कैसे बना Londinium लंदन

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मुकेश के झा
दुनिया के प्रसिद्ध शहरों में शुमार लंदन सपने सरीखे जैसा शहर है। यहां की कला, संस्कृति और रहन-सहन दुनिया भर के लोगों को लुभाता रहा है। कई खासियतों के कारण इसे क्लासिकल सिटी की दर्जा दी जाती है। इस सिटी का विकास और विस्तार क्रम में भी एक रोचकता है। यह सिटी कैसे विकास क्रम के उफान पर चढ़ा, कैसे आधुनिक शहर के रूप में ढला और कैसे सभ्यता क्रम में पला। इस सभी के बारे में जानने की उत्सुकता भला किसमें नहीं होती है। पाठकों के लिए यह विशेष लेख मांग पर दी जा रही है। यहां लंदन कैसे क्लासिकल शहर बना, इसके बारे में विस्तृत वर्णन किया जा रहा है। यहां पर दी जा रही जानकारी कई महत्वपूर्ण साइटों से ली गई हैं।

लंदन इंग्लैंड की राजधानी है। यह यूनाइटेड किंगडम का सबसे बड़ी शहर है। मेट्रोपोलेटन सिटी में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाली शहर में इसकी गिनती होती है। यहां पर करीब 2 हज़ार सालों से बड़ी आबादी बसी हुई है। इस प्रसिद्ध शहर की स्थापना रोमनों ने किया था। रोमन इस शहर को लांदोनियम ((Londinium)) कहा करते थे।  प्राचीन समय में यह सिटी अपना एक विशेष स्थान रखता था। मध्यकालीन इतिहासकार के  Geoffrey of Monmouth अनुसार वर्तमान का लंदन को प्रसिद्ध शासक ब्रुटस ऑफ ट्रॉय ने स्थापित किया था। ब्रुटस प्रसिद्ध युद्ध ट्रोजन के नायक थे। उन्होंने सिटी का नाम न्यू ट्रॉय रखा। इस नाम में इंग्लैंड का गौरव झलकता था। लंदन को सर्वप्रथम त्रिनोबंतेस जाति के समूह ने बसाया। यह पूर्व रोमन ब्रिटेन के आदिवासी थे। उनका राज्य टेम्स नदी के उत्तरी छोड़ पर स्थित था। वर्तमान में (Essex) काउंटी और सुफ्फोल्क काउंटी  और ग्रेटर लंदन का क्षेत्र के रूप में इसका राज्य विस्तार था। इसके राज्य सीमा के उत्तर में आइसनी और पश्चिम में कातुवेल्लानी राज्य थे। बाद में रोमनों ने इस शहर को व्यवस्थित रूप दिया। इसका नाम बाद में कैर ट्रोइअ (Caer Troia)  रखा गया। करीब 73 ईसा पूर्व में राजा लुड  (Lud) ने इसका नामकरण कैरलुदें (CaerLudein) कर दिया। यह नाम कालान्तर में परिवर्तित होकर लंदन हो गया।
प्रागैतिहासिक काल में इस क्षेत्र के बारे में जानकारी मिलती है।  लेकिन इस काल में कोई महत्वपूर्ण मानव आबादी के बारे में स्पष्टï प्रमाण नहीं मिलता है।  यद्यपि इन क्षेत्रों में उस समय के कृर्षि जनित कार्य और शवाधान स्थल के प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन समय में लंदन एक कम बसे ग्रामीण क्षेत्र था। हालांकि कांस्य युगीन काल में  करीब 300 ईसा पूर्व का बैटरसी शिल्ड टेम्स नदी के क्षेत्र में आने वाले चेल्सी में मिला है। इससे संकेत मिलता है कि यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था। बैटरसी शिल्ड वर्तमान में ब्रिटीश म्यूजि़यम में रखा गया है। इस शिल्ड पर सेल्टिक रूपांकन और ताम्र साज-सज्या बड़ी बारिकी से किया गया है। इसके बारे में इतिहासकारों का मानना है कि नदी में इस शिल्ड को धार्मिक अनुष्ठïान के बाद प्रवाहित कर दिया गया हो। कांस्य और लोहे के कई टुकड़े पूरे ब्रिटेन में नदियों के किनारे मिले हैं। इतिहासकारों का मानना है