पटना की बढ़ती समस्या के बीच फल-फूल रहा है निर्माण की दुनिया

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संतोष सिंह तोमर, पटना

पटना जिस गति से विकास कर रहा है, उसी गति से यहां आवास की समस्या बढ़ती जा रही है। पटना में अब घर बनाने के लिए जमीन की समस्या है, जहां फ्लेट्स का निर्माण कर लोगों को बसाया जा सके। हालांकि एक तरफ जहां बिहार सरकार ने ग्रेटर पटना की अवधारणा विकसित कर फ्लेट निर्माण कंपनियों में आशा की किरण जगायी है, वहीं दीघा स्थित बिहार राज्य आवास बोर्ड के विवादित भूखंड को सुलझाने के लिए राज्य सरकार द्वारा बनायी गयी दीघा अर्जित भूमि बंदोबस्ती अधिनियम प्रभावी हो गया है। इसकी अधिसूचना नगर विकास एवं आवास विभाग ने जारी कर दी है। दीघा अर्जित भूमि बंदोबस्ती के तहत उस क्षेत्र की एक हजार एकड़ जमीन है।

मामला भूखंड का

इस भूखंड को आवास बोर्ड ने दो भागों में बांटा है, जिसमें एक भाग दीघा-आशियाना रोड के पूरब 600 एकड़ जमीन और रोड के पश्चिम 400 एकड़ का भूखंड है। अधिनियम के अनुसार 600 एकड़ भूखंड पर बनाये गये भवनों को वैध किया जायेगा, जबकि 400 एकड़ जमीन को आवास बोर्ड अपने कब्जे में लेकर विकसित करेगा। हालांकि 400 एकड़ वाले भूखंड पर भी छिटफुट मकान बनाये गये हैं, उन्हें तोड़कर बाजार भाव की कीमत या फ्लैट आवंटित करने का प्रावधान है। वहीं दूसरी ओर गंगा किनारे बने नौ अपार्टमेंट के बारे में पटना नगर निगम ने उच्च न्यायालय को बताया है कि छह अपार्टमेंट की सुनवाई पूरी हो चुकी है और तीन पर सुनवाई चल रही है। सुनवाई पूरी कर जल्द फैसला कर दिया जाएगा। निगम की तरफ से प्रधान अपर महाधिवक्ता ललित किशोर ने मुख्य न्यायाधीश रेखा एम. दोशित व न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार सिंह के पीठ को यह जानकारी दी। उन्होंने फैसला के लिए पीठ से कुछ और समय देने की मांग की। पीठ ने उन्हें समय प्रदान कर दिया और सुनवाई कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दी। लेकिन सही समय पर दोनों पक्ष उपस्थित नहीं हुए, जिसके कारण बहस की तारीख आगे बढ़ा दी गयी है। बिल्डर्स की तरफ से अधिवक्ता ने कहा कि निगम जान बूझकर जांच में देरी कर रही है। जांच को लेकर अभी तक कुछ नहीं किया गया है। निर्माण नहीं होने के कारण कई लोगों का पैसा फंसा हुआ है। न्यायालय निगम की अपील को निरस्त कर दे और उन लोगों को निर्माण के साथ अपार्टमेंटों के हस्तांतरण की अनुमति दे। न्यायालय ने इससे पहले सभी अपार्टमेंटों की सुनवाई पूरी करने के लिए तीन महीने का समय देते हुए सुनवाई स्थगित कर दी थी। निगम ने उस दिन कहा था कि बिल्डर्स ने अपार्टमेंट बनाये जाने के पक्ष में दावे के जो कागजात सौंपे हैं, उसका निपटारा तीन महीने में कर लिया जाएगा। न्यायालय ने इस बीच अंतरिम आदेश बरकरार रखा था। न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में निगम को किसी को आवासीय परिसर के इस्तेमाल की इजाजत नहीं देने और न ही बेचने तथा बिल्डर्स से अतिरिक्त निर्माण नहीं करने को कहा था। न्यायालय ने यह अंतरिम आदेश निगम की अपील पर दिया था। निगम ने कहा था कि एकल पीठ ने एक तरफ बिल्डर को निर्माण की अनुमति दे दी है और उससे सिर्फ बोर्ड लगाकर आम आदमी को बताने को कहा है कि उक्त अपार्टमेंट पर विजिलेंस केस चल रहा है।

जांच प्रक्रिया
दूसरी तरफ निगम को जांच करने को भी कहा गया था। निगम ने कहा था कि अगर निर्माण अवैध पाया जाता है तो उसे तोडऩा पड़ेगा। इससे आम आदमी का पैसा बर्बाद होगा। इसलिए न्यायालय निर्माण पर रोक लगा दे। निगम ने अपील दाखिल कर कहा था कि बिल्डर गंगा नदी के किनारे निर्माण कर रहे हैं जो प्रतिबंधित है। वह नक्शे के अनुसार भी अपार्टमेंट नहीं बना रहे हैं। गंगा एक्सप्रेस-वे बनने के दौरान वैसे अपार्टमेंट निर्माण में बाधा उत्पन्न करेंगे। इसे देखते हुए निर्माण पर रोक लगा दिया जाय। उसने यह भी कहा था कि निर्माण पर रोक नहीं लगाई गई तो एक दिन भयावह स्थिति पैदा हो सकती है। बिल्डरों ने कहा था कि उन लोगों को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया और निर्माण पर सीधे रोक लगा दी गई जबकि वे लोग नियम के तहत निर्माण कर रहे हैं। नक्शा भी निगम ने ही पास किया है। गंगा किनारे ही व्यवहार न्यायालय से लेकर पीएमसीएच और पटना विश्वविद्यालय बना है तो वे लोग क्यों नहीं निर्माण कर सकते। वे लोग आबादी वाले क्षेत्रों में निर्माण कर रहे हैं, जहां वर्षों से लोग रह रहे हैं और सरकार ने ही इन क्षेत्रों में सड़क बनवाई है। उनलोगों को अपना पक्ष रखे हुए दो साल हो गए और निगम ने उस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार गंगा किनारे मैरिन ड्राइव बनवा रही है और दूसरी तरफ बिल्डरों को निर्माण करने से रोक रही है।

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