किचिन का आग्नेय कोण में होना कितना उचित?

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वर्तमान में जो घर बन रहे हैं, उसमें किचिन के साथ ही स्टोर बनाए जाते हैं और पानी के मटके भी किचिन के अंदर प्लेटफॉर्म पर रखे जाते हैं। झूठे बर्तन धोने का सिंक भी किचिन में ही होता है। कई घरों में तो मुझे देखने में आया है कि बर्तन धोने के लिए छोटी सी सिंटेक्स की टंकी रसोई के अंदर ही छत पर फीट करा देते हैं। किचिन से निकलने वाले गंदे पानी की निकासी सुचारू से हो इसके लिए ज़मीन में चैम्बर भी बनाया जाता है। लंबे समय तक उपयोग में आना वाला खाद्यान्न जैसे गेहूं, चावल, दालें, वर्ष भर उपयोग में आने वाले मसाले, घी, तेल इत्यादि भी आग्नेय कोण स्थित किचिन में न रखते हुए वायव्य कोण स्थित स्टोर में रखा जाता था। ताकि, घर के खाद्यान्न सुरक्षित रहे।

घर का किचिन और आग्नेय कोण

वास्तुशास्त्र के सभी प्राचीन ग्रंथों में लिखा है कि घर का किचिन आग्नेय कोण में होना चाहिए। प्राचीन काल में जब यह ग्रंथ लिखे गए थे, तब किचिन में केवल भोजन बनता था। वहां केवल अग्नि प्रज्वलित होती थी, पानी का कोई विशेष काम नहीं होता था। लंबे समय तक उपयोग में आना वाला खाद्यान्न जैस गेहूं, चावल, दालें, वर्ष भर उपयोग में आने वाले मसाले, घी, तेल इत्यादि भी आग्नेय कोण स्थित किचिन में न रखते हुए, वायव्य कोण स्थित स्टोर में रखा जाता था। ताकि घर के खाद्यान्न सुरक्षित रहे। पीने का पानी रखने का स्थान और बर्तन धोने की जगह घर के आंगन में होती थी। वर्तमान नैऋत्य, आग्नेय, वायव्य, उत्तर ईशान, दक्षिण,पश्चिम, पूर्व में पालतू, जानवर और मवेशी खाना एवं धान्यागार, शयन कक्ष, खजाना और भंडार, दवाईयों को रखने का स्थान, पूजाघर, भारी सामान और औजार रखने का स्थल, तथा सीढिय़ा, शौचालय शयन कक्ष, घी तेल संग्रह, चक्की स्थान, रसोईघर, सहानुभूति प्रकट करने की जगह, भोजनशाला, अध्ययनकक्ष, प्रसूतिगृह, स्नानागार, दही मंथन स्थान होता है।

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार वास्तु निर्माण की योजना

आजकल किचिन में आग के साथ-साथ पानी का भी खूब उपयोग होता है और पानी की निकास के लिए आग्नेय कोण में चैम्बर रूपी गढ्ढा भी बन जाता है। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या वर्तमान समय में किचन आग्नेय कोण में होना सही है? क्योंकि…….
-जब कभी आग्नेय कोण में अधिक मात्रा में पानी का जमाव हो तो वहां रहने वाले या तो आर्थिक कष्ट में रहते हैं अथवा घर की किसी कन्या संतान को अपमान का सामना करना पड़ता है। ध्यान रहे कि यह समस्या आग्नेय कोण में अधिक मात्रा में पानी के होने के कारण है।
-यदि किचिन के साथ स्टोर रूम हो तो उस परिवार को अपने करियर, प्रोफेशन और धंधे में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्हें कमाने में बहुत मेहनत करना पड़ती है और सारी कमाई खर्च हो जाती है और भविष्य के लिए कुछ बचत नहीं कर पाते हैं

-पूर्व आग्नेय कोण में किसी भी प्रकार का गढ्ढा विवाद और कलह का कारण बनता है।

-किचिन की स्थिति को लेकर जन साधारण के मन यह बात वास्तुविदों द्वारा बैठा दी गई है कि किचिन केवल आग्नेय कोण में होना चाहिए परंतु ऐसा बिल्कुल नहीं है।
घर की विभिन्न दिशाओं में किचिन होने से जो प्रभाव परिवार पर पड़ता है, वह निम्नानुसार है।

