मास्टर प्लान की हकीकत

0
662
Noida-Master-Plan-2031-
Master-Plan

आलोक कुमार सिंह

किसी भी शहर का मास्टर प्लान उस शहर के भविष्य को तय करता है। मास्टर प्लान पर बहुत कुछ निर्भर करता है और इसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। शहर में फ्लैट या आस-पास के लोकेशन में ज़मीन की मांग मास्टर प्लान को देखते हुए उसका रेट तय किया जाता है।

क्या होता है मास्टर प्लान?

मास्टर प्लान में उस शहर की पूरी प्लानिंग को दर्शाया जाता है कि किस एरिया का डेवलपमेंट कैसे किया जाएगा। कहां पर रेजीडेंशल होगा और कहां पर कॉमर्शियल। रोड, सीवर, मेट्रो और पार्क आदि कहां और कैसे होगी। मास्टर प्लान आते ही लोग अपने प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ाने लगते है। सभी अपने प्रॉपर्टी की कीमत अनाप-सनाप मांगने लगते हैं। मास्टर पलन में मुख्यत: शहर की ज़मीन का आवंटन अलग-अलग यूज के लिए किया जाता है। इसमें आम आदमी के लिए प्राइवेट मालिकाना हक की प्लानिंग अलग से की जाती है। मास्टर प्लान बानाने के समय पब्लिक पॉलिसी, व्यक्तिगत हित, रीडिस्ट्रब्यूशन, संचयन आदि पहलुओं पर विचार किया जाता हैं। इन सब तथ्यों का अवलोकन करने के बाद मास्टर प्लान को अंतिम रुप दिया जाता है।

मिथक नम्बर वन

यह एक महत्वपूर्ण गलतफहमी होती है कि मास्टर प्लान को अंतिम रूप देने के समय अनौपचारिक रूप से तय किया जाता है, जो सच्चाई से कहीं भी सामांजस्य नहीं बैठाता। मास्टर प्लान की तैयारी करने में तकनीकी डाटा का एक विस्तृत संग्रह और विश्लेषण को शामिल किया जाता है जैसे कि यातायात की स्थिति, भूमि की उपयुक्त, मिट्टी की स्थिति, पानी वनस्पति, बिजली और जल निकासी की व्यवस्था। इन मुख्य बिन्दुओं को मास्टर प्लान में देखकर उसे व्यवस्थित करने की कोशिश की जाती हैं। इसके बाद उस मास्टर प्लान का एक विजन तैयार किया जाता है जो प्राप्त डाटा को देखकर बीच का रास्ता निकाला जाता है। इसके अलावा प्लानिंग ऐसी की जाती है कि भविष्य में आने वाली समस्याओं से निपटा जा सके। हालांकि जो भविष्य में होने वाला है, उसका ठीक-ठीक आकलन नहीं किया जा सकता है, फिर भी तय मानक का अनुसार करना योजना को मूर्त रूप दिया जाता है। शायद इसलिए  मास्टर प्लान को अंतिम रूप देने के समय व्यापक रूप रेखा की जरूरत होती है और सभी को देखते हुए उस मास्टर प्लान में समायोजित किया जाता है।

कहां होती है चूक?

किसी भी शहर का मास्टर प्लान बनाने से पहले उस शहर के हर एक पहलु पर बारिकी से अवलोकन किया जाता है। लेकिन आज के समय में जो मास्टर प्लान बन कर लागू हो रहे है वह हकीकत से कोशों दूर है। मास्टर प्लान बनाने के प्रारंम्भिक दौर में प्लानर को उस शहर की तह तक जानकारी होनी चाहिए। शहर में रह रहे लोगों की राय इक्ट्ठा करनी चाहिए। उस शहर में रह रहा आदमी किन समस्याओं से जूझ रहा है और वह क्या चाहता है। इस तरह के कदम न तो प्लानर के द्वारा उठाए जाते है और न संबन्धित अथॉरिटी के द्वारा। यदि उस शहर में रह रहे लोगों से राय मांगा जाए और उसके अनुसार मास्टर प्लान बनाया जाए तो जो समस्या आती है वह यकीनन कम होगी और आम लोगों को उस मास्टर प्लान से अधिक लाभ होगा। शहर का विकास भी सलीके से होगा और जो कीमत में असमान बढ़ोत्तरी दजऱ् की जा रही है, उस पर स्वत: रोक लग जाएगी।