कि ब्रेंटफोड  (Brentford)और एघम (Egham) काउंटी में संभव है कि कुछ मानव बस्तियां उस समय रही हो। लेकिन लंदन के आस-पास कोई भी सिटी नहीं थी। प्रसिद्ध रोमन शासक क्लौडिउस जब इस भू-भाग को 43 ई. में जीत लिया था। रोमन समय में लंदन को लोंदीनियम कहा जाता था। लेकिन बहुत सारे विद्वान इस नाम से लंदन की उत्पति के बारे में असहमत हैं। उनका कहना है कि इस नाम की उत्पति यहां के क्षेत्र में विस्तृत रूप से बहने वानी नदियों के भयानक प्रवाह से जुड़ा हुआ है। इसके बारे में अनुसंधानकर्ता रिचर्ड कोअटेस  (Richard Coates)  का सलाह है कि यहां पर नीचे क्षेत्र में जो नदी बहती थी, उसे प्लोवोनिदा (Plowonida) के नाम से पुकारा जाता था  और टेम्स नदी ऊपरी क्षेत्र में बहती थी। इन दोनों के प्रवाह क्षेत्र के आस-पास रहने वाली आबादी ने शायद इस प्रकार का नाम दिया हो।  दूसरा मत यह भी है कि इस सिटी का नाम राजा लुड के नाम से लिया गया है। माना जाता है कि उसने ही सिटी में पहली बार प्लानिंग वे में सड़के बनवायी थी।
लंदन में पहले लैटिन भाषा बोली जाती थी। ग्रीक भाषी की संख्या भी कम नहीं थी। ग्रीक बोलने वाले सैनिक और व्यापारी इस सिटी में रहते थे। लंदन का विकास नगर सभ्यता के रूप में करीब 50 ई. में होने लगा था। रोमन समय में लंदन आकार लगभग में वर्तमान के हाउड पार्क के समान था। अपनी स्थापना के फौरन बाद ब्रिटेन की रानी बौदिका (Queen Boudica)   की सेना ने पूरी शहर को अपने अधिकार में कर लिया। सिटी में लाल राख की एक लेयर भी खोजी गई। यह लेयर उस समय की है। यह लाल राख इस बात का संकेत देता है कि सिटी को आग के हवाले कर दिया गया था। रोम के प्रसिद्ध इतिहासकार टासिटस का कहना है कि रोमनों ने इस बात का इस युद्ध का जवाब देते हुये करीब 80,000 ब्रिटीशर्स को मार दिया और राजा को फांसी पर चढ़ा दिया। रानी ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। करीब 120 ई. में सिटी की जनसंख्या बढ़कर 60 हज़ार के आस-पास पहुंच गई। यह ब्रिटेन की राजधानी बन गई। रोमन ब्रिटेन की रजधानी के रूप में यह प्रसिद्ध सिटी बन चुकी थी। औपचारिक रूप में इसे कोलचेस्टर की संज्ञा दी गई। यह ब्रिटेन की सबसे पुरानी व्यस्थित सिटी की श्रेणी में आ गई। उसके बाद रोमनों ने 200 ई. में सिटी की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर किलाबन्दी कर दी। लंदन की सीमा का किलाबन्दी इस रूप में किया गया कि कई सौ सालों तक यह शहर सुरक्षित रूप में फलता-फूलता रहा। चौथी शताब्दी तक आते-आते लंदन समृद्धशाली और सुरक्षा के मामले में अव्वल हो गया। 410 ई. में रोमन ने लंदन सिटी को छोड़ कर चले गए। व्यवहारिक रूप से यह शहर को 40 साल बाद छोड़ दिया गया था। जब रोमन को यहां के जुतेस  (Jutes)  और केंटिश   (Kentish)  जातियों से भयंकर युद्ध हुआ, तब उसने  इस सिटी को मीलिट्री ऑपरेशन बेस के रूप में इस्तेमाल करने लगा। सक्सोंस के बढ़ते प्रभाव के कारण रोमनों ने 456 ई. में केंट को छोड़ दिया और इसके बाद भी यहां पीढ़ी दर पीढ़ी कई भयंकर युद्ध हुए। यह काल क्रम पूरे यूरोप में चलता रहा लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद पूरे यूरोप का कायाकल्प हो गया। औद्योगीकरण ने शहरीकरण के स्वरूप पर गहरा असर डाला है। हालांकि 1850 के दशक तक भी ज्यादातर पश्चिमी शहर मोटे तौर पर ग्रामीण किस्म के शहर ही थे। लीड्स और मैनचेस्टर जैसे  प्रारंभिक औद्योगिक शहर अठारहवीं सदी के आखिर में स्थापित किए गए कपड़ा मिलों के कारण प्रवासी मजदूरों को बड़ी संख्या में आकर्षित कर रहे थे। 