।
रेल सेवा-रामनगर बड़ी लाइन का रेलवे स्टेशन है और मुरादाबाद, काशीपुर एवं दिल्ली से रेल सेवा से जुड़ा है।
सड़क मार्ग 
ढिकाला दिल्ली से 300 कि0मी0, 445 कि0मी0 लखनऊ से एवं रामनगर से 51 कि0मी0 दूर है। दिल्ली से हापुड मुरादाबाद होकर और लखनऊ से बरेली, किच्छा, रूद्रपुर काशीपुर होकर मार्ग है।
मुख्य स्थानों से दूरी 
दिल्ली- 270 किमी.
चंडीगढ़/ अंबाला-70किमी.
पोंता साहिब-49 किमी.
देहरादून-46 किमी.
ऋषिकेश-25 किमी.
हरिद्वार-56 किमी.
नाजिबाबाद- 71 किमी.
काशीपुर- 30 किमी.
कैसे वस्त्र धारण करें-
-यदि आप भूरा और हरा रंग के कपड़े पहन कर यहां आते हैं तो यहां के वातावरण के अनुरूप होता है। यह दोनों ही रंग यहां के प्राकृतिक वातावरण को कम प्रभावित करता है।
-यहां पर परफ्यूम लगे वस्त्र धारण न करें
– प्रतिबन्धित क्षेत्र में धु्रमपान निषेध है
-जाड़े के मौसम में गर्म ऊनी के कपड़े ज़रूर ले जाएं। खासकर, सफारी करने में दिक्कत नहीं आएगी। गर्मी में सूती वस्त्र का यहां के लिए आदर्श माना जाता है।
कब आएं- 
साल के तीन मौसम में आप यहां पधार कर प्राकृतिक सौन्दर्य की दुनिया के रंगों से सराबोर हो सकते हैं।
जाड़े के मौसम में- अक्टूबर से मार्च तक
( खासियत- दिन में सुहावना होता है और रात ठंड होती है)
चिडिय़ों की दुनिया के आकर्षक छटा के आप दीवाने हैं, तो आपके लिए यह मौसम काफी बेहतर है। इस मौसम में पर्वत के विहंगम दृश्य देखते ही बनता है।
गर्मी ऋतु- अप्रैल से जून 
( खास बात-इन दिनों यहां पर दिन का मौसम गर्म होता है और रात का मौसम कूल होता है )
वन्यप्राणी से लगाव है तो यह मौसम आपके लिए बेहतर है। खासकर, इस मौसम में हाथियों का झूंड आपको मनमोहक अंदाज़ में दिख सकता है।
मौनसून – जुलाई से सितम्बर तक  
(खास बात- इन दिनों मौसम में आद्र्रता ज्यादा होती है और रात सुहावना होता है) यह मौसम घुमने के लिए अच्छा माना जाता है। ट्रैकिंग और रैफ्टिंग के लिए यह मौसम अनुकूल होता है। कोशी नदी में इन दोनों शौक को पूरा करने में आपको दुगूना मजा आ सकता है।
महत्वपूर्ण टिप्स-
जहां प्रतिबन्धित क्षेत्र है, यहां पर आप न घुमें
– जानवर आदमी की आवाज़ सुनकर घबरा जाते हैं, अत: शोर-गुल न करें।
-संगीत  और कार का होर्न बजाना दोनों ही मना है।
आप व्यक्तिगत फस्र्ट मेडिकल एड और कीट-पतंगों से बचने के लिए निरोधक क्रीम, दूरबीन, कैमरा, फिल्म रॉल्स, फ्लैश लाइट, रूचिवद्र्धक किताब आदि को कैरी कर सकते हैं।

प्रसिद्ध शिकारी जीम कार्बेट 

Jim-Corbett- photo courtesy
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जिम कार्बेट एक परिचय
जन्म- 25 जुलाई, 1875
स्थान- नैनीताल, यूनाइटेड प्रोविन्स,
पेशा- शिकारी, लेखक, पर्यावरणविद्
मृत्यु- 19 अप्रैल, 1955, नैरे (केन्या)
एडवर्ड जेम्स जिम कार्बेट का जन्म 25 जुलाई, 1875 को नैनीताल में हुआ था।  वह प्रसिद्ध शिकारी, संरक्षणविद्, प्रकृतिविद् और लेखक  थे। वह बचपन से ही बहुत मेहनती और नीडर स्वभाव के थे। ब्रिटीश इंडिया आर्मी  में जीम कर्नल रैंक के अधिकारी थे। उन्हें जंगलों की दुनिया से बहुत प्यार था। जब कभी भी उन्हें फुर्सत मिलता था, वह कुमांउ के जंगलों में घूमने आ जाया करते थे। वह वन्य पशुओं को बहुत प्यार करते थे। जो वन्य जन्तु मनुष्य का दुश्मन हो जाता -उसे वे मार देते थे। उन्होंने भारत में कई नरभक्षी बाघों और तेंदुआ को मार गिराया था। उनके पिता मैथ्यू एण्ड सन्स नामक भवन बनाने वाली कम्पनी में हिस्सेदारा थे। गर्मियों में जिम कार्बेट का परिवार अयायरपाटा स्थित गुर्नी हाऊस में रहता था। जीम उस मकान में 1945 तक रहे। आजादी के बाद  जिम कार्बेट अपनी बहन के साथ केन्या चले गयेे। केन्या में बस जाने के बाद, अस्सी वर्ष की अवस्था में उनका देहान्त हो गया। जिम कार्बेट आजीवन अविवाहित रहे। कुमाऊं था गढ़वाल में जब कोई आदमखोर शेर आ जाता था तो जिम कार्बेट को बुलाया जाता था। वह सबकी रक्षा कर और आदमखोर शेर को मारकर ही लौटते थे। वह एक कुशल शिकारी थे। शिकार-कथाओं के कुशल लेखकों में जिम कार्बेट का नाम विश्व में अग्रणीय है। कुमाऊं और गढ़वाल उन्हें बहुत प्रिय था। जिम कार्बेट जहां अचूक निशानेबाज थे, वहां वन्य पशुओं के प्रिय साथी भी थे। कुमाऊँ के कई आदमखोर शेरों को उन्होंने मारकर सैकड़ों लोगों की जानें बचायी थी। हजारों को भय से मुक्त करवाया था। गढ़वाल में भी एक आदमखोर शेर ने कई लोगों की जानें ले ली थी। उस आदमखोर को भी जिम कार्बेट ने ही मारा था। वह आदमखोर गढ़वाल के रुद्र प्रयाग के आस-पास कई लोगों को मार चुका था। जिम कार्बेट ने  ‘द मैन ईटर ऑफ रुद्र प्रयाग’ नाम की पुस्तकें लिखीं।
भारत सरकार ने जब जिम कार्बेट की लोकप्रियता को समझा और यह अनुभव किया कि उनका कार्यक्षेत्र यही अंचल था तो सन् 1957 में इस पार्क का नाम जिम कार्बेट नेशनल पार्क रख दिया गया। उनके नाम पर पार्क का नाम रखना, देखा जाय तो यह कुमाऊं-गढ़वाल और भारत की सच्ची श्रद्धांजलि है। इस लेखक ने भारत का नाम बढ़ाया है। पूरी दुनिया में आज जिम का नाम प्रसिद्ध शिकारी के रुप में आदर से लिया जाता है।