जटीलता

मास्टर प्लान की जटीलता आम आदमी के समझ से परे होता हैं। एक आम इंसान के लिए यह संभव नहीं होता है कि वो मास्टर प्लान में तैयार हुए मोटे दस्तावेज़ या नक्शे के सभी पहलुओं को गौर से देखे और समझे। न तो संबन्धित अथॉरिटी या सरकार आम आदमी को समझाने के लिए कोई पहल करती है। इससे होता यह है कि प्लानर और आम लोगों के बीच कम्यूनिकेशन गैप हो जाता है, जो उस मास्टर प्लान को प्रभावित करता है। उसी समय मास्टर प्लान की सफलता पर संदेह उत्पन्न हो जाता है। जो लोग मास्टर प्लान को देखकर यह सोच बैठते हैं कि इसके लागू होने के बाद शहर की स्थिति ऐसी हो जाएगी पर होता नहीं है और तय समय के बाद भी स्थिति सिफर ही बनी रहती है।

शिकायत

आम शिकायत यह भी होती है कि एक बार जो मास्टर प्लान संबन्धित अथॉरिटी के द्वारा पास कर दिया जाता है, फिर उसको चेंज करना बहुत ही टेढ़ी खीर होता है। जो चेंज भी होता है वह बड़े लेवल पर और उसमें बड़े लोगों का नीजि स्वार्थ छिपा होता है। मास्टर प्लान में लैंड यूज चेंज होने के कई मामले सामने आए है पर उसका लाभ आम आदमी को न होकर कुछ अमीरों को हुआ है या एक विशेष वर्ग को।

समय

मास्टर प्लान बनने और पास होने में काफी समय लग जाता है। जानकार बताते हैं कि मास्टर प्लान बनने से कहीं ज्यादा समय इसको पास होने में लगता है क्योंकि इसके पास होने के लिए कई सरकारी तंत्र से होकर गुजरना होता है। इस मास्टर प्लान से जुड़े मंत्रालय, नेता, अधिकारी, लॉबिस्ट और इससे सबसे ज्यादा लाभान्वित होने वाले ग्रुप इसको अपने ढंग से मोडरेट करते है। एक अधिकारी ने अपना नाम न छापने के शर्त पर कहा कि जब तक मास्टर प्लान में संबन्धित लोगों का निजी हित नहीं सधता है तब तक उस मास्टर प्लान की मंजूरी नहीं दी जाती है। आम लोगों की राय यह भी है कि मास्टर प्लान कागज पर तो बहुत ही अच्छा दिखता है पर ज़मीनी धरातल पर इसका रिजल्ट बहुत कम देखने को मिलता है। देश तेजी से विकास कर रहा है इसमें कोई शक नहीं है पर आज भी ज्यादातर शहर बेतरीब ढंग से बसाया जा रहा है, न इसके लिए सरकार गंभीर है न संबन्धित एजेंसियां। इसका परिणाम अवैध कॉलनियों, बेतररीब निर्माण देखने को मिल रही हैं।

रास्ता क्या है?

मास्टर प्लान की अवधारणा हमने पश्चिमी देशों से अपनाया है, लेकिन जो बदलाव समय के साथ होनी चाहिए वह नहीं हो पाया है। आज भी यह पुराने ढर्रें पर चल रहा है। इसकी कार्यप्रणाली में बदलाव की ज़रूरत है। हमने पश्चिमी देशों से मास्टर प्लान के प्रोटो-टाइप को लिया पर यह नहीं समझा कि वो एक विकास शील देश है जबकि हम विकसित देश। वहां पर आज भी कायदे-कानून कड़ाई से पालन किए जाते हैं और जो प्लान को ईमानदारी से लागू किए जाते हैं। जबकि हमारे देश में ऐसा नहीं है।

बाधा और निदान

मास्टर प्लान में हस्तक्षेप नेताओं का होता है, जिनको इसके इस विषय में जानकारी नाम मात्र की होती है। इससे प्लान को लागू करने और उसको सही दिशा देने में बाधा आती है और एक अच्छा मास्टर प्लान भी सही से काम नहीं कर पाता है इससे एक प्लानर को सही मास्टर प्लान बनाने और लागू करने में काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। जो वह चाहता है वह नहीं कर पाता। सरकार और संबन्धित एजेंसी को चाहिए की मास्टर प्लान में पारदर्शिता लाएं और इसमें आम लोगों की राय को शामिल करें। अन्यथा मास्टर प्लान सिर्फ और सिर्फ भानुमती का पिटारा बन कर रह जाएगा।

LEAVE A REPLY