1851 में मैनचेस्टर में रहने वाले तीन चौथाई से ज्यादा लोग ग्रामीण इलाकों से आए और प्रवासी मजदूर थे। औद्योगिक क्रांति ने रंग जमाना इंग्लैंड में शुरू किया तो उसका व्यापक प्रभाव लंदन में देखने को मिला। इसके बाद लंदन  का शवाब पूरे जोर पड़ था। यहां पर एक आधुनिक शहर का कॉन्सेप्ट जन्म ले चुका था। 1750 ई. तक इंग्लैंड और वेल्स का हर नौ में से एक आदमी लंदनवासी बन चुका था। यह एक विशालकाय शहर के रूप में तब्दिल हो चुका था और आबादी 6,75,000 तक पहुंच चुकी थी। 19 वीं शताब्दी में लंदन इसी तरह फैलता रहा। यहां की जनसंख्या काफी तेजी से बढ़ रही थी। यहां की आबादी 1810 ई. से लेकर 1880 ई. तक 40 लाख हो चुकी थी। इस सत्तर साल में इसकी आबादी चौगुनी बढ़ चुकी थी। यह अलग बात है कि लंदन में उस समय विशाल कारखाने तो नहीं खुले थे लेकिन उसे भविष्य के शहर की संज्ञा दी जाने लगी। परिणामस्वरूप प्रवासी आबादी चुंबक की तरह उसी की तरफ खिंची चली आती थी। इस स्थिति के बारे में गैरेथ स्टेडमैन जोन्स ने काफी सटीक शब्दों में कहा कि उन्नीसवीं शताब्दी का लंदन क्लर्कों और दुकानदारों, छोटे पेशेवरों और निपुण कारीगरों, कुशल व शारीरिक श्रम करने वालों की बढ़ती आबादी, सिपाहियों, नौकरों, दिहाड़ी मजदूरों, फेरीवालों और भिखारियों का शहर था। लंदन में मुख्य रूप से पांच तरह के बड़े उद्योगों में बहुत सारे लोगों को रोजगार मिला हुआ था।  परिधान और जूता उद्योग, लकड़ी व फर्नीचर उद्योग, धातु एवं इंजीनियरिंग उद्योग, छपाई और स्टेशनरी उद्योग तथा शल्य चिकित्सा उपकरण व घड़ी जैसे सटीक माप वाले उत्पादों और कीमती धातुओं की चीजें बनने वाले उद्योग में लोग कार्य करते थे। इन पांच उद्योगों में ही पहले ज्यादा लोग काम करते थे। कालान्तर मोटरकार और बिजली के उपकरणों का भी उत्पादन होने लगा और विशाल कारखानों की संख्या बढ़ते-बढ़ते इतनी हो गई कि शहर की तीन चौथाई नौकरियां इन्हीं कारखानों में सिमट गईं। यह स्थिति लंदन की प्रथम विश्वयुद्ध (1914-18) के दौरान थी। कहते हैं न विकास अपने साथ कई खामियों को भी लाता है। कुछ खामियां लंदन में भी आने लगी थी। जैसे-जैसे लंदन तरक्की का मार्ग प्रशस्त करता गया, उसी प्रकार से वहां अपराध भी बढऩे लगे। कहा जाता है कि 1870 ई. के दशक में लंदन में कम से कम बीस हजार अपराधी रहते थे। उस समय अपराध व्यापक चिंता और बेचैनी का कारण बन चुके थे। पुलिस कानून व्यवस्था को लेकर चिंतित थी, परोपकारी समाज की नैतिकता को लेकर बेचैन थे और उद्योगपति परिश्रमी व अनुशासित मज़दूर वर्ग चाहते थे। इन्हीं सारी बातों को ध्यान में रखते हुए अपराधियों की गिनती की गई, उनकी गतिविधियों पर नज़र रखी जाने लगी और उनकी जि़न्दगी के तौर तरीकों की जांच की जाती थी।
19 वीं सदी के मध्य में हेनरी मेह्यïू ने लंदन के मजदूरों पर कई किताबें लिखीं।
