सम्पूर्ण भारतीय समाज का दर्पण दिल्ली और मुम्बई

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मनोहर मनोज, संपादक ,इकोनॉमी इंडिया

यह बड़ी आम किवंदती है कि भारत की सारी समृद्घि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में दिखायी देती है। नयी आर्थिक नीति के बाद तो कई लोगों का यह तथ्य और पुख्ता हुआ कि ज्यादातर विकास चाहे वह रियल एस्टेट के क्षेत्र में हो, बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया जाने वाला भारी निवेश हो, बडेे बड़े शापिंगमॉल और शोरूम हो या फिर आधुनिक उपभोक्तावाद के सारे साक्षात नजारे, इन्ही दो शहरों को मुख्य रूप से मयस्सर हुआ। वैसे भी देश या विदेश के कुछ ड्राइंगरूम विश्लेषक जब भारत से संबंधित किसी तरह की चर्चा करते हैं तो उनकी चर्चा मुख्य रूप से दिल्ली और मुंबई शहरों को लेकर ही केन्द्रित होती है। परंतु फर्क ये है कि भारत देश इस दिल्ली और मुंबई से कई गुना बड़ा है। दिल्ली और मुंबई महानगरों का क्षेत्रफल और इसकी जनसंख्या से भारत का क्षेत्रफल और जनसंख्या क्रमश: एक हजार गुना और 35 गुना बड़ा है। दुनिया के हर देश चाहे वह जनसंख्या बहुल हो या अल्प जनसंख्या वाले उनके यहांचार छह शहर ऐसे जरूर होते हैं, जहां उनकी आबादी ज्यादा घनीभूत होती हैं। जहां आर्थिक व व्यापारिक गतिविधियां ज्यादा केन्द्रित होती हैं। जहां सरकार के दफ्तर वगैरह ज्यादा होते हैं। इस दृष्टि से भारत महादेश में भी ऐसे पांच छह महानगर जरूर हैं। पर इनमे दिल्ली और मुंबई हीं भारतीय अस्मिता के दो केन्द्रीय शहर हैं।

दिल्ली जो देश की राजधानी है, देश की पॉलीटिक्स है तो मुंबई जो देश की आर्थिक गतिविधियों का सबसे प्रमुख केन्द्र, देश की इकोनॅामिक्स है। यह सबको मालूम है कि इकोनॅामिक्स और पॉलीटिक्स दोनोंएक दूसरो को प्रभावित करते हैं। पॉलीटिक्स को समूचे देश का मतदाता मार्केट चाहिए और इकोनामिक्स यानी बिजनेस को भी समूचे देश के उपभोक्ता का मार्केट चाहिए। मतलब यह है कि दिल्ली और मुंबई के लिए यह समूचा देश एक मार्केट और समूचे देश के लिए ये दिल्ली और मुंबई मार्केट है। आज देश का विशाल मानव संसाधन इन्हीं दो शहरों की तरफ अपने जॉब के लिए पलायन करता है। कृषि के लिए औद्योगिक उत्पाद और उद्योगों के लिए कृषि उत्पाद के भी यही सबसे बड़े केन्द्र हैं। मतलब दिल्ली इस देश का पॉलीटिकल एक्सचेंज है तो मुंबई इकोनामिक एक्सचेंज है। हालांकि ये बात मोटी तौर पर कही जा रही है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली को बिजनेस से मतलब नही है या मुंबई को पॉलीटिक्स से कोई मतलब नहीं है।

पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि भारत में यदि शहर की संस्कृति, कारोबार की मात्रा और निवास करने वाले लोगों की संख्या के हिसाब से देखें तो भारत में मुंबई के समकक्ष कोई शहर था तो वह कोलकाता था। बल्कि कोलकाता जनसंख्या और उद्योग के हिसाब से 1980 तक देश का सबसे बड़ा शहर था। 1911 के पहले कोलकाता देश की राजधानी भी थी। और आजादी के बाद कोलकाता शहर देश की व्यापारिक गतिविधियों के मामले में मुंबई से भी बड़ा केन्द्र था। 1980 के बाद मुंबई अपनी विनिर्माण और पूंजी बाजार की गतिविधियों की वजह से देश का सबसे बड़ा शहर बन गया पर तदुपरान्त वहां कपड़ा मिलों में लंबी चली हड़ताल से कपड़ा उद्योग के विस्थापित होने के बाद मुंबई को तो देश का मैन्युफैक्चरिंग कैपिटल नहीं कहा जा सकता। दरअसल मुंबई आज भारत का वित्तीय कैपिटल ही हैै, जो देश के मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार का सबसे बड़ा केन्द्र है। 1990 तक आते आते मुंबई जहां जनसंख्या के हिसाब से देश का सबसे बड़ा शहर बन गया। वही इन वर्षो के दौरान राजधानी दिल्ली में व्यावसायिक गतिविधियों के विस्तार ने उत्तर भारत में इसे कोलकाता का एक स्थानापन्न शहर बना दिया। एक दौर था जब देश के जनसंख्या बहुल राज्यों में उपलब्ध श्रमशक्ति चाहे पूर्वी यूपी की हो या बिहार की, सब हावड़ा की ओर कूच करते थे। रोजगार और शहरी रहन सहन की चमक दमक पाने के लिए इन स्थानों से कोलकाता की तरफ सबसे ज्यादा जनसंख्या का पलायन हो रहा था। जबकि देश के अन्य हिस्से की बात करें खासकर दक्षिण भारत की तो 60 के दशक में चेन्नई और बेंगलोर अभी देश के महानगर बनने की प्रक्रिया में ही थे। यहां के कामगारों को अपनी महानगरीय सपनों को साकार करने का केन्द्र मुंबई मिला। यही वजह है कि दक्षिण भारत के सभी प्रांतों के काफी लोग मुंबई में है जो वहां के निवासी बन चुके हैं।
70 के दशक में यूपी के प्रवासी मजदूर कोलकाता के अलावा मुंबई भी भारी तादात में जाते रहे थे। पर 80 के दशक के शुरू में उत्तर भारत के प्रवासी समाजविज्ञान में एक संक्रमणकालीन दौर की शुरूआत हुई। बिहार और पूर्वी यूपी के खेतीहर श्रमिकों में पहली बार पलायन की शुरूआत हुई जिन्हें हरित क्रांति से सराबोर पंजाब व हरियाणा के किसानों ने बेहतर मजदूरी व पगाड़ के जरिये आकर्षित किया। इसी के साथ थोड़ा पढ़े लिखे और फैक्टरियों में काम करने वाले जो लोग पहले कोलकाता जा रहे थे, वहां उद्योगों में आई तालेबंदी और हड़ताल से उनका रूख दिल्ली और मुंबई की ओर मोड़ दिया। आज कोलकाता में बिहार और यूपी के लोगों की संख्या है पर ज्यादातर जनसंख्या वही है जो वहां शहर की स्थायी निवासी बन चुकी है। फलोटिंग जनसंख्या पिछले दो दशक से मुंबई और दिल्ली की बढ़ रही है। उत्तर भारत के दो अति जनसंख्या बहुल राज्यों यूपी और बिहार को देखें तो यूपी के ज्यादातर जिलों के मजदूर, पढ़े लिखे और दस्तकार मुंबई की ओर कूच करते हैं और बिहार के ज्यादातर जिलों के लोग दिल्ली की ओर कूच करते हैं। यदि मुंबई को यूपी का और दिल्ली को बिहार का प्रवासी महानगर कहा जाए तो इसमे कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

