वास्तुशास्त्र और टेक्नोलॉजी

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ऊर्जा के पैमाने को वास्तु विशेषज्ञों द्वारा टेक्नीकल इंस्ट्रूमेंट्स के द्वारा नापा जाता है। फिर भी प्राय: हर एक अलग-अलग जगह पर हमारा अर्ध चेतन मन, ज्ञानेन्द्रियों की संवेदनशीलता एवं अनुभव पर आधारित ज्ञान आदि सब मिल जुलकर हमें किसी भी भूखंड की शुद्धता व अशुद्धता का सांकेतिक आभास स्वत: ही दे देता है। ऐसे में भूमि का प्राकृतिक तरीकों से उपचार कर लेना चाहिए। आज भी वास्तुशास्त्र में प्राचीन वैदिक तौर-तरीकों को अपनाने की सलाह दी जाती है जिससे मानव जाति का कल्याण हो। वस्तुत: यह संभव नहीं कि भूमि के रंग, स्वाद, गंध एवं ऊर्जा के आधार पर भूमि का त्याग कर दें।

वास्तुशास्त्र में टेक्नोलॉजी का योगदान

आज के वैज्ञानिक युग में वास्तुशास्त्र से संबन्धित अनेक सेंसर व स्कैनर आ चुके हैं। जिनके द्वारा हम भूमि के भीतर, आस-पास की एवं स्पेस (पूरे ब्रह्मांड) की ऊर्जा का वैज्ञानिक विश्लेषण बड़ी आसानी से कर पाते हैं। तो आइये देखते हैं कि टेक्नोलॉजी का वास्तुशास्त्र के क्षेत्र में क्या योगदान है?

भूमि के नीचे की ऊर्जा का आकलन

कॉस्मोटेलरिक सेंसर के द्वारा हम भूमि की किस्म, इसकी सकारात्मकता एवं ऊर्जा की प्रकृति को जान पाते हैं। पुराने समय में लोग भूमि की मिट्टी को ले जाकर किसी गुरू, विशेषज्ञ या विद्वान पंडित को दिखाकर यह पता करते थे कि अमुक भूमि हमारे निवास या व्यवसाय हेतु उत्तम रहेगी या नहीं। वे लोग अपनी रहस्यमयी ज्ञान शक्ति द्वारा जिस ऊर्जा को पहचानते थे, आज वही काम कॉस्मोटेलरिक सेंसर करता है। इस उपकरण का एक भाग जो अर्थ पीस कहलाता है वह भूमि पर रखने से हैंड पीस में वाइब्रेशन भेजता है व इसी के आधार पर भूमि की सकारात्मकता एवं नकारात्मकता का पता चलता है। जिसे विज्ञान की भाषा में बोविस वैल्यू कहते हैं।

इसके मापन के आधार पर भूमि की निम्न किस्में हो सकती हैं।


सर्वोत्तम भूमि
– बोविस वैल्यू 11100 से 13500 तक की भूमि को टेक्नीकल वास्तु में सर्वोत्तम भूमि कहते हैं। यह हर एक प्रयोजन से सराहनीय होती है।
उत्तम भूमि-9500 से 11000 बोविस वैल्यू तक की भूमि को उत्तम भूमि की श्रेणी में रखा जाता है।
सामान्य भूमि-जिस भूमि की टेलरिक वैल्यू 900 बोविस से लेकर 9500 बोविस हो उसे सामान्य भूमि की श्रेणी में रखा जाता है।
असामान्य भूमि-यदि भूमि की ऊर्जा 9000 बोविस से भी कम हो तो उसे असामान्स भूमि कहते हैं।
अधम भूमि-यदि बोविस वैल्यू मापक यन्त्र किसी भूमि की ऊर्जा 8000 बोविस कम दर्शाता है वह निवास या व्यवसाय दोनों के लिए सराहनीय नहीं होती है।
पूर्णतया नकारात्मक
– भूमि-जिस भूमि के नीचे मानव या पशु कंकाल दबे हों ऐसे कब्रिस्तान एवं पुराने कुंए दबे होने पर बोविस वैल्सू 5000 से कम व यहां तक कि 2500 बोविस तक जा सकती है।

