अपनी शौक को बनाएं अपनी आय का साधन 

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photo courtesy https://smallbiztrends.com

  श्रीप्रकाश शर्मा

एक आम कहावत है कि जिन्दगी दुबारा नहीं मिलती और गुजरा वक्त और अवसर कभी लौट कर नहीं आता. लेकिन गौर से सोचेंगे तो यह पाएंगे कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन के सपनों को साकार करने के लिए दृढ प्रतिज्ञ हो तो उसकी राह में कोई भी परिस्थितियां बाधा बनकर खड़ी नहीं हो सकती है. इसके लिए यदि किसी चीज की जरुरत होती है तो वह है अपने लक्ष्य को पाने के लिए जुनून का और अदम्य साहस का. हमारे आस-पास में ही आपको ऐसे कई उदहारण मिल जायेंगे, जहां लोगों ने लाख मुसीबतों के बावजूद अपने शौक को अपनी काबिलियत तथा कामयाबी में बदला है.

 भूला-बिसरा शौक बना आय का साधन

गरिमा अपने कॉलेज के दिनों से अच्छा खाना खाने और बनाने की शौकीन थी. नए-नए ढंग के रेसिपी के अनुसार नए-नये डिश तैयार करना और उसके जायके में एक नयापन लाना उसके शौक में शामिल था. कॉलेज लेवल पर उसने कई प्रकार के डिश प्रिपरेशन तथा रेसिपी प्रिस्क्रिप्शन की प्रतियोगिताएं भी जीती थीं. बल्कि कई मैगजीन्स तथा न्यूज़ पेपर्स में कुकरी कॉलम के अंतर्गत उसके विभिन्न प्रकार के डिश के रेसिपी पर आलेख भी छप चुके थे. स्कूल के दिनों से ही वह अपने अच्छा खाने-खिलाने की हॉबी में अपना करियर बनाना चाहती थी. किन्तु किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. पिता की मृत्यु के तुरन्त बाद उसकी शादी हो गयी और एक बार जब वह अपने घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों में व्यस्त गयी तो उसे अपने इस शौक को पूरा करने का कोई ध्यान ही नहीं रहा. ससुराल में पति के ड्यूटी पर जाने के बाद उसके लिए खाली समय बिताना बहुत कठिन हो जाता था. फिर एक दिन अचानक उसे ध्यान आया कि फुर्सत के इस वक्त का इस्तेमाल अपने कॉलेज के जमाने के शौक को पूरा करने के लिए क्यों न किया जाए. गरिमा ने इस बारे में अपने हसबैंड से बात की तो उन्होंने भी स्वीकृति दे दी. गरिमा ने अपने घर के ही एक कमरे में कुकरी की क्लास शुरू कर दी. शुरू में तो उसे बड़ी परेशानी हुई क्योंकि क्लास स्टार्ट करने के लिए जितने धन का उसने निवेश किया था उस हिसाब से उतने स्टूडेंट्स नहीं आये. लेकिन कुछ महीनों में ही हाउसवाइव्स से लेकर स्कूल-कॉलेज की छात्राएं भी इस क्लास को ज्वाइन करने लगी. धीरे- धीरे उसकी कोचिंग क्लास में इतने स्टूडेंट्स हो गये कि गरिमा के लिए यह सब खुद मैनेज करना मुश्किल – सा हो गया. उसने अपनी सहायता के लिए दो असिस्टेंट भी रख ली और उसे आज खुद हैरानी हो रही है कि उसका कभी का भूला-बिसरा शौक उसके लिए एक मोटी आय का एक आसान-सा साधन बन गया है. इस प्रकार से देखें तो हम पाएंगे कि इस दुनिया में हर इन्सान में ऐसा कोई न कोई हुनर अवश्य होता है जिसकी बराबरी दूसरा कोई नहीं कर सकता है. समय रहते यदि इस प्रकार की विलक्षण प्रतिभा का यदि सदुपयोग किया जाये तो इससे खुद को संतुष्टि तो मिलती ही है साथ ही वह हमारे लिए एक अच्छे आय का जरिया भी बन जाता है. आज के तेज रफ़्तार से भागते जीवन में जहां हर व्यक्ति के पास समय का अभाव होता है तो हमें खुद में यह तलाश करनी चाहिए कि हम अपने हुनर तथा हॉबी का किस प्रकार व्यावसायिक रूप से दोहन करें.

