टैक्स की निराली दुनिया और समझें हर बारिकी

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इनकम टैक्स की दुनिया भी कम निराली नहीं है, प्रावधानों का स्वरूप इस प्रकार का है कि आप जब तक सभी चीज़ों को बारिकी से नहीं समझे तो कौन सा एक्ट किधर से लग जाय कहा नहीं जा सकता है। कुछ एक्ट के प्रावधान कभी सोये अवस्था में होते हैं, लेकिन मामले बनते ही जागृत हो जाते हैं। यदि यह एक्ट शुरुआत से ही जागृत अवस्था में हो तो समय के साथ पैसे की बचत भी हो। गिफ्ट टैक्स और लेन-देन के टैक्स के बीच में फंसे ऐसे कुछ वाक्या अमित कुमार के साथ भी हुआ था।

इनकम टैक्स में कुछ बातें ऐसी होती है, जिसे जानना हर एक व्यक्ति की ज़रूरत बन जाती है।  इसे लेकर वर्ष 1961 में इनकम टैक्स पारित किया गया। लेकिन इसकी दुनिया भी कम निराली नहीं है, इस एक्ट को समझने के लिये एक विशेषज्ञ की टीम तक आपको गठित करनी पड़ सकती है। हर विधा की अलग-अलग ही दुनिया है, इस एक्ट में। कुछ प्रावधान को लेकर आप पढें तो भी बात नहीं बन सकती है। इसी फेहरिस्त में आता है-गिफ्ट पर टैक्स।

गिफ्ट टैक्स का मामला कई बार खबरों की सुर्खियां भी बनती रही है। इस प्रकार की पेंचदगियों को देखकर 1 अक्टूबर, 1998 से मार्च 2005 के बीच गिफ्ट टैक्स को बंद कर दिया गया था। यह प्रावधान कुछ सालों तक चलता रहा  लेकिन अप्रैल 2005 में गिफ्ट टैक्स की दुनिया अपनी पुरानी ढर्रे पर लौट आयी। इसके लिये  सेक्शन 56(2)(5) लाया गया। इस एक्ट के सहारे वास्तव में पुराने गिफ्ट टैक्स को फिर से शुरु किया गया, ताकि गिफ्ट टैक्स का अबुझ पहेली कुछ सरल हो जाय। लेकिन अभी भी यह मामला सरल नहीं बन पाया है। इस गिफ्ट टैक्स को लेकर जो सबसे उलझाव पूर्ण मामला बनता है, वह है, बिना ब्याज के दिया गया लोन है। जब कभी पैसों की ज़रूरत होने पर आप अपने किसी दोस्त से मदद लेते हैं, तो वह आपको बिना किसी ब्याज के रकम दे देता है। देखा जाय तो बगैर ब्याज पर मिली कोई भी रकम पहली नज़र में गिफ्ट की तरह ही होती है। लेकिन कभी-कभी यह लेन-देन का मामला एक्ट के अधीन आने पर आपको टैक्स भी देना पड़ सकता है। सेक्शन 56(2)(5)के मुताबिक 50,000 रुपये से ‘यादा के किसी भी गिफ्ट को लेने वाले की आमदनी के तौर पर लिया जाएगा। और इस पर सामान्य आय पर लगने वाला टैक्स लिया जाएगा। इस कानून के प्रावधानों में परिवार के किसी सदस्य की तरफ से मिले किसी गिफ्ट पर टैक्स नहीं लगता है। शादी के मौके पर मिलने वाला गिफ्ट भी टैक्स के सीमा से बाहर होता है।  यदि आपको वसीयत के माध्यम से संपत्ति मिली हो तो यह हिस्सा भी टैक्स के अधीन नहीं आता है। किसी की मौत से विरासत में मिली संपत्ति पर गिफ्ट टैक्स नहीं लगता है। यदि आपको किसी स्थानीय प्राधिकरण की तरफ से गिफ्ट के तौर पर कुछ दिया गया हो तो इस पर टैक्स नहीं लगता है। इनकम टैक्स सेक्शन 10(23) के तहत आने वाले किसी फंड या संस्था या यूनीवर्सिटी या शैक्षिक संस्थान या मेडिकल संस्थान या ट्रस्टी की तरफ से मिले गिफ्ट पर भी टैक्स नहीं लिया जाता है। यदि आपको और आपकी संस्थान को चैरिटी से चलने वाले किसी ट्रस्ट या संस्था की तरफ से गिफ्ट मिला हो तो यह भी टैक्स के दायरे से बाहर होता है। लेकिन यहां एक बात का आपको ध्यान रखना होगा कि डोनेशन और मेडिकल ग्रांट जैसी चीजें टैक्स के दायरे में आती हैं।

