बढ़ती आबादी और आवास की समस्या

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Houses in India
photo courtesy http://www.humanosphere.org

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या बढ़कर 121 करोड हो गर्ई है। यह जनसंख्या अमेरिका, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और बंग्लादेश की कुल जनसंख्या से अधिक है। देश के पिछले दशक में 18.1 करोड नई आबादी जुड गई। दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 प्रतिशत है, जबकि दुनिया की कुल जमीन का मात्र 2.4 प्रतिशत हिस्सा भारत के पास है।
बढ़ती जनसंख्या देश की आवास समस्या को भी बढ़ा रही है। आवास की कमी के कारण देश के करोड़ों लोग इस मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। आवास एवं शहरी गरीबी निवारण मंत्रालय के आकड़ों के अनुसार देश में लगभग 2.47 करोड़ मकानों की कमी पाई गई है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार देश की अधिकांश रिहायशी इकाइयों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण आराम व सुख की जगह परेशानी एवं तनाव की स्थितियां दिखाई देती है। स्थिति यह है कि शहरों में मकानों की कमी के कारण मलिन बस्तियां वर्ष प्रतिवर्ष तेजी से बढ़ती जा रही है। दुनिया की सबसे अधिक मलिन बस्तियां भारत में है। शहरी भारत के लगभग चार फीसदी हिस्सें पर मलिन बस्तियां बनी हुई है। वर्ष 2009 में देश के 400 छोटे बड़े शहरों में रहने वाले 30 करोड लोगों में से 6 करोड से अधिक लोग 52 हजार मलिन बस्तियों में रहते हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है कि मलिन बस्तियों के लोग ढेर सारी कठिनाइयों और बदतर हालातों के बीच नारकीय जीवन यापन करने पर विवश है।

जबकि शहरीकरण में स्पष्ट रूप से उल्लेखनीय वृद्धि हुई है तथा 2031 तक अधिकांश जनता गांवों के स्थान पर शहरों और नगरों में रहने लगेंगी। इसके लिए शहरी शासन व्यवस्था में बडे सुधारों की आवश्यकता है, जो आज बहुत बेतरतीबी से बिखरी हुई है। खासकर दिल्ली इसका एक बडा उदाहरण है। साथ ही पेयजल तथा सफाई, आवागमन की सुविधाओं और बाजार तक पहुंच तथा उत्तम शैक्षिक व स्वास्थ्य सेवाओं जैसे बहुत से समान उद्देश्यों के लिए नगर पालिकाओं तथा पंचायत राज निकायों को साथ लाने के लिए संयुक्त व्यवस्थाओं की जरूरत है। शहरों को अपने आस-पास के देहाती इलाकों के लिए केन्द्र के रूप में काम करना चाहिए।
इसी के साथ श्रम शक्ति में हुई वृद्धि को समाहित करने के लिए देश को हर साल 10 मिलियन नौकरियां बढ़ानी पड़ेगी। यद्यपि स्थायी नौ फीसदी की वार्षिक विकास दर हमें गरीबी हटाने और उल्लेखनीय रूप से एच.डी.आई. सुधारने तथा सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में सूचीबद्ध बुनियादी सेवाओं को सुनिश्चित करने में सक्षम बनाएंगी। लेकिन इसके लिए प्रशिक्षित जन शक्ति में व्यापक विस्तार की जरूरत होगी। जब तक मात्रा गुणवत्ता में नहीं बदलती, तब तक एक युवा तबके से हम जिस जनसंख्या संबंधी लाभ का पूर्वानुमान कर रहे हैं, वह बोझ जैसी ही रहेगी।

एक ताजा अध्यन के अनुसार भारत की श्रम शक्ति नई वैश्विक जरूरतों के मुताबिक तैयार हो जाए, तो यह भविष्य में ऐसी पूंजी साबित होगी, जिसकी मांग दुनिया के हर देश में होगी। विकसित देश औैर कई विकासशील देशों में वर्ष 2020 तक कामकाजी जनसंख्या की भारी कमी होगी, जबकि भारत में 4.50 करोड़ कामकाजी जनसंख्या अतिरिक्त होगी। ऐसे में वर्ष 2020 तक अमेरिका, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और रूस सहित अनेक देशों में कार्यशील लोगों की कमी के कारण लाखों रोजगार के अवसर भारतीय युवाओं की मुठ्ठी में होंगे।

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