हेनरी ने मज़दूर की यथास्थिति पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने ऐसे लोगों की एक लंबी सूची भी बनाई, जो अपराधों से ही अपनी आजीविका चलाते थे। अपराधियों की इस सूची में दर्ज बहुत सारे ऐसे लोग भी थे, जो मकानों की छतों से शीशा चुरा लेते थे। दुकानों से खाने की चीजें उठा लेते थे, कोयले के ढेर उठा ले जाते थे या बाड़ों पर सूखे कपड़े उठा ले जाते थे। दूसरी ओर ऐसे अपराधी भी थे, जो अपने धंधे में माहिर थे, जिन्हें अपराधों को पूरी सफाई से अंजाम देना अच्छी तरह आता था। लंदन की सड़कों पर ठगों और जालसाजों, जेबकतरों और छोटे मोटे चोरों की भरमार रहती थी। जनता को अनुशासित करने के लिए शासन ने अपराधों के लिए भारी सजाएं तय कर दीं और जो ‘लायक गरीबÓ थे उन्हें रोजगार देने का इंतजाम शुरू किया।
लंदन में 18 वीं सदी के आखिर में और उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में कल-कारखाने में बहुत सारी औरतें भी काम करती थीं। लेकिन जैसे-जैसे तकनीक की दुनिया में तरक्की हुई और उसमें सुधार आया। इस सुधार से कारखानों में औरतों की नौकरियां छीनने लगीं। यहां के औरतें घरेलू कामों में सिमट कर रह गईं। 1861 की जनगणना से पता चला कि लंदन में लगभग ढाई लाख घरेलू नौकर हैं। उनमें औरतों की संख्या बहुत ज्यादा थी। उनमें से अधिकांश हाल ही में शहर में आई थीं। बहुत सारी औरतें परिवार की आय बढ़ाने के लिए अपने मकानों का भी इस्तेमाल करती थीं। वे या तो किसी को भाड़े पर रख लेती थीं या घर पर ही रह कर सिलाई-बुनाई, कपड़े धोने या माचिस बनाने जैसे काम करती थीं। बीसवीं सदी में हालात एक बार फिर बदले। जब औरतों को युद्धकालीन उद्योगों और दफ्तरों में काम मिलने लगा, तो वे घरेलू काम छोड़ कर फिर बाहर आने लगीं।
बहुत सारे बच्चों को भी मामूली वेतन के लिए कामों पर भेजा जाने लगा। बहुधा उनके मां-बाप ही उन्हें काम पर भेजते थे। 1880 के दशक में द बिटर क्राई ऑफ आउटकास्ट लंदन नामक पुस्तक लिखने वाले पादरी ऐंड्रयू मीयन्र्स ने इस बात पर रोशनी डाली कि लंदन के अल्पवेतन कारखानों में मजदूरी करने की बजाए अपराध ही ज्यादा फायदेमंद क्यों है : माना जाता है कि साल का एक बच्चा चोरी-चकारी करके हर हफ्ते आराम से 10 शिलिंग 6 पेंस कमा लेता है। अगर इसी उम्र का कोई लड़का उस चोर के बराबर कमाना चाहे, तो इसके लिए उसे हफ्ते में माचिसों के 56 डिब्बे यानी रोजाना 1,296 माचिसें बनानी पड़ेंगी। 1870 के अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा कानून और 1902 से लागू किए गए फैक्ट्री कानून के बाद बच्चों को औद्योगिक कामों से बाहर रखने की व्यवस्था लागू कर दी गई।
आवास
औद्योगिक क्रांति के बाद लोग बड़ी संख्या में शहरों की तरफ रुख करने लगे, तो लंदन जैसे पुराने शहर नाटकीय रूप से बदलने लगे। फैक्ट्री या वर्कशॉप मालिक प्रवासी कामगारों को रहने की जगह नहीं देते थे। फलस्वरूप, जिनके पास जमीन थी ऐसे अन्य लोग ही इन नवांगतुकों के लिए सस्ते और सामान्यत: असुरक्षित टेनेमेंटï्स बनाने लगे। यू तो गांवों में भी गरीबी खूब थी लेकिन शहरों में तो बहुत घनी और साफ दिखाई पड़ती थी। 