स्टील विकास की धुरी

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स्टील दिन प्रति दिन बुलंदियों को छू रहा है। यह वर्तमान में इन्फ्रास्ट्रेक्चर की दुनिया में जान डालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बड़ी-बड़ी ऊंची बिल्डिंग्स, इन्फ्रास्टैक्चर, टूल्स, शिप, ऑटोमोबाइल, मशीन और घरेलू उपकरण में तो स्टील ने गजब की चमक बिखेरी है। आज के युग में इसके बिना तो विकास की बात करना अपने आप में बेईमानी ही मानी जाएगी।

स्टील लोहा का  मिश्रधातु है। ग्रेड के हिसाब से इसमें कार्बन की मात्रा पाई जाती है। C:110-10 Fe  में भार के हिसाब से कार्बन 0.2 प्रतिशत से लेकर 2.14 प्रतिशत तक होता है। ज्यादातर इसमें कार्बन की मात्रा ही प्रभावी होती है लेकिन लोहा के अन्य अपरूपों में मैगनीज, क्रोमियम, वैनडियम  औैर टंगस्टन भी होते हैं। कार्बन और दूसरे तत्व लोहा पर हारडेनिंग एजेंट के रूप में क्रिया करते हैं, जिसके कारण लोहा का आण्विक संरचना एक मज़बूत स्वरूप में बनी रहती है। स्टील में इन तत्वों की उपस्थिति के कारण ही इसमें कठोरता,द्रव्यता और तन्यता आदि के गुण पाये जाते हैं।  स्टील में कार्बन की मात्रा बढ़ाने से यह लोहा के अपेक्षा ज्यादा मज़बूत और कठोर के साथ इसे ज्यादा क्षणभंगूर भी बनाया जा सकता है। लोहा में कार्बन की धुलनशीलता वजन द्वारा 2.14 प्रतिशत, 1149 डिग्री सेल्सियस पर होती है। कम तापमान औैर उच्च सांद्रता की स्थिति में स्टील का उत्पादन कार्बन के साथ जुड़कर एक मज़बूत स्वरूप अख्यितार कर लेता है।   लोहा कार्बन की मात्रा जब ज्यादा हो जाती है, तब इसे ढलावां लोहा की संज्ञा दी जाती है। ऐसी स्थिति में इसका गलनांक बिन्दु न्यूनतम और ढालवांपन कम  होता है। स्टील में पायी जाने वाली अवांछित तत्वों में जैसे रॉट आयरन जिसमें अन्य तत्वों की भी मात्रा पाई जाती है, जो भार के हिसाब से 1-3 प्रतिशत के बीच होता है।  यह जंगरोधी के मामले में ज्यादा बेहतर है और बड़ी आसानी से मुड़ती भी है। सामान्य रूप से जिस लोहे और स्टील इंडस्ट्री की बात हम करते हैं, तो लगता है कि यह दोनों ही चीज़ें एक ही है लेकिन ऐतिहासिक संदर्भ में इसके विकास क्रम को देखें तो स्पष्टï है कि यह दोनों ही अलग-अलग चीज़ें हैं। यूरोप में पुुर्नजार्गरण से पहले ही स्टील का निर्माण कर्ई विधियों से किया जाता था लेकिन यह विधि इतना प्रभावी नहीं था। 17 वीं शताब्दी के बाद  स्टील का उत्पादन पहले से ज्यादा कुशल विधियों से किया जाने लगा, जिसके कारण इसका प्रयोग बढ़ता चला गया। 19 वीं शताब्दी के मध्य में बेसमर प्रक्रिया से स्टील बनने लगी और व्यापक पैमाने पर इसका उत्पादन होने लगा। यह प्रक्रिया थोड़ी सस्ती होने के कारण लोकप्रिय हो गयी। जब धीरे-धीरे इसके उत्पादन के साथ क्वालिटी बढ़ी तो मूल्य भी बढ़ा। वर्तमान में स्टील पूरी दुनिया में सबसे कॉमन मैटीरियेल्स है और  जिसके उपयोग के बिना सभ्यता-संस्कृति के विकास का क्रम बहुत ही पीछे रह जाता। इस बात से ही आप जान सकते हैं कि वास्तव में स्टील विकास की धुरी का आज पहिया बन चुका है। बड़ी-बड़ी ऊंची बिल्डिंग्स, इन्फ्रास्टैक्चर, टूल्स, शिप, ऑटोमोबाइल, मशीन और घरेलू उपकरण में तो स्टील ने गजब की चमक बिखेरी है। आज के युग में इसके बिना तो विकास की बात करना अपने आप में बेईमानी ही मानी जाएगी। स्टील को क्वालिटी के स्तर पर कई ग्रेड के द्वारा परिभाषित की जाती है। लोहा सामान्य रूप से अर्थ क्रस्ट के तत्व के रूप में नहीं पाया जाता है।  यह अर्थ क्रस्ट में ऑक्सिजन और सल्फर के साथ संयुक्त रूप में पाया जा सकता है।  लोहा कई तत्वों के अवयवों के रूप में हेमेटाइड, मैग्नेटाइड,पाइराइट और सिडेराइट के रूप में पाया जाता है।

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