नकारात्मक एवं कम ऊर्जा की भूमि का उपचार

आज भी वास्तुशास्त्र में प्राचीन वैदिक तौर-तरीकों को अपनाने की सलाह दी जाती है जिससे मानव जाति का कल्याण हो। वस्तुत: यह संभव नहीं कि भूमि के रंग, स्वाद, गंध एवं ऊर्जा के आधार पर भूमि का त्याग कर दें। अत: भूमि की ऊर्जा को सकारात्मक बनाने हेतु निम्न उपाय व्यवहार में लाएं-
1.भूमि पर से कांटे, मलबा, कंकड पत्थर आदि हटाएं और उसे एक समान समतल करके उस पर हरी घास उगाएं व वहां चारों ओर व मध्य के ब्रह्म स्थान पर काली तुलसी उगाएं। इससे भूमि को नैसर्गिक सकारात्मकता प्राप्त हो सकेंगी। तुलसी उगाने के बाद 1 से 2 वर्ष बाद भवन निर्माण कर सकते हैं।
2.निगेटिव श्रेणी की भूमि पर चार दीवारी करके उसमें गाय को चरने के लिए स्वच्छंद छोड़ दें तो उसके गोबर, मूत्र एवं पसीने से निकलने वाली गंध आदि से भूमि 6 महीने के भीतर उत्तम हो जाती है।
3.नकारात्मक श्रेणी व भूखंड की 7-8 फुट गहराई तक की मिट्टी को हटाकर दूसरी साफ-सुथरी मिट्टी डालने से भी नकारात्मक भूमि को सकारात्मक बनाया जा सकता है।
4.असामान्य एवं अधम श्रेणी की भूमि पर हवन, यज्ञ एवं अन्य धार्मिक आयोजन करने में किए गए मंत्रोच्चारण से भी भूखंड की ऊर्जा को सकारात्मक बनाया जा सकता है।
5.काफी समय से बेकार पड़े खाली भूखंड से वहां के घास-कबाड़ व झाडियां हटाकर यदि उसपर एक दो वर्ष तक लगातार हरी सब्जियां, फूल व अल्पावधि के फल उगाए जाएं तो भूमि की प्रकृति सकारात्मक की जा सकती है। सुगंध वाले औषधीय पौधे जैसे पिपरमेंट, स्पेयरमिन्ट, लेमन ग्रास, धनिया, पोदीना अजवायन व सौंफ जैसे पौधे उगाकर भी भूमि की सकारात्मकता में वृद्धि की जा सकती है।
वास्तव में जिन प्राकृतिक तरीकों से भूमि का उपचार आदि काल से हो रहा है, उन सभी का प्रयोग आज के प्रयोगवादी वैज्ञानिक युग में भी इतना ही उपयोगी एवं प्रासंगिक है जितना वैदिक काल में था। ये तो ऊर्जा के इस पैमाने को वास्तु विशेषज्ञों द्वारा टेक्नीकल इंस्ट्रूमेंट्स के द्वारा नापा जाता है। फिर भी प्राय: हर एक अलग-अलग जगह पर हमारा अर्ध चेतन मन, ज्ञानेन्द्रियों की संवेदनशीलता एवं अनुभव पर आधारित ज्ञान आदि सब मिल जुलकर हमें किसी भी भूखंड की शुद्धता व अशुद्धता का सांकेतिक आभास स्वत: ही दे देता है। ऐसे में भूमि का प्राकृतिक तरीकों से उपचार कर लेना चाहिए।

By-
डॉ0 आनन्द भारद्वाज
(वास्तु, फेंगशुई एवं पिरामिड विशेषज्ञ)

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