1887 में लिवरपूल के एक जलपोत मालिक चाल्र्स बूथ ने लंदन के ईस्ट एंड (पूर्वी छोर) में लंदन के अल्पकुशल मजदूरों का पहला सामाजिक सर्वेक्षण किया। उन्होंने पाया कि लंदन में कम से कम 10 लाख (लंदन की आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा) लोग बहुत ही गरीब हैं और उनकी औसत उम्र 29 साल से ज्यादा नहीं है (संपन्न वर्ग और मध्यवर्ग की औसत उम्र 55 साल थी)। बूथ ने पाया कि इन मजदूरों के किसी वर्कशॉप अस्पताल या पागलखाने में मरने की संभावना ज्यादा है। चाल्र्स बूथ ने अपने सर्वेक्षण में निष्कर्ष निकाला कि लंदन को अपने निर्धनतम नागरिकों को बसाने के लिए कम से कम 4,00,000 कमरे और बनाने होंगे।
कुछ समय तक शहर के खाते-पीते बाशिंदे यही मांग करते रहे कि झोपड़ पट्टिïयों को साफ कर दिया जाना चाहिए। लेकिन धीरे धीरे लोग इस बात को समझने लगे कि शहर के गरीबों के लिए भी आवास का इंतजाम करना जरूरी है। इस बढ़ती चिंता के क्या कारण थे? पहली बात तो यह थी कि गरीबों के एक कमरे वाले मकानों को जनता के स्वास्थ्य के लिए खतरा माना जाने लगा था। इन मकानों में भीड़ रहती थी, वहां हवा-निकासी का इंतजाम नहीं था और साफ सफाई की सुविधाएं नहीं थीं। दूसरा, खस्ताहाल मकानों के कारण आग लगने का खतरा बना रहता था। तीसरा, इस विशाल जनसमूह के कारण सामाजिक उथल-पुथल की आशंका दिखाई देने लगी थी। 1917 की रूसी क्रांति के बाद यह डर काफी बढ़ गया था। लंदन के गरीब कहीं विद्रोह न कर डालें, इस आशंका से निपटने के लिए मजदूरों के लिए आवासीय योजनाएं शुरू की गईं।
लंदन की सफाई
लंदन को साफ सुथरा बनाने के लिए तरह तरह से प्रयास किए गए। भीड़ भरी बस्तियों की भीड़़ कम करने, खुले स्थानों को हरा भरा बनाने, आबादी कम करने और शहर को योजनानुसार बसाने के लिए कोशिशें शुरू कर दी गईं। इसी तरह की आवासीय समस्याओं से जूझ रहे बर्लिन और न्यूयार्क जैसे शहरों की तर्ज पर अपार्टमेंट्स के विशाल ब्लॉक बनाए गए। लेकिन टेनेमेंट्स की वजह से यहां की समस्या विकट थी। मकानों की भारी किल्लत के असर को काबू करने के लिए प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान किराया नियंत्रण कानून लागू किया गया।
उन्नीसवीं सदी के औद्योगिक शहरों में घुटन भरे भीड़-भड़क्के ने देहाती साफ हवा की चाह बढ़ा दी थी। लंदन और पेरिस के बहुत सारे अमीर तो देहात में अवकाश गृह बनवाने का खर्चा उठा सकते थे, पर यह विकल्प सबके पास नहीं था। शहर के लिए नए फेफड़ों का इंतजाम करने की बात उठने लगी। लंदन के गिर्द हरी पट्टïी आदि विकसित करके देहात और शहर के फासले को पाटने के प्रयास भी किए गए। वास्तुकार और योजनाकार एबेनेजर हावर्ड ने गार्डन सिटी (बगीचों का शहर) की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने एक ऐसे शहर का खाका खींचा, जहां पेड़ पौधों की भरमार हो और जहां लोग रहते भी हों, काम भी करते हों। उनका मानना था कि इस प्रकार बेहतर नागरिक तैयार करने में भी मदद मिलेगी। हार्वड के विचारों के आधार पर रेमंड अनविन और बैरी पार्कर ने न्यू अर्जविक नाम से एक गार्डन सिटी का डिजाइन तैयार किया। इसमें साझा बाग, बगीचे, खूबसूरत नजरों का इंतजाम किया गया था। हर चीज को बड़ी बारीकी से सजाया गया था। लेकिन ऐसे मकानों को तो केवल खाते पीते कामगार ही खरीद सकते थे।