हुनर तथा हॉबी का व्यावसायिक रूप से दोहन

ड्यूटी के दौरान लंच टाइम में घर का बना खाना खाने का हर एक व्यक्ति का सपना होता है. हर कोई यही चाहता है कि हमें बाहर से सड़े-गले खाना खरीदने की बजाय यदि घर से दो चपातियां और थोड़ी सब्जी मिल जाए तो उससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता है, परन्तु इस देश में लाखों व्यक्ति के लिए यह सोच महज सपना रह जाता है. मुंबई में डिब्बेवाला (टिफ़िन कैरियर) के नाम से जिस छोटी योजना के तहत ऑफिस में काम कर रहे कर्मचारियों को उनके घर वालों के द्वारा बनाये गये खाने को लंच के समय डिस्ट्रीब्यूट किया जाता है उसने अब एक उद्योग का रूप अख्तियार कर लिया है और यह अत्यंत लाभकारी तथा रोजगारपरक योजना विकसित देशों के रिसर्च का विषय बना हुआ है. सच पूछें तो इस प्रकार की योजना आप अपने शहर में भी शुरू कर सकते हैं बशर्ते आप खाना बनाने में रूचि लेते हैं और कुछ स्टाफ को मैनेज करने में आपको मजा आता है, अर्थात आपमें लीडरशिप क्वालिटी है. शुरू में ये सभी बातें बहुत छोटी और नाटकीय लगती हैं, लेकिन यकीन मानिये वक्त के साथ धीरे – धीरे यही छोटा उद्यम एक बहुत बड़ा बिज़नस एम्पायर बन जाता है, यही छोटा- सा बिज़नस आनेवाली पीढ़ी के लिए मील का पत्थर बन जाता है. लेकिन इस तरह की सफलता पाने के लिए धैर्य की नितांत जरुरत होती है और लोगों की आलोचनाओं के बावजूद हिम्मत बनाये रखने की बड़ी आवश्यकता होती है.

गार्डनिंग का शौक, आय का जरिया

अपने घर के आगे पोर्टिको या फिर बालकनी में खुबसूरत गमलों में विभिन्न प्रकार के फूलों की क्यारियों की सुन्दरता आज पूरी दुनिया में लेटेस्ट लाइफ स्टाइल तथा फैशन में शुमार हो चुका है. यदि आपको पौधों को संवारने, उनकी पत्तियों तथा टहनियों को प्रूनिंग करना अच्छा लगता है तथा सैप्लिंग्स के नरचरिंग में इंटरेस्ट लेते हैं और कभी आपने खुद का ऐसा कोई गार्डन तैयार करने का सपना देखा हो तो कोई शक नहीं कि आप विभिन्न प्रकार के तथा लेटेस्ट फैशन के फूलों और पौधों के नर्सरी एस्टेब्लिश कर सकते हैं. फिर अपने साथ पौधों को बढ़ता देखने के एक अलग आत्मसंतुष्टि के साथ आप एक अच्छी खासी आय भी अर्जित कर सकते हैं. ज़माने के साथ बदलते फैशन और कल्चर के साथ स्वागत समारोह या बर्थडे एनिवर्सरी या शादी के सालगिरह के अवसर पर बुके देने और लेने के रिवाज ने बड़े नगरों के साथ – साथ छोटे शहरों में भी बड़ी तेजी से युवाओं के बीच अपना क्रेज बना लिया है. नर्सरी की स्थापना के साथ फूलों के बिज़नस में बुके का एवरग्रीन फैशन और बिज़नस पारिवारिक आय को कई गुने बढ़ा सकता है. 1990 के आर्थिक सुधार के कारण ग्लोबलाइजेशन तथा वेस्टर्न कल्चर के बढ़ते लाइफ स्टाइल में भारत में आयातित वैलेंटाइन डे के अवसर पर गुलाब के फूलों की कीमतों तथा मांग में बेतहाशा वृद्धि ने इस क्षेत्र में रोजगार के साथ – साथ वार्षिक आय तथा टर्नओवर में आशातीत सफलता हासिल की है. खाड़ी के देशों तथा अन्य इस्लामिक देशों में परफ्यूम की मांग भी इन्हीं फूलों के व्यापार से जुड़ा हुआ है. कई कॉर्पोरेट आर्गेनाइजेशन अब फ्लोरीकल्चर के रूप में फूलों की खेती को फाइनेंस कर रहे हैं. भारत आज जापान तथा ऑस्ट्रेलिया सरीखे डेवलप्ड देशों को सबसे अधिक गुलाब के फूल का निर्यात कर रहा है. इस प्रकार के एक्सपोर्ट से देश में विदेशी मुद्रा के भंडार में  भी इजाफा होता है.

