सोच-सोच कर सोचा लेकिन निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे…

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एक चमचमाती कार और चकाचक बंदा मस्ती में झूम रहा है। नशा दौलत का है या शोहरत या सोहबत की, पता नहीं चल पाया है। वह बिन बुलाये मेहमान की तरह हर जगह सम्मान पाने की कोशिश में है। राजनीति की दुनिया में हाथ अजमाकर अपना हाथ जला नहीं, झुलसा चुका है। कितने सालों की तिकड़म के बाद पार्टी ने उसे टिकट दी थी। वह भी बिना नकद के नहीं। खैर- पुरानी झंझटिया पुस्तैनी संपत्ति थी, इसलिये बंदा को बेचते वक्त इतना बुरा नहीं लगा। क्रेडिट और डेबिट से ऊपर उठकर उसने यह उपलब्धि प्राप्त की थी। हसीन सपनों की दुनिया में कई दिनों तक खोने के बाद उसने अहसास किया कि चुनावी बिगुल तो बज चुका है और हम अभी तक जनता के सम्पर्क में ठीक ढंग से आये भी नहीं। खैर, वह कल्पना की दुनिया से बहार निकल कर जब धरातल पर आया तो मालूमात हुआ कि जनाधार का पक्ष बहुत ही कमजोर है। अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिये उसने सोचा क्यों नहीं हम भी अपना एक चुनावी घोषणा पत्र तैयार करें। चुनावी घोषणा पत्र तैयार के लिये वह बेचैन हो गया। उसकी बेचैनी को देखकर किसी ने सलाह दिया कि मियां क्यों मुफ्त में पतले होते जा रहे हो। उसने ने कहा भाई मामला ही कुछ ऐसा है। उसने बोला भाई- आपकी सीट तो पक्की है। यह बात सुनकर संभावित विजेता पुरूष के भांति उसके चेहरे पर खुशी तैरने लगी। ऐसे तो मूंछ कम थी लेकिन यह बात सुनकर मुंछे छोटी ही सही नयी यौवन की अंगड़ाई में आ गयी। उसने मूंछ पर ताव देते हुये कहा कि भाई आपने जो बात कही है, उससे तो मुझे अपने बारे में कम, अपनी जीत के बारे में ज्यादा यकीं हो गया है। चुनाव में जनता किसे चुनेगी, यह तो बाद की बात है लेकिन हमारी पार्टी की तो कोई घोषणा पत्र ही नहीं है।
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भाई साहेब ने प्यार भरी मुस्कुराहट होंठों पर लाते हुये कहा कि आपको पता है लिक से हटकर चलने में आजकल लोकप्रियता मिलती है और आपकी पार्टी लिक से हटकर चल रही है और नि:सन्देह सफलता में यह बात काफी मायने रखती है। और एक बात और कहूं- भाई ने बड़ी उत्सुकता और चहकते हुये बोला कि हां-हां बोलो-बोलो भाई। तो सुनिये। आपकी पार्टी सबसे अच्छी है, जो आपको अपनी प्रतिभा दिखाने का भरपूर मौका दे रही है। आप स्वयं से साक्षात्कार करके पूछिये कि इस बात में दम है कि नहीं। भाई साहेब कुछ देर के मौनव्रत धारण करके आंखे मंूदे सोच-सोच कर सोचा लेकिन निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे। वह इस मामले में ज्यादा दिमाग लगाने से बेहतर सलाह लेने के बारे में सोचने लगे और बोला भाई कहना क्या चाहते हो साफ-साफ कहो। उस बंदे ने बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में कहना क्या है, बस आप अपनी जिम्मेदारी मुझे सौंप दें, फिर देखिये कमाल। लेकिन एक बात का आप ख्याल रखें कि यह कमाल बिना माल का नहीं होता है। माल तो आप समझते ही हैं। आपने जितना खर्चा उधर किया है, उतना खर्चा आपको इधर भी कर दें तो आपका काम बन सकता है। भाई कुछ देर चिन्तित मुद्रा में आ गये और वह बोले कि भाई साहेब- इतना में भी काम नहीं बना तो फिर क्या होगा। उसने कहा वर्तमान में जीओ नेता जी और वर्तमान में काम करके ही भविष्य बनता है। और आपका भविष्य अच्छी रणनीति के साथ पैसा खर्च करके ही बन सकता है। अंतत: भाई साहेब मान गये और अगले ही दिन कुछ और पुस्तैनी संपत्ति को भारी  मन से चलता कर दिया। पैसे को देखकर हमारे देश में मुफ्त में सलाहकार की फौज खड़ी हो जाती है। नेता जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनकी सोच और चुनाव में पक्की जीत के लिये चुनावी घोषणा पत्र तैयार की गयी। चुनावी घोषणा पत्र बनाते समय चमचों ने काफी पसीने बहाये और शब्दों का भरपूर प्रयोग करते हुये, उन्होंने ऐसे कॉन्सेप्ट तैयार किया कि मानों कि नेता जी की जीत से ही राम राज्य आ जाएगा। प्रचार-प्रसार की जोरदार तैयारी होने लगी। गली और नुक्कड़ों पर नेता जी प्रसन्नमुद्रा में दोनों हाथ को जोड़े हर जगह तस्वीर में नज़र आने लगे। पार्टी के झंडो और बैनरों ने भी इस कार्यक्रम में खूब रंग जमाया। अब आखिरी के दो दिन बाकी थे, नेताजी घर के घर पहुंच कर वोट मांगने के लिये पहुंचे। सभी लोगों ने उनको आश्वासन दिया कि बाकी नेता फेल हो और आप पास।
