उत्तराखंड में आम लोगों के लिए घर का सपना और कठिन हुआ

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विष्णु गुप्त, उत्तराखंड

पहाड़ी इलाके में जहां गैर तकनीकी रूप से बने आवास असुरक्षित हैं और जीवन को खतरे में डालने वाले हैं, वहीं तकनीकी रूप से सुरक्षित आवास बनाने की क्षमता आम आदमी के पास नहीं हैं। बिल्डर द्वारा विकसित हो रही आवासीय कालोनियां इतनी महंगी है कि आम आदमी उसमें अपने आवास का सपना देख ही नहीं सकता है।

उत्तराखंड में अपना घर का सपना देखने वालों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सरकार ने उत्तराखंड में आवासीय निर्माण के क्षेत्र में कई प्रकार के प्रतिबंध लगाये हैं। सरकार द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों से निजात कैसे मिले, इस पर अभी तक कोई खास पहल नहीं हुआ है। इस पहाड़ी इलाके में जहां गैर तकनीकी रूप से बने आवास असुरक्षित हैं और जीवन को खतरे में डालने वाले हैं, वहीं तकनीकी रूप से सुरक्षित आवास बनाने की क्षमता आम आदमी के पास नहीं हैं। बिल्डर द्वारा विकसित हो रही आवासीय कालोनियां इतनी महंगी है कि आम आदमी उसमें अपने आवास का सपना देख ही नहीं सकता है। ऐसे भी बढ़ती महंगाई और सरकार द्वारा निर्माण के क्षेत्र में लगाये गये भारी-भरकम टैक्सों के कारण बिल्डर भी कम परेशान नहीं हैं, बिल्डर को न तो सस्ता श्रम मिल पा रहा है और न ही कम दाम पर निर्माण सामग्री मिल पा रही है। ट्रांस्पोर्टिंग खर्च इतना बढ़ गया है कि आवासीय निर्माण क्षेत्र में लगी कंपनियों का बजट काफी बढ़ जाता है। ऐसे में आवासीय निर्माण क्षेत्र में लगी कंपनियां अपने बढ़े हुए निवेश और बजट का लाभ आवासीय उपभोक्ताओं से ही वसूलेगी।
करे कोई, भरे कोई
उत्तराखंड की सरकार अगर गंभीर होती और आम जनता के प्रति पूर्ण रूप से जिम्मेदार होती तो निश्चित तौर पर आवासीय समस्या से जूझ रहे लोगों की समस्याएं कम होती और उन्हें सस्ती आवासीय सुविधाएं भी मिल सकती थी। पर दुर्भाग्य की बात यह है कि उत्तराखंड की सरकार ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया है। करे कोई भरे कोई, की कहावत उत्तराखंड में सही साबित हो रही है। उत्तराखंड मे आयी विपत्ति जिसकी करतूत थी, उसे सजा तो नहीं मिली पर उस करतूत की सजा आम आदमी को जरूर दी जा रही है।
उत्तराखंड विपत्ति किसकी करतूत
अब यहां यह सवाल उठता है कि उत्तराखंड में आयी विपत्ति किसकी करतूत थी और 15 हजार से अधिक मौतों और अरबों-खरबों की संपत्तियों के नष्ट होने के लिए जिम्मेदार कौन था? इसका उत्तर खोजने पर साफतौर पर पता चलता है कि उत्तराखंड की सरकार खुद जिम्मेदार थी। उत्तराखंड की सरकार ने बिना परिणाम का आकलन किये ही विकास योजनाओं को न केवल विस्तार दिया बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों और नदियों को बड़ी-बड़ी कंपनियों के हाथों सौंप दिया था।
पारिस्थितिकी से छेड़छाड़ घातक और जानलेवा
पारिस्थितिकी से अनावश्यक छेड़छाड़ न केवल घातक होता है बल्कि जानलेवा भी होता है। यही उत्तराखंड में हुआ। बड़ी-बड़ी पन बिजली परियोजनाओं के निर्माण के लिए सैकड़ों-सैकड़ों किलोमीटर लंबे सुरंग बनाये गये, सुरंग बनाने के लिए कई तरह के विस्फोट कराये गये। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पहाड़ की बनावट आतंरिक तौर पर कमजोर हो गयी। पहाड़ पर और पहाड़ के नजदीक बनाये गये मकानों की नींव कमजोर हो गयी।बादल फटने से पहाड़ का मालवा एकाएक नदियों में आ गिरा, बड़े-बड़े पत्थरों ने नदियों के बहाव को क्षतिग्रस्त किया, नदियां अपना रास्ता बदलने के लिए मजबूर हुई थी। इस कारण उत्तराखंड में हजारों-हजार मकान या तो पानी के बहाव में बह गये थे या फिर क्षतिग्रस्त हो गये थे। विपत्ति में छतिग्रस्त हुए मकान अभी तक बने नहीं हैं और जिन मकानों का अस्तित्व ही समाप्त हो गये थे उन मकान मालिकों के लिए कोई भी आवासीय योजना अभी तक नहीं आयी है।