टेलरिंग का शौक

टेलरिंग का शौक एक बड़ी आय अर्जित करनेवाले शौक के रूप में आज एक बड़े उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है. एक टेलर महज कपड़ों को सिलकर उसे उपयोगी ही नहीं बनाता है बल्कि वह आपके पर्सनेलिटी को भी संवारता है. सोच कर देखिये कि यदि आपके पास टेलरिंग का कोई शौक है तो आप कितनी आसानी से उसे एक छोटे से बिज़नस का रूप दे सकते हैं और आप एक उद्यमी बनकर घर-परिवार की आय में अपना बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं. खासकर इस प्रकार के बिज़नस के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी स्थापना में बहुत अधिक धन निवेश की आवश्यकता नहीं होती है. इसकी शुरुआत अपने घर के एक छोटे से कमरे से की जा सकती है और निवेश के रूप में एक सिलाई मशीन और कुछ आवश्यक सामान की जरुरत के अतिरिक्त और किसी चीज की जरुरत नहीं पड़ती है. बड़ी-बड़ी ब्रांडेड कंपनियों के काम करने के तरीके को जब आप बारीकी से जानेंगे तो आपको बड़ी हैरत होगी. ये नामी-गिरामी मल्टीनेशनल कम्पनियां अपने रेडीमेड प्रोडक्ट्स जैसे पैन्ट्स, शर्ट्स इत्यादि लोकल मैन्युफैक्चरर से थोक में खरीदते हैं और फिर इसे मार्केटिंग के रूप में इन कपड़ों पर अपनी कम्पनी के मुहर का ठप्पा लगा देती हैं और हम यह मान लेते हैं कि यह उस इंटरनेशनल ब्रांडेड कम्पनी की प्रोडक्ट्स है जिसके आप बहुत बड़े शौक़ीन हैं. इस प्रकार यदि आप समय के साथ चलते हैं तो कोई शक नहीं कि आप इस टेलरिंग के शौक की सीढ़ी के रास्ते प्रसिद्धि तथा प्रोस्पेरिटी के उस मुकाम को हासिल कर सकते हैं जिसके बारे में आप केवल सपनों में ही सोचते होंगे.

टीचिंग

इसके अतिरिक्त यदि आप अपने स्कूल – कॉलेज के दिनों में एक टैलेंटेड स्टूडेंट रहे हैं और टीचिंग आपको आत्मसंतुष्टि प्रदान करता है तो निस्संदेह फुर्सत के समय को आप एक लाभकारी उद्यम के रूप में संवार सकते हैं. प्रारम्भ में आप कोचिंग क्लासेज छोटे लेवल पर अपने घर के खाली कमरों तथा डाईनिंग हॉल में शुरू कर सकते हैं और फिर जब आवश्यकता हो तो आप अपने शहर में अपनी जरूरत के हिसाब से कमरे किराये पर ले सकते हैं. जब कभी लगे कि आप इतने बड़े लेवल के इस काम को खुद अकेले नहीं मैनेज कर पा रहे हैं तो प्राइवेट ट्यूटर का भी अपॉइंटमेंट कर सकते हैं. यह मानकर चलिए कि लिटरेसी का परसेंटेज बढ़ने के बावजूद आज भी गांव से लेकर शहर तक एक अच्छे ट्यूटर का काफी अभाव है. ऐसी परिस्थिति में यदि आप क्वालिटेटिव एजुकेशन देने में सफल हो जाते हैं तो कोई शक नहीं कि आप इस बिज़नस में पैसे के साथ प्रेस्टीज कमा पाएंगे जो कि अन्य बिज़नस में कतई सम्भव नहीं होता है.

‘क्रेश’ या शिशु पालना गृह का प्रबंधन

आज के मेटेरियेलिस्टिक जमाने में जहां पति-पत्नी दोनों कामकाजी कपल होते हैं तो ऐसी परिस्थिति में छोटे बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी एक अर्जेंट प्रायोरिटी के रूप में शहरी कल्चर की एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में आ खड़ा हुआ है. सच पूछिये तो ऐसे कामकाजी माता-पिता के बच्चों के देख-रेख के लिए शहरों में ‘क्रेश’ या शिशु पालना गृह का प्रबंधन अत्यंत लाभकारी और रोजगारपरक उद्यम का अवसर साबित हो सकता है. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के उद्यम को प्रारम्भ करने के लिए निवेश के मामले में किसी बड़ी राशि की बिलकुल कोई आवश्यकता नहीं होती है. प्रारम्भ में यह कार्य अकेले किया जा सकता है जबकि बाद में जब यह काम बड़े पैमाने पर बढ़ जाए तो इस कार्य में असिस्टेंस के लिए किसी अन्य रिलाएबल एम्प्लोयीज की नियुक्ति की जा सकती है. इस बात में कोई शक नहीं कि क्रेश के रूप में शिशुओं के देख-भाल के लिए आपके व्यक्तित्व में धैर्य, दया, सहानुभूति, ममत्व, सहनशीलता तथा अन्य मानवीय गुणों की उपस्थिति पूर्व आवश्यक शर्तें हैं.