पलायन के कारण

मुंबई की उत्तर भारतीय पहचान यूपी के भैया लोगों से हैं जबकि दिल्ली की प्रवासी पहचान स्पष्ट रूप से बिहार के मजदूर और कुशल कर्मचारियों से होती है। आखिर क्या वजह है कि बिहार के लोग दिल्ली और यूपी के लोग मुंबई की तरफ कूच करते हैं। इसका सीधा उत्तर ये है कि तीन दशक पूर्व ही मुंबई में यूपी के लोगों का काम की तलाश में जो प्रवास हुआ उसके बाद वहां इन इलाकों के लोगों के जाने की एक कड़ी बन गयी। क्योंकि शहर की ओर पलायन करने वाला व्यक्ति कहीं न कहीं से कोई रिश्ता, जान पहचान या गांव का व्यक्ति जो वहां रह रहा है उसके बुलावे या उसके वहां रहने की प्रेरणा से प्रेरित होकर उसकी ओर कूच करता है। यही स्थिति बिहार के लोगों की दिल्ली के साथ है।
हम कहने के लिए भले कह दें कि देश के ये दो सबसे बड़े शहर देश की आत्मा के प्रतिनिधि नहीं हैं। पर एक तरह से देखा जाए तो यही दिल्ली और मुंबई अपने आप में एक मिनी भारत भी है। यदि दिल्ली में चमचमाती सड़के, बेहतरीन फूटपाथ और बेहद खूबसूरत बगीचे व पार्क हैं, तो दूसरी ओर यहां ऐसे कई नजारे भी मिलेंगे जो भारत के दूरदराज के गांवों के वीभत्स नजारे जहां बदबदाती नालियां, सड़कों पर भीख मांगते बच्चे दिखायी देंगे। दूसरी तरफ मुंबई जहां समुद्र के तटों पर स्काइलाइन और स्काईक्रैपर्स यूरोपीय देशों का नजारा पेश करते हैं, उसी मुंबई के लोकल ट्रेन में जनसैलाब ऐसा होता है मानों समूचा भारत उसी में समाहित हो गया हो। धारावी में झुग्गियों का समंदर दिखायी देता है। शहर में गंदगी और कूड़े का बेहिसाब ढ़ेर हैं। दिल्ली और मुंबई देश के दो सबसे समृद्घ केन्द्र, बखुबी अपने आप में समूचे भारत के समाज का एक आईना भी जरूर दिखाते हैं। आप दिल्ली और मुंबई शहरकी गतिविधियों और कारोबार को नजदीक से देखें तो आप पाएंगे कि देश की पॉलीटिकल राजधानी दिल्ली, कॉमर्शियल राजधानी मुंबई एक तरह से देश के जनजीवन और समाज की भी एक जीती जागती तस्वीर हैं।

मुंबई और दिल्ली पूरे भारत का प्रतिबिम्ब

आप मुंबई के तमाम उपनगरीय इलाको से लेकर बड़े town एरिया तक चाहे वहां के ट्रेन से सफर कर के देंखे, बेस्ट की बसों पर बैठकर देखें या फिर वहां के बाजार की गलियों में घूमकर देखें ऐसा लगता है कि देश की इस आर्थिक राजधानी में समूचे भारत का समाजविज्ञान प्रतिबिंबित हो रहा है। लोकल ट्रेन में सफर करते देश के तमाम कोनो से आए मेहनतकश अपने अपने काम के लिए अपने ऑफिस और फैक्टरी पहुंचने की आपाधापी में जब दिखते हैं। सब चाहते है आज 3०० रुपये की पगार पर काम कर रहे हैं, कल को ज्यादा पगार का काम मिल जाए। घर पर मां-बाप और पत्नी बच्चे को पैसा भेजना है। मुंबई में चलते फिरते, ट्रेन में सफर करते, टैक्सी-ऑटो में चलते ,फोन बूथ में बात करते लोग, बाजार में घूमते-फिरते जहां जाएं, आप को यूपी और बिहार की अवधी और भोजपुरी के टोन में बात करते लोग मिलेंगे। करीब तीन दशक पूर्व राकेश बेदी ने तो दूरदर्शन पर अपने सीरियल गुणी राम का बेहद सजीव चित्रांकन किया था।