ईशान कोण में: ईशान कोण में किचिन होने पर वहां रहने वाले परिवार के सदस्यों को सामान्य सफलता मिलती है। उस परिवार की बजुर्गु महिला, पत्नी, बड़ी बेटी या बड़ी बहू धार्मिक प्रवृत्ति की होती है, परंतु घर में कलह भी होती है।
पूर्व दिशा में: वह घर जहां पूर्व दिशा में किचिन होता है, उस घर में पैसे की आवक अच्छी रहती है, परन्तु घर की पूरी कमान पत्नी के पास होने के बाद भी पत्नी की खुशियों में कमी रहती है, साथ ही उसे पित्त की शिकायत, युट्रस डिसआर्डर, स्नायु तंत्र की दुबर्लता आदि की समस्या रहती है।
आग्नये कोण में: किचिन की यह स्थिति बहुत शुभ होती है। आग्नेय कोण में किचिन होने पर घर की स्त्रियां खुश रहती हैं। समस्त प्रकार के सुख रहता है और घर की मालकिन की सत्ता किचिन में चलती है।
दक्षिण दिशा में: यहां किचिन होने से परिवार में मानसिक अशांति बनी रहती है तथा घर के मालिक को क्रोध भी अधिक आता है और उसका स्वास्थ्य साधारण रहता है।
नैऋत्य कोण में: जिन घरों में किचिन दक्षिण नैऋत्य कोण में होता है। उस घर की मालकिन ऊर्जा से भरपूर, उत्साहित और रोमांटिक तबियत की होती है। किंतु मालिक मालकिन को समय नहीं दे पाता है, जिस कारण आपसी खटपट होती है।

पश्चिम दिशा में: ऐसे घर जहां किचिन पश्चिम दिशा में होता है, उस घर का सारा कार्य घर की मालकिन देखती है। उसे अपनी बहू-बेटियों से काफी खुशियां प्राप्त होती है, उनके किचिन में घर की सभी महिला सदस्यों में आपसी तालमेल अच्छा बना रहता है। परंतु यहां किचिन होने से खाद्यान्न की बर्बादी ज़रूर ज्यादा होती है। ऐसे किचिन में हमेशा ज़रूरत से ज्यादा बनी या आई खाद्य सामग्री बांटनी ही पड़ती है। आप इसे बर्बादी समझें या प्रभु की कृपा कहें।
वायव्य कोण में: जिनके घर का किचिन वाव्यय कोण में होता है, उस घर का मुखिया रोमांटिक होता है, जिसकी कई महिला मित्र होती हैं। घर की बेटी को यूट्रस की समस्या होती है और बेटी को बदनामी का भी सामना करना पड़ सकता है।

उत्तर दिशा में: जिन घरों में किचिन उत्तर दिशा में होता है, उस घर की स्त्रियां
बुद्धिमान तथा स्नेह रखने वाली होती है। उस परिवार के पुरुष सरलता से अपने कारोबार करते हैं और सफलता पाकर अच्छा धनोपार्जन करते हैं।
उदाहरण
दोस्तो! मेरे अपने घर का किचिन पिछले 15 वर्षों से पश्चिम दिशा में है और उदयपुर स्थित मेरी छोटी चचेरी बहन और मेरी सनावद स्थित मेरी पत्नी की छोटी बहन ने मेरे वास्तु परामर्श पर किचिन उत्तर दिशा में बनवाए हैं। इन पश्चिम और उत्तर दिशाओं में किचिन होने के जो प्रभाव ऊपर लेख में लिखें है वह प्रभाव हम सभी अपने परिवारों में महसूस कर रहे हैं। इसके अलावा भी मैंने कई घरों में उत्तर एवं पश्चिम दिशा में किचिन बनवाए हैं या उन्हें ऐसे फ्लैट पसंद करके दिलवाए हैं, जिसमें किचिन पश्चिम या उत्तर दिशा में है और वे सभी परिवारों का जीवन सरल एवं सुखद है।
सलाह
अत: मेरी सलाह है कि किचिन मध्य पश्चिम या मध्य उत्तर दिशा में बनाना चाहिए क्योंकि यहां पर अधिक मात्रा में पानी रखा जा सकता है। यहां से उत्तर दिशा के साथ-साथ पश्चिम दिशा का पाईप भी आसानी से उत्तर दिशा तक लाया जा सकता है, जहां ज़मीन में चैम्बर बनाया जा सकता है और उत्तर दिशा में बना चैम्बर वास्तुनुकुल होता है।
By-वास्तु गुरु- कुलदीप सलूजा

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