एक कतार में तीन से अधिक दरवाजे और वास्तु

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कुलदीप सलुजा, वास्तु गुरू

अक्सर देखने में आया है कि एक ही कतार में तीन से अधिक दरवाजे को होना शुभ नहीं माना जाता है, जबकि हकीकत इसके उलट है। वास्तुशास्त्र के किसी भी प्राचीन ग्रंथ में एक कतार में तीन या तीन से अधिक दरवाजे से होने वाले अशुभ प्रभाव के बारे में किसी प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है। बल्कि इसके विपरित भारत के ही कई प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिरों और महलों में तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक कतार में देखने को मिलते हैं। किसी घर में जब तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक कतार में होते हैं तो सामान्यत: पहला दरवाजा मुख्यद्वार और आखिरी वाला दरवाजा घर का पिछला दरवाजा होता है, यदि कोई भवन भारतीय वास्तुशास्त्र के सिद्धातों के अनुकूल बना हो तो, तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक कतार में रखे जा सकते हैं और  यह पूणर्त: शुभ होकर परिवार मेें सुख-शांति और समृद्धि लाते हैं।

हमारे देश के जनमानस के बीच पत्र-पत्रिकाओं और मीडिया से प्राप्त वास्तु की सतही जानकारी के आधार पर एक आम धारणा इतनी ज्यादा पैठ बना गई है कि घर में तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक कतार में लगे होना बहुत अशुभ होता है। यदि किसी परिवार में आर्थिक, मानसिक, शारीरिक या अन्य किसी प्रकार की परेशानियां चल रही हो और उसके घर में एक कतार में तीन या तीन से अधिक दरवाजे लगे हो तो वास्तुविद् उन्हें बहुत अशुभ बताते हुए एक दरवाजा कतार से हटाने की सलाह देते हैं।

जबकि सच्चाई यह है कि वास्तुशास्त्र के किसी भी प्राचीन ग्रंथ में एक कतार में तीन या तीन से अधिक दरवाजे से होने वाले अशुभ प्रभाव के बारे में किसी प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है। बल्कि इसके विपरित भारत के ही कई प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिरों और महलों में तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक कतार में देखने को मिलते हैं। जैसे-तिरूपति बालाजी, वृहदेश्वर मंदिर तंजावूर, एकाम्बरनाथ मंदिर कांचीपुरम्, मीनाक्षी मंदिर मदुरै, ज्योर्तिलिंग रामेश्वरम् मंदिर और तो और दक्षिण भारत के श्रीरंगम् स्थित चार किलोमीटर क्षेत्र में फैला श्रीरंगनाथ स्वामी मंदिर में तो सात दरवाजे एक कतार में हैं, जिसका दक्षिण दिशा स्थित मुख्यद्वार 236 फीट ऊंचा है।