यूपी के तमाम जिलों के लोग मुंबई में टैक्सी-ऑटो चलाने, दूध-पान का कारोबार करते हैं या तमाम कुशल-अकुशल मजदूरी में लगे हैं। इसी तरह आप दिल्ली घूमे, यहां चलते फिरते, बिहार के प्रवासी मजदूर या कुशल-अर्धकुशल लोग मिलेंगे। जाहिर है इन दोनो शहरों में देश के दो जनसंख्या बहुल राज्यों जहां देश की 31 करोड़ आबादी रहती है,के सबसे ज्यादा प्रवासी श्रमिक या पढ़े लिखे बेरोजगार दिखायी देते हैं। या तो ये आप को बिहार के समस्तीपुर, मधुबनी, पूर्णिया के, हाजीपुर के, मुजफ्फरपुर के लोग दिखायी पड़ेंगे। पर ऐसा भी नहीं है दिल्ली और मुंबई में सिर्फ बिहार और यूपी है। मुंबई में देश के और प्रांत के लोग हैं, चाहे वह बंगाल हो, केरल हो, कर्नाटक हो या गुजरात का।

मुंबई के शेयर मार्र्केट में स्थानीय मराठियों की उपस्थिति ना के बराबर है। समूचा कारोबार गुजरातियों द्वारा किया जाता है। जबकि दिल्ली में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी की छाप पूरी तरह दिखायी पड़ती है। उत्तर भारत के अलावा थोड़े बहुत दक्षिण भारत का वर्चस्व दिखायी पड़ता है। दिल्ली और मुंबई की कुल पौने चार करोड़ की आबादी जो पिछले करीब 3०-4० सालों के दौरान यहां प्रवासी लोगों के जरिये संरचित हुई वह देश के दूरदराज प्रांतों के गांवों, कस्बों और शहरों से आए करोड़ो लोगों का आशियाना बनी है। आज मुंबई में रहने वाले तमाम भैय्या लोगों के दिल में उनका गृह जिला चाहे जौनपुर चाहे बनारस या देवरिया या इलाहाबाद जरूर धड़कता रहता है। वही स्थिति दिल्ली में बिहार की दिखायी देती है जहां परंपरागत छठ पूजे से जमुना के घाट पटे हुए दिखायी देते हैं।

विकास के ड्राइंगरूप विश्लेषक देश के तमाम छोटे शहरों से दिल्ली और मुंबई में हो रहे पलायन की एक बड़ी गंदी तस्वीर पेश करते हैं। इन कथित विशेषज्ञों से यह सवाल पूछना चाहिए कि दुनिया का सबसे धनी देश अमेरिका में वहां के तीन से ज्यादा शहरों ,न्यूयॉर्क, शिकागो और लास एंजिल्स की आबादी एक करोड़ से ज्यादा क्यों हो गयी है, जबकि वहां के हर प्रांत विकसित हैं, जनसंख्या आधिक्य की स्थितिही नहीं बल्कि इसका भूभाग भारत से ढ़ाई गुना बड़ा है। बीजिंग, टोकियो, शंघाई और हांगकांग की आबादी एक करोड़ से ज्यादा क्यों है? क्या वहां भी यूपी और बिहार के लोगों ने जनसंख्या बढ़ा दी है। हर देश के शहरीकरण की यह प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, जब महानगरों में आबादी की रफ्तार ज्यादा होती है तब वहां आर्र्थिक वाणिज्यिक विकास कीरफ्तार ज्यादा होने की वजह से श्रम और बाजार की गतिशीलता भी वहां ज्यादा होती है। नतीजतन वहां स्थायी और फलोटिंग जनसंख्या दोनों तेजी से बढ़ती है। इन स्थानों में कुशल और अकुशल कामगारों की मांग ज्यादा होती है। इससे देश के बाकी हिस्से से लोगों का पलायन होता है चाहे उद्यम करने के लिए हो या फिर पेशेवर के रूप में हो। इसी तर्ज पर भारत में मुंबई और दिल्ली सहित दर्जन भर शहरों में आबादी बढ़ रही है जो विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया हैs। चीन में यही स्थिति है। अलबत्ता इसी के समानांतर देश के छोटे छोटे शहर में भी बुनियादी सुविधाओं का विकास जरूरी है साथ हीं महानगरों में जहां आबादी बढ़ रही है वहां उसी हिसाब से नागरिक सुविधाओं की प्लानिंग और उसमें भारी निवेश जरूरी है। बहरहाल दिल्ली और मुंबई भारत की पालीटिक्स और इकोनामिक्स हीं नहीं इस देश की सोशियोलाजी भी हैं।

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