मकान बनाने के नियम कड़े
पहाड़ी इलाकों में जहां नये मकान बनाने के नियम बहुत कड़े कर दिये गये हैं वहीं बड़ी आवासीय योजनाओं के निर्माण पर रोक लगा दी गयी है। पर्यावरण स्वीकृति को अनिवार्य कर दिया गया है। पर्यावरण स्वीकृति का प्रसंग तो और भी गंभीर है। नदियों के किनारे और पहाड़ो पर गांव बसाने या फिर एक्का-दुक्का मकान निर्माण की पर्यावरण स्वीकृति मिल ही नहीं सकती है। अगर मिलती भी तो लोगों को इसके लिए बड़ी दौड़-भाग करनी पड़ती है, राजनीतिक पहुंच की जरूरत होती है, इसके बावजूद नौकरशाहों की जेब गर्म करनी पड़ती है। यह सही बात है कि उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में आवासीय योजनाएं तेजी के साथ विकसित हुए हैं। आवासीय योजनाओं के निर्माण में कई नामी-गिरामी रियल स्टेट की कपंनियां लगी हुई हैं। खासकर हरिद्वार क्षेत्र में आवासीय योजनाएं काफी प्रगति की है।
सच्चाई
पर सच्चाई यह भी है कि उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में जो आवासीय योजनाएं विकसित हुई हंख वह आम-आदमी के लिए नहीं हैं? फिर ये आवासीय योजनाएं हैं किसके लिए? मैदानी क्षेत्रों में विकसित आवासीय योजनाएं अमीर लोगो के लिए हैं। कालाधन का भी खपत हो रहा है। दिल्ली सहित देश के अन्य भागों के अमीरो की दिलचस्पी कुछ ज्यादा ही है, इन्होंने निवेश किया है। एक-एक व्यक्ति के पास कई-कई फ्लेट हैं। धार्मिक नगरी होने के कारण भी हरिद्वार में आवासीय योजनाओं का विकास में तेजी आयी हैं और रियल स्टेट कंपनियों की तिजोरी दिन दुगनी-रात चौगुनी हुई है। समाज विकास के लिए आरक्षित सरकारी जमीन के साथ ही साथ वन विभाग की जमीन का भी अतिक्रमण हुआ है। पहाड़ी क्षेत्र के लोग मैदानी क्षेत्रों में आशियाना चाहते हैं। पर उनके सामने आर्थिक समस्या है। आर्थिक तौर पर वे जर्जर और असहाय हैं। मैदानी क्षेत्रो में ज्यादा महंगे बिक रहे फ्लेट और कोठियां वे ले ही नहीं सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों की संपत्तियां भी या तो बिकती नहीं हैं या फिर बिकती हैं तो काफी कम कीमत पर। पहाड़ी और मैदानी भागों की यह विंसगतियां ऐसी हैं जों उत्तराखंड के विकास और उन्नति पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती हैं। पहाड़ी और मैदानी क्षेत्र की विसंगतियों को कैसे पाटा जाये, इस गंभीर रूप से चिंतन-मनन करने की जरूरत है। पर उत्तराखंड की सरकार यह चिंतन-मनन करने के लिए अभी तक कोई प्रयास ही नहीं की है।
पर्यावरण पर असर के कारण
पर्यावरण की क्षति कोई छोटी-छोटी आवासीय योजनाओं से नहीं बल्कि बड़ी-बडी विकास योजनाओं से होती है। उतराखंड सरकार इस बात को ध्यान में क्यों नहीं रखती है। दरअसल बडी-बडी और लूटेरी कपंनियों की करतूत को छिपाने के लिए पर्यावरण स्वीकृति और अन्य नियम-कानूनों का सहारा लेती हैं। उत्तराखंड की सरकार को अब आवासीय निर्माण के क्षेत्र में लगाये गये अनावश्यक प्रतिबंधों को समाप्त करना चाहिए। खासकर पहाड़ के गरीब लोगों को आवासीय समस्या कैसे हल होनी चाहिए, इस पर वैज्ञानिक ढंग से सोचना होगा और कार्यावन्यन करना होगा। गरीब लोगों को स्वयं आवास बनाने के लिए तकनीकी व आर्थिक सहायता करनी चाहिए। पर सवाल यह है कि उत्तराखंड की सरकार क्या सही में अपने प्रदेश की जनता की आवासीय समस्या के हल के लिए गंभीर है?

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