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यह सब सुनकर उनका गर्व से सीना चौड़ा होकर 36 से 72 हो चुका था। रात में सोते ही उनको तरह-तरह के हसीन सपने आते थे। सबेरे होने पर नेता जी मुश्किल और भारी मन से ख्यालों की दुनिया से निकल पाते थे। चम्मचों ने उनकी चुनाव के दिन और चुनाव के परिणाम से एक दिन पहले तक दीमक की तरह खोखला कर दिया। फिर अचानक एक दिन चुनाव की अग्नि परीक्षा की घड़ी भी आ ही गयी। लोगों का बढ़ता हुजूम और हंसी के मुखमुद्रा से नेता जी को लगने लगा कि जीत तो एक दिन पक्की ही है। चुनाव के दिन तक हर तरफ और हर पार्टी के नेताओं की उम्मीद लगातार बढ़ती जा रही थी। चुनाव भी खत्म हो गये। परिणाम आने तक चमचों की फौज ने नेता जी को तरह-तरह के सपने और सब्जबाग दिखाकर खूब मजे लिये। खैर-नेताजी को भी इस रागदरबारी में काफी मन लगने लगा। चुनाव परिणाम से एक दिन पहले नेताजी रात भर सो नहीं पाये। सोच-सोच कर करवट बदल-बदल कर रात गुजारी।
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उनके लिये एक पल काटना मुश्किल हो चुका था। उनके हसीन सपनों में कई बार डरवाने दृश्य भी कल्पना का मजा किरकिरा कर चुका था। इन सब बातों के कारण नेताजी का दिल बर्फ की तरह जमते-जमते कई बार बचा। जिस दिन चुनाव के परिणाम आने वाले थे, नेताजी का दिल, ठीक उसी प्रकार से धड़क रहा था, जैसे किसी नये आशिक को नयी मेहबूबा को देखकर धड़कता है। चुनाव के परिणाम के समय नेताजी अपने चमचों के साथ घोषणा स्थल के प्रांगण में डटे रहे। लेकिन यह क्या। हर बार सबके नामों का जिक्र माइक पर किया जा रहा था लेकिन नेताजी का नाम तो आ ही नहीं रहा था। चमचा लोग आश्वासन दे रहे थे कि आप बिलकुल नहीं घबरायें, हो सकता है कि अभी आपके लोकप्रियता वालों स्थानों की गिनती शुरू नहीं हुयी हो। एक बार नेताजी का नाम माइक पर आया कि वहां से वह आगे चल रहे हैं। उसके बाद तो नेताजी एकदम प्रसन्न मुद्रा में आ गये। लेकिन एक दो घंटे में ही सब कुछ स्पष्ट हो गया। नेताजी अपनी जमानत भी बचा नहीं पाये और बुरी तरह से हार गये। यह घोषणा होने से पहले ही नेताजी के चमचा एक-एक कर मैदान छोड़ कर भाग गये थे। हारे को हरीनाम वाली बात नेताजी पर एकदम सटिक बैठती थी। वह जब पीछे मुड़कर देखा तो उन्हें दो-चार सगे-सम्बन्धियों के सिवाय कोई नज़र नहीं आया। वह युद्ध भूमि में घायल रणबांकुरों की तरह चित्कार करने लगे। लोगों ने ढाढस बंधाया। सहानुभूति के शब्दों की बाढ़ सी आ गयी। अब नेताजी का दिल एकदम सा बैठ गया। उन्होंने हिम्मत दिखाते हुये, किसी प्रकार से अपने को संभालते हुये, घर की ओर प्रस्थान किया। घर में चारों तरफ सन्नाटा और मातम पसरा हुआ था। इस हार के बाद नेताजी दार्शनिक हो चुके थे। जब कभी भी बोलते तो लगता था कि कोई महान पुरूष के वक्तव्य को अपनी जि़दगी का फलसफा बना चुके हैं। उनको दुनियादारी पूरी तरह से समझ में आ चुकी थी।उसके बाद वह अपनी खोयी हुयी संपत्ति पाने के लिये कुछ उपाय सोचा। वहकई महीनों की सोच के बाद निष्कर्ष पर पहुंचे कि अब एक ही उपाय है कि संपत्ति जो खोयी है, उसे प्राप्त करने के लिये संपत्ति की दुनिया में आना ज़रूरी है। इस सोच के बाद वह इस दुनिया में अवतरित हुये और आज सफल हैं। लोगों ने जितना इनको समझाया था,उससे वह कहीं ज्यादा समझदार हो चुके थे।

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