एक कतार में तीन या तीन से अधिक दरवाजे होना अशुभ होता है, यह सिद्धांत चीनी वास्तुशास्त्र फेंगशुई का है। फेंगशुई में एक कतार में तीन दरवाजे न लगाने की सलाह देने के पीछे उनकी भौगोलिक परिस्थितियां है। बसंत ऋतु के दौरान चीन में उत्तर दिशा से रेतीले तूफान कजाकिस्तान, मंगोलिया व उत्तरी चीन से उठते हैं, जहां तूफानी हवाएं रेत व धूल के सूखे, महीन कण धरती की सतह से उठाकर पीले बादल बना देती है। ये बादल चीन, दक्षिण व उत्तर कोरिया, जापान, रूस के सुदूर पूर्वी हिस्सों तक जाते हैं। इन्हीं तूफानों के कारण हवा की गुणवत्ता बहुत खराब हो जाती है। हवाएं अपने साथ कई प्रदूषक तत्व भी ले आती हैं। जब ये तूफान आते है तो रेत व धूल के कारण देख पाना मुश्किल हो जाता है। स्वस्थ लोगों में भी गला बैठने व अस्थमा की शिकायत पैदा हो जाती है। अस्थमा अथवा सांस के रोगियो के लिए घर से निकलना प्राणघातक तक हो जाता है। धूल के कारण प्रभावित इलाके में मृत्यु दर 1.7 फीसदी तक बढ़ जाती है।चीन की उत्तर दिशा उठने वाले इन्हीं पीले रेतीले तूफानों के कारण फेंगशुई में उत्तर, पूर्व दिशा एवं ईशान कोण में दरवाजे खिड़की नहीं रखने की सलाह दी जाती है और इसी से जुड़ी है, तीन दरवाजे की समस्या।  किसी घर में जब तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक कतार में होते हैं तो सामान्यत: पहला दरवाजा मुख्यद्वार और आखिरी वाला दरवाजा घर का पिछला दरवाजा होता है, यदि कोई भवन भारतीय वास्तुशास्त्र के सिद्धातों के अनुकूल बना हो तो, तीन या तीन से अधिक दरवाजे एक कतार में रखे जा सकते हैं और   यह पूणर्त: शुभ होकर परिवार मेें सुख-शांति और समृद्धि लाते हैं। जैसे किसी भी भवन का मुख्यद्वार पूर्व में हो तो अंतिम द्वार पश्चिम में होंगे। यदि मुख्यद्वार पश्चिम में हो तो  अंतिम द्वारा पूर्व में होंगे। इसी प्रकार उत्तर दिशा में मुख्यद्वार  हो तो दक्षिण दिशा में अंतिम एक कतार मेंं तीन से अधिक दरवाजे और वास्तु द्वार होगा और यदि दक्षिण दिशा में मुख्यद्वार हो तो अंतिम  द्वार उत्तर दिशा में होगा। इसके विपरित चीन के इन तूफानों के कारण उत्तर, पूर्व  दिशा तथा ईशान कोण में दरवाजा रखने से बचा जाता है। इसलिए फेंगशुई में दरवाजा पूर्व  दिशा में पूर्व आग्नेय, तथा उत्तर दिशा में उत्तर वायव्य की ओर रखने की सलाह दी जाती है। ऐसी स्थिति में एक कतार में होने के कारण पूर्व आग्नेय का अंतिम दरवाजा पश्चिम नैऋत्य में होता है और उत्तर वायव्य का अंतिम दरवाजा दक्षिण नैऋत्य में होता है। इसी प्रकार मुख्यद्वार दक्षिण दिशा में दक्षिण नैऋत्य में रखा जाता है ताकि पिछला द्वार उत्तर वायव्य में खुले और पश्चिम दिशा में पश्चिम नैऋत्य में रखा जाता है ताकि पिछला द्वार पूर्व आग्नेय में खुले। वास्तुशास्त्र के अनुसार दरवाजों की यह स्थिति बहुत अशुभ होकर वहां रहने वाले परिवार के लिए विपदा का कारण बनती है। वास्तुशास्त्र और फेंगशुई के सिद्धांत समूचे विश्व में समान रूप से लागू होते हैं, क्योंकि यह शास्त्र सूर्य की किरणों एवं पृथ्वी पर बहने वाली चुबंकीय तरंगों पर आधारित है, जो मनुष्य द्वारा निर्धारित की गई, किसी भी देश की सीमा से प्रभावित नहीं होते हैं। इसलिए चीन में दरवाजों की इस स्थिति से उत्पन्न होने वाली समस्याओं से निजात पाने के लिए मुख्यद्वार के आगे पाकुआ मीरर, विंड चाईम तथा अन्य कई फेंगशुई के उपाए किए जाते हैं। मेरे अनुभव में आया है कि इन उपायों से कोई लाभ नहीं होता और ऐसे घरों में रहने वाले परिवारों को द्वार के अनुसार अपने जीवन में विपदाओं का सामना करना ही पड़ता है।

चीनी वास्तुशास्त्र फेंगशुई की कम्पास पद्धति, जिसमें चाइनीज कंपास लियोपान का प्रयोग किया जाता है। इस पद्धति में किसी भी व्यक्ति की जन्म तिथि के आधार पर उस व्यक्ति का कुंआ नम्बर निकाला जाता है। इसमें 1 से 9 तक कुंआ नम्बर होते है, जिसमें से 5 नम्बर का कुंआ नम्बर नहीं होता है। इन्हीं कुंआ नम्बर के आधार पर व्यक्ति विशेष के लिए शुभ-अशुभ दिशाओं का निर्धारण कर मकान का मुख्यद्वार का स्थान तय किया जाता है। मैंने 25 वर्षों  के वास्तु परार्मश के अनुभव में पाया है कि फेंगशुई की इस पद्धति से भी द्वार का स्थान निर्धारित करने के बाद भी गलत स्थान पर द्वार से होने वाले कुप्रभाव से बचा नहीं जा सकता। क्योंकि कुआं नम्बर के आधार पर निकला द्वार का स्थान केवल एक स्थान पर ही सही हो पाता है किंतु दूसरे स्थान पर सही नहीं होता है। जैसे किसी की जन्म तारीख 17 मार्च, 1952 हो तो उसका कुंआ नम्बर 3 होगा। फेंगशुई के अनुसार कुंआ नम्बर 3 वाले व्यक्ति पूर्व आग्नेय में द्वार रख सकते है परंतु उनका अंतिम द्वार पश्चिम नैऋत्य में आएगा, जो इस कुंआ नम्बर के लिए शुभ स्थान नहीं है। दोषपूर्ण स्थान पर लगा एक ही दरवाजा अशुभ होता है और यदि एक ही कतार में तीन या तीन से अधिक दरवाजे लगे हो और मुख्यद्वार के साथ-साथ अंतिम दरवाजा भी घर के पिछले भाग में दोषपूर्ण स्थान पर खुलता हो तो यह स्थिति अत्यंत दुखदायी एवं घातक होती है किंतु भारत के कुछ विद्वान वास्तुविदें ने बिना किसी शोध के यह भ्रांति फैला दी है कि किसी भी स्थिति में चाहे वह स्थिति शुभ हो या अशुभ एक कतार में तीन या तीन से अधिक द्वार शुभ नहीं होते हैं और एक द्वार कतार से हटाने से यह दोष दूर हो जाता है। मुझे देखने में आया है कि सामान्यत: वास्तुविद् बीच का कोई दरवाजा इधर-उधर करवा देते हैं, जबकि दोषपूर्ण स्थान पूर्व आग्नेय, दक्षिण नैऋत्य, पश्चिम नैऋत्य और उत्तर वायव्य में द्वार स्थित होने के कुप्रभाव से बच नहीं पाते हैं, चाहे वह मुख्य द्वार हो या पिछला द्वार हो इससे होने वाले कुप्रभाव में कोई फर्क नहीं पड़ता। इन अशुभ पर द्वार होने का कुप्रभाव इस प्रकार पड़ता है कि घर के पूर्व आग्नेय में द्वार होने पर घर में कलह और चोरी से नुकसान होता है। यदि इसी के साथ वहां रैम्प, गड्डा या ढलान हो तो घर का मालिक या मालकिन पाप कर्म करते हुए मानसिक दुख से पीडि़त रहते हैं।