विश्वयुद्धों के दौरान (1919-39) मजदूर वर्ग के लिए आवास का इंतजाम करने की जिम्मेदारी ब्रिटिश राज्य ने अपने ऊपर ले ली और स्थानीय शासन के जरिए 10 लाख मकान बनाए गए। इनमें से ज्यादातर एक परिवार के रहने लायक छोटे मकान थे। इस दौरान शहर इतना फैल चुका था कि अब लोग पैदल अपने काम तक नहीं जा सकते थे। शहर के आसपास यानी उपशहरी बस्तियों के अस्तित्व में आने से सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था अनिवार्य हो चुकी थी।
शहर में आवागमन
अगर लोगों को उपनगरीय बस्तियों से शहर तक लाने के लिए यातायात की सुविधा नहीं है, तो भला लोगों को शहर छोड़ कर उपनगरीय गार्डन आबादियों में जाकर रहने के लिए कैसे तैयार किया जा सकता था? लंदन के भूमिगत रेलवे ने आवास की समस्या को एक हद तक हल हल कर दिया था। इसके जरिए भारी संख्या में लोग शहर के भीतर बाहर आ जा सकते थे।
दुनिया की सबसे पहली भूमिगत रेल के पहले खंड का उद्घाटन 10 जनवरी, 1863 को किया गया। यह लाइन लंदन की पैडिंग्टन और फैरिंग्टन स्ट्रीट के बीच स्थित थी। पहले ही दिन 10,000 यात्रियों ने इस रेल में यात्रा की। इस लाइन पर हर दस मिनट में अगली गाड़ी आ रही थी। 1880 तक भूमिगत रेल नेटवर्क का विस्तार हो चुका था और उसमें सालाना चार करोड़ लोग यात्रा करने लगे थे। शुरू में भूमिगत यात्रा की कल्पना से लोग डर जाते थे। इस बारे में अखबार के एक पाठक ने इन शब्दों में चेतावनी दी थी : मैं जिस डिब्बा में बैठा था। वह पाइप पीते मुसाफिरों से भरा हुआ था। डिब्बे का माहौल सल्फर, कोयले की धूल, और ऊपर लगे गैस के लैंप से निकलती गंध से अटा हुआ था। हालत ये थी कि जब हम मूरगेट स्टेशन पहुंचे तब तक मैं श्वासावरोधन और गर्मी के कारण अधमरा हो चुका था। मेरा मानना है कि इन भूमिगत रेलगाडिय़ों को फौरन बंद कर दिया जाना चाहिए। ये स्वास्थ्य के लिए भयानक खतरा है।
बहुत सारे लोगों का मानना था कि इन लौह दैत्यों ने शहर में अफरा तफरी और अस्वास्थ्यकर माहौल को बढ़ा दिया है। निर्माण की प्रक्रिया में होने वाले बेहिसाब विनाश के बारे में चाल्र्स डिकेन्स ने डॉम्बी एंड सनïï (1848) में लिखा है :
”मकान गिरा दिए गए, सड़कों को तोड़ कर बंद कर दिया गया, जमीन में गहरे गड्ढïे और खाइयां खोद दी गईं, चारों ओर बेहिसाब मिट्टी और धूल के अबांर लगा दिए, अधूरेपन की सौ हजार शक्लें और पदार्थ सामने थे, उलट पुलट अपनी जगह अदलते-बदलते, जमीन में धंसे हुए।ÓÓ
तकरीबन दो मील लंबी रेलवे लाइन बिछाने के लिए औसतन 900 घर गिरा दिए जाते थे। इस प्रकार लंदन में बनी टयूब रेलवे के कारण लंदन के गरीबों को बड़ी संख्या में उजाड़ा गया, खासतौर से दो विश्वयुद्धों के बीच।
बहरहाल, इन सारी अड़चनों के बावजूद भूमिगत रेलवे एक जबरदस्त कामयाबी साबित हुई। बीसवीं सदी आते आते न्यूयॉर्क, टोकियो और शिकागों जैसे ज्यादातर विशाल महानगर अपनी सुव्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के बिना नहीं रह सकते थे। नतीजा यह हुआ कि शहर की आबादी और बिखरने लगी। सुनियोजित उपनगरीय इलाकों और अच्छे रेल नेटवर्क की बदौलत बहुत सारे लोगों के लिए मध्य लंदन से बाहर रहते हुए रोज काम पर आना आसान हो गया।
इन नई सुविधाओं ने सामाजिक ऊंच नीच को कमजोर किया, तो नए किस्म के विभेद भी पैदा हो गए। इन बदलावों से लोगों के घरेलू और सार्वजनिक जीवन पर क्या असर पड़ा? क्या उनकी सभी सामाजिक समूहों के लिए एक जैसा महत्व था?