कुछ दिलचस्प पहलू इंटरेस्ट-फ्री लोन के बारे में

अमित कुमार इस टैक्स के मामले में कुछ उलझ से गये थे। उन्होंने एक सपने का आशियाने खरीदने के लिये अपने दोस्त से 50 लाख रुपये उधार लिये थे। इस उधार पर किसी तरह का इंटरेस्ट (ब्याज) नहीं लिया गया था, इसलिए पैसे देने वाले ऑफिसर ने इसे गिफ्ट मानते हुए इस पर टैक्स लगा दिया। अमित कुमार को पहले टैक्स के मामले की बात समझ में नहीं आ रही थी लेकिन जब उनको वस्तु स्थिति के बारे में जानकारी हुयी तो उन्होंने इसके खिलाफ कमिश्नर के पास अपील की, पर यहां कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद  अमित ने आईटीएटी मुंबई तक अपनी बात रखी। उनका तर्क था कि बिना ब्याज के उधार(लोन)पर कोई टैक्स नहीं लगना चाहिए क्योंकि ये लोन दो पार्टियों के बीच का समझौता है।

लोन कोई गिफ्ट नहीं होता और इसकी वापसी भी होती है, इसलिए इस पर कोई टैक्स नहीं लिया जाना चाहिए। इस बात पर एक ट्रिब्यूनल बेंच गठित की गयी। ट्रिब्यूनल बेंच ने पूरे मामले पर गौर किया और गौर करने के बाद कहा  कि अमित कुमार का मामला लोन के लेन-देन का है गिफ्ट का नहीं है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस लेन-देन के मामले को  पैसों का ट्रांजेक्शन करने वाले अफसर ने गिफ्ट के तौर पर मानकर इस पर टैक्स लगा दिया था। लेकिन बेंच ने इसे लेन-देन का मामला माना। बेंच का कहना था कि इस मामले को  सेक्शन 68 के तहत गौर किया जाना चाहिए था न कि गिफ्ट टैक्स एक्ट 56(2)(5) के तहत। लेकिन सेक्शन 68 के अनुसार लोन पर लागू होने वाले सारे प्रावधान भी अमित कुमार के मामले में लागू नहीं होते हैं। इसी वजह से अफसर ने इसे गिफ्ट टैक्स के अंतर्गत रखा था। इस मामले में कानून के दो सेक्शन एक ही तरह के लेन-देन पर लागू हो रहे हैं, जो सही नहीं है। प्रावधानों के अनुसार  बेंच ने निर्णय दिया के एक मामले पर एक ही तरह से टैक्स लगाया जा सकता है। अगर एक सेक्शन के अंतर्गत किसी चीज पर टैक्स लगाया जा रहा है, तो इस पर कोई भी दूसरा सेक्शन लागू नहीं हो सकता।

बेंच ने अमित कुमार के मामले में अंतिम निर्णय देते हुये कहा कि  इस लेन-देन को लोन का लेन-देन ही माना जाए और सेक्शन 68 के मुताबिक टैक्स लगाया जाए न कि सेक्शन 56(2)(5) के मुताबिक। इस तरह प्रावधानों के मुताबिक 50 लाख के लोन को अमित की आमदनी से जोड़कर टैक्स लेना सही नहीं है।  यहां एक बात तो साफ है कि टैक्स के मामले को प्रावधानों के अनुसार रखना ही सही होता है। यहां पर एक बात तो दिगर है कि अमित कुमार ने दोस्त से अपने आशियाने लेने के लिये जो उधार लिया था, वह वास्तव में लेन-देन का ही मामला था लेकिन टैक्स की दुनिया ऐसी है कि आप सीधे तौर पर बात को समझा नहीं सकते हैं। इस तरह के प्रावधानों को लाने से पहले सभी पहलूओं को साफ तौर पर आम लोगों को भी समझ में आनी चाहिये, नहीं तो लोग कहां-कहां तक जाते रहेंगे।

 

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