सजना और संवरना और आय का साधन

सजना और संवरना सभ्यता के आदिकाल से ही मानव की प्रकृति रही है. विशेष तौर पर यह महिलाओं का प्रिविलेज्ड एरिया माना जाता है. किन्तु इकॉनमी के लिब्रलाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन के साथ आज स्त्री के इस प्रिविलेज्ड एरिया में पुरुषों ने सेंध लगा दी है. मॉडर्न कल्चर के रूप में ब्यूटीफुल दिखना एक बड़ी इंडस्ट्री का रूप ले लिया है. तभी कहते हैं कि जो दिखता है वही बिकता है. आशय यह है कि यदि आपमें एस्थेटिक सेंस है तो आप लोगों को सजाने और संवारने के कुदरती शौक को एक उद्यम का रूप दे सकते हैं. आप अपने घर का वह कमरा जो कि बाजार में खुलता हो या फिर मेन रोड में ओपन होता है उसमें फीमेल ब्यूटी पार्लर तथा जेंट्स पार्लर के काम स्टार्ट कर सकते हैं. ब्याह-शादी से लेकर कई सामाजिक-पारिवारिक संस्कारों के अवसर के साथ-साथ पार्टी-फंक्शन के अवसर पर स्त्री-पुरुष खुद को ग्रूम करने के लिए ब्यूटी पार्लर अवश्य जाते हैं और ब्यूटी पार्लर की ब्लीचिंग से लेकर फेसिअल, ऑयब्रो, मसाज, हेअरकट, मैनीक्योर, पेडीक्योर तक की सेवाएं खूब बिकती हैं और इन सेवाओं के बदले ग्राहक कोई भी प्राइस देने को सहज ही तैयार  हो जाते हैं. हैरत की बात तो यह है कि खुद को सुन्दर तथा स्मार्ट दिखने का यह शौक ग्रामीण क्षेत्रों में भी बड़ी तेजी से क्रेज पकड़ रहा है. ब्यूटी के क्षेत्र में विश्वविख्यात शहनाज़ हुसैन तथा भारत के फिल्म उद्योग नगरी बॉलीवुड के फेमस हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब से लेकर सपना भावनानी किसी परिचय के मुहताज नहीं रहे हैं. इन सभी कलाकारों के पास भी शुरू में एक  सपना था और कुछ करने का अदम्य साहस. और उन्होंने अपने क्षेत्र में सोहरत के जिन बुलंदियों पर अपने पैर रखे हैं वह आज एक इतिहास बन चुका है. उन टैलेंटेड आर्टिस्ट के सपने तथा शौक तथा आपके सपने तथा शौक में महज फर्क इतना हो सकता है कि उन्हें अपने टैलेंट को एक्सप्लॉइट करने का मौका एक प्री-प्लांड तरीके से मिला जबकि इसी टैलेंट को आपको अपने लिए खुद के अवसर को पहचान करके एक्सप्लॉइट करनी है.

सच पूछिये तो इस धरती पर जन्म लेने वाला हर एक शिशु खुद में एक चमत्कार होता है और इस लिहाज से हम सभी अपने आप में विलक्षण प्रतिभा के धनी और प्रकृति के मिरेकल हैं. जरुरत महज उस प्रतिभा को पहचानने की है. जरुरत उस शौक को जीवित रखने की है. फिर जब एक बार आप अपने अन्दर के टैलेंट को पहचान लेते हैं तो उसके मैक्सिमम यूटिलाइजेशन के लिए आपको जागरूक रहना होगा. आपको अवसर के तलाश में रहना होगा और उस कोशिश में आपके रास्ते में जो भी मुश्किलें आती हैं उनका धैर्यपूर्वक मुकाबला करते हुए प्रगति की राह में धीरे ही सही लेकिन निरंतर आगे बढ़ते रहना होगा.

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