शहर में सामाजिक बदलाव
अठारहवीं सदी में परिवार उत्पादन और उपभोग के साथ साथ राजनीतिक निर्णय लेने के लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण इकाई था। औद्योगिक शहर में जीवन के रूप रंग ने परिवार की उपादेयता और स्वरूप को पूरी तरह से बदल डाला।
परिवार के सदस्यों के बीच अब तक जो बंधन थे वे ढीले पडऩे लगे। मजदूर वर्ग में विवाह संस्था टूटने की कगार पर पहुंच गई। दूसरी ओर ब्रिटेन के उच्च एवं मध्यमवर्ग की औरतें अकेलापन महसूस करने लगी थीं। हालांकि नौकरानियों के आ जाने से उसकी जि़न्दगी काफी आसान हो गई थी। ये नौकरियां बहुत मामूली वेतन पर घर का खाना बनाती थीं, साफ सफाई का काम करती थीं और बच्चों की देखभाल भी करती थीं।
वेतन के लिए काम करने वाली औरतों का अपने जीवन पर ज्यादा नियंत्रण था। विशेष रूप से निम्रतर सामाजिक वर्गों की महिलाओं का अपने जीवन पर अच्छा खासा नियंत्रण था। बहुत सारे समाज सुधारकों का मानना था कि एक संस्था के रूप में परिवार टूट चुका है। इस आशंका को दूर करने के लिए उन्होंने सुझाव दिया कि घर से बाहर जाकर काम करने वाली औरतों को दोबारा घर की चारदीवारी में भेजा जाए।
शहर में मर्द, औरत और परिवार
इसमें कोई संदेह नहीं है कि शहर पुरुषों और महिलाओं, दोनों में व्यक्तिवाद की एक नई भावना पैदा कर रहा था। वे सामूहिक मूल्य मान्यताओं से दूर जाने लगे थे, जो कि छोटे ग्रामीण समुदायों की खासियत थी। परंतु इस नई शहरी परिधि में पुरुषों व महिलाओं की पहुंच एक समान नहीं थी। जैसे जैसे औरतों के औद्योगिक रोजगार खत्म होने लगे और रूढि़वादी तत्व सार्वजनिक स्थानों पर उनकी उपस्थिति के बारे में अपना असंतोष व्यक्त करने लगे, औरतों के पास वापस अपने घरों में लौटने के अलावा कोई चारा नहीं रहा। सार्वजनिक परिधि केवल पुरुषों का दायरा बनती चली गई और घरेलू दायरे को ही औरतों के लिए सही जगह माना जाने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी के ज्यादातर आंदोलनों, जैसे चार्टिज्म (सभी व्यस्क पुरुषों के लिए मताधिकार के पक्ष में चलाया गया आंदोलन), दस घंटे का आंदोलन (कारखानों में काम के घंटे निश्चित करने के लिए चला आंदोलन) में पुरुष बड़ी संख्या में एकजुट हुए। औरतों के मताधिकार आंदोलन या विवाहित औरतों के लिए संपत्ति में अधिकार आदि आंदोलनों के माध्यम से महिलाएं काफी समय बाद जाकर (1870 के दशक से) राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए तैयार हो पाईं।
बीसवीं शताब्दी तक शहरी परिवार एक बार फिर बदलने लगा था। इसके पीछे आंशिक रूप से युद्ध के दौरान औरतों के बहुमूल्य योगदान का भी हाथ था। युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए महिलाओं को बड़ी संख्या में काम पर रखा जाने लगा था। इन परिस्थितियों में परिवार काफी छोटा हो गया था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि अब परिवार वस्तुओं और सेवाओं के तथा विचारों के नए बाजार का केंद्र बिंदु बन चुका था। यदि नए औद्योगिक शहर ने सामूहिक श्रम के लिए नए अवसर कराए, तो उसने रविवार और अन्य छुट्टिïयों के दिनों में आमोद प्रमोद और मनोरंजन की समस्या भी खड़ी कर दी। लोगों का मनोरंजन करने के लिए जो समय मिला उसका उन्होंने किस प्रयोग किया?