पश्चिम नैऋत्य में चारदीवारी या घर का द्वार हो तो घर के पुरूष बदनामी जेल, एक्सीडेंट या खुदकुशी के शिकार होते हैं। हार्ट अटैक, आपरेशन, एक्सिडेंट, हत्या, लकवा या किसी प्रकार की जालिम मौत से मरते हैं। यह द्वार शत्रु स्थान का है। यदि इसी के साथ यहां किसी भी प्रकार की रैम्प, नीचाईयां, भूमिगत पानी का स्रोत हो तो, उस घर में किसी पुरूष सदस्य की आत्महत्या या दुर्घटना से मृत्यु हो सकती है अर्थात परिवार के पुरूष सदस्य के साथ अनहोनी होती है। उत्तरी वायव्य का प्रवेशद्वार दु:खदायी, कलहकारी, बैरभाव, मुकदमेबाजी व बदनामी लाने वाला रहता है। इसी के साथ यदि यहां रैम्प, गड्डा हो शत्रु की संख्या में वृद्धि, स्त्री को कष्ट, घर में मानसिक अशांति रहती है। दक्षिण नैऋत्य में घर या कम्पाउंड वाल का द्वारा हो तो उस घर के महिलाएं गंभीर बीमारियों के शिकार होती है। यहां किसी भी प्रकार का भूमिगत पानी का स्रोत होगा तो, आत्महत्या या दुर्घटना से मृत्यु हो सकती है या किसी प्रकार की अनहोनी का शिकार होती है। अनुभव में आया है कि जिस घर में डाका पड़ता है। उस घर के दरवाजे सब एक कतार में होते हैं।

मुख्यद्वार

उत्तर वायव्य में होकर सब से पीछे का बाहर पडऩे वाला दरवाजा अगर दक्षिण नैऋत्य में हो या पूर्व आग्नेय से पश्चिम नैऋत्य में एक कतार के दरवाजे हो। तो वहां डाका पड़ सकता है। यदि इन दरवाजों के दोष के साथ-साथ पूर्व आग्नेय और पश्चिम नैऋत्य दोनों तरफ नीचाई हो तो डाके के दौरान हिंसा होती है और किसी पुरूष सदस्यों की हत्या तक हो सकती है और यदि उत्तर वायव्य और दक्षिण नैऋत्य में यह स्थिति बने तो डाके के दौरान स्त्रियों के साथ दुराचार होता है, साथ ही उनकी हत्या होने की संभावना होती है। ऐसी स्थिति में कोई एक दरवाजा हटाने से इस दोष का निवारण ज़रूर हो जाता है, चाहे वह बीच का ही दरवाजा क्यों न हो।

दोस्तों! यदि आपके यहां तीन या तीन से अधिक द्वार एक कतार में भारतीय वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार लगे हैं तो आपको किसी भी प्रकार से चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है और यदि द्वार दोषपूर्ण स्थान पर लगा हो तो उसके अशुभ प्रभाव से बचने के लिए एकमात्र उपाय है कि गलत स्थान पर लगे द्वार हटाकर भारतीय वास्तुशास्त्र द्वारा निर्धारित सही स्थान पर लगाए जाए। इसके अलावा किसी भी  प्रकार के वैकल्पिक उपाए करना केवल समय और पैसा बर्बाद करने वाली बातें हैं।

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