मनोरंजन और उपभोग
अमीर ब्रिटेनवासियों के लिए बहुत पहले से ही लंदन सीजन की परंपरा चली आ रही थी। अठारहवीं सदी के आखिरी दशकों में 300-400 संभ्रांत परिवारों के समूह के लिए ऑपेरा, रंचमंच और शास्त्रीय संगीत आदि कई प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन किए जाते थे। मेहनतकश अपना खाली समय पब या शराबघरों में बिताते थे। इस मौके पर वे खबरों का आदान प्रदान भी करते थे और कभी कभी राजनीतिक कार्यवाहियों के लिए गोलबंदी भी करते थे।
धीरे धीरे आम लोगों के लिए भी मनबहलाब के तरीके निकलने लगे। इनमें से कुछ सरकारी पैसे से शुरू किए गए थे। उन्नीसवीं सदी में लोगों को इतिहास का बोध देने के लिए और लोगों को ब्रिटेन की उपलब्धियों से परिचित कराने के लिए बहुत सारे पुस्तकालय, कला दीर्घाएं और संग्रहालय खाले जाने लगे। शुरुआती दिनों में लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम में आने वालों की सालाना तादाद सिर्फ 15,000 थी। 1810 में इस संग्रहालय में प्रवेश शुल्क समाप्त कर दिया गया, तो दर्शकों की संख्या तेजी से बढऩे लगी। 1824-25 में 1,27,643 दर्शक आए जबकि 1846 तक दर्शकों की संख्या बढ़कर 8,25,901 तक जा पहुंची। निचले वर्ग के लोगों में संगीत सभा काफी लोकप्रिय थी और बीसवीं सदी आते आते, तो विभिन्न पृष्ठïभूमि के लोगों के लिए सिनेमा भी मनोरंजन का जबरदस्त साधन बन गया।
ब्रिटिश औद्योगिक मजदूरों को छुट्टïी के दिनों में समुद्र किनारे जाने की सलाह दी जाती थी, जिससे वे खुली धूप और स्वच्छ हवा का आनंद ले सकें। 1883 में ब्लैकपूल स्थित समुद्र तट पर सैर सपाटे के लिए आने वालों की संख्या 10 लाख से ज्यादा थी। 1939 तक 70 लाख से ऊपर जा चुकी थी।
शहर में राजनीति
1886 में कड़ाके की सर्दी के दिनों में चारदीवारी के बाहर काम करना असंभव हो गया, तो लंदन के गरीब दंगों पर उतारू हो गए। उनकी मांग थी कि उन्हें भयानक गरीबी से आजादी दिलाई जाए। डेप्टफोर्ड से लंदन की ओर बढ़े चले आ रहे 10,000 लोगों की भीड़ से भयभीत दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद कर दीं। जुलूस को तितर बितर करने के लिए पुलिस बुलाई गई। इसी तरह का दंगा 1887 के आखिरी महीनों में भी हुआ। इस बार पुलिस ने ज्यादा सख्ती दिखाई। इस पुलिस कार्रवाई को नवंबर 1887 के खूनी रविवार के नाम से याद किया जाता है।
दो साल बाद लंदन के हजारों गोदी कामगारों ने हड़ताल कर दी और शहर भर में जुलूस निकाले। एक लेखक के अनुसार, हजारों हड़ताली शहर भर में जुलूस निकाल रहे थे लेकिन न तो किसी की जेब कटी और न ही खिड़की टूटी। 12 दिन तक चली इस हड़ताल में मजदूरों की मांग थी कि गोदी कामगारों की यूनियन को मान्यता दी जाए।
इन उदाहरणों से आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि शहर में बहुत सारे लोगों को एक साथ राजनीतिक कार्रवाईयों में खींचा जा सकता था। इस प्रकार शहर की विशाल जनसंख्या एक अवसर भी थी और एक खतरा भी। शहरों में विद्रोह की आशंकाओं को कम करने और शहरों को सुंदर बनाने के लिए सरकारी तंत्र ने हर संभव उपाए किए हैं। इस बात को पेरिस के बारे में दिए गए उदाहरणों से समझा जा सकता है।

Source-NCERT+ Wikipedia

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