झिलमिल सितारों के आंगन के सपनों में कांटे कम नहीं….

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House, noney and document.
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   श्रीप्रकाश शर्मा

दुनिया में एक आशियाने की तलाश किसको नहीं होती है?  सिर पर एक घर की चाहत में इंसान अपनी तमाम उम्र गुजार देता है. इस सच से कदाचित ही किसी को इनकार हो कि सभ्यता के उदय काल से ही इन्सान के मूलभूत आवश्यकताओं में मकान एक अहम आवश्यकता के रूप में शुमार होता है. यहां तक कि एक घर की तलाश एक पक्षी को भी होती है, भले ही वह तिनका–तिनका जोड़ कर वह इसका निर्माण क्यों नहीं करती हो. 1990 के दशक के आर्थिक सुधार के उत्तर संक्रमण काल में जबकि वित्तीय क्षेत्र में कई अहम परिवर्तन हुए हैं तो घर के निर्माण से लेकर घर के क्रय तक का सफ़र बेहद आसान हो गया है. लेकिन जब प्रश्न इस देश के 27 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाले परिवारों का आता है तो परिस्थितियों में बहुत तब्दीलियां प्रतीत नहीं होती है. रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड्स और शहर के फूटपाथों पर या नीले चंदोबे के नीचे सर्दी की रात ठिठुरकर गुजारते गरीब परिवारों के लिए उनके सिर पर एक घर का सपना आज भी एक सपना ही रहा गया है और जो सरकारी व्यवस्था की नीतियों के आंकड़ों के झरोखों से मुंह चिढ़ाता प्रतीत होता है.फिर जिन तीन चौथाई आबादी के पास घर हैं भी तो इसमें एक कमरे और दो कमरे वाले घरों की बहुतायत है जो कुल मिलाकर यह इंगित करता है कि सम्पूर्ण आबादी को घर मुहैया कराने के  सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को अभी मीलों दूर जाना है और इसमें दशकों का वक्त लगना शेष है.

मूलभूत आवश्यकता आखिर सपना क्यों?

प्रश्न यह उठता है कि जबकि देश में आर्थिक सुधार के लगभग तीन दशक का एक लम्बा अरसा गुजरने वाला है तो फिर मानव की एक अहम मूलभूत आवश्यकता आज तक आबादी के लगभग तीन चौथाई  लोगों के लिए अब तक सपना क्यों बना हुआ है? इक्कीसवीं सदी में आज जबकि हम चन्द्रमा पर अपनी बस्ती बनाने की तैयारी को मुकम्मल स्वरुप दे रहे हैं और मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना की तलाश कर रहे हैं तो यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो उठता है कि इसी धरती पर ही गांवों तथा शहरों में असंगठित क्षेत्र में रहनेवाले अनियत श्रमिकों तथा बीपीएल परिवारों के अपने आशियानों के निर्माण का सपना आखिर कब तक पूरा हो पायेगा? इससे भी अधिक अहम प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि भारत सरीखे सामाजिक न्याय तथा लोककल्याणकारी राष्ट्र में आर्थिक समृद्धि के हासिये पर जीवन गुजारने वाले इन मुफलिसों के अपने घर के सपने पूरे होने में कौन-  सी समस्या एक यक्ष प्रश्न के रूप में खड़ा हो जाता है?

अर्थशास्त्र में मुद्रा और साख के चैप्टर को जब मैं विद्यार्थियों को पढ़ाता हूं तो उसमें कमर्शियल बैंक्स के फंक्शन का एक टॉपिक आता है. यह टॉपिक एक दिन जब बच्चों को पढ़ा रहा था तो मैंने बताना शुरू किया कि किसी भी वाणिज्यिक बैंक के दो ही मुख्य कार्य होते हैं – एक तो जनता के द्वारा जमा को स्वीकार करना और दूसरा जनता को विविध कार्यों के लिए उधार देना. जब उन्हें मैं यह बताता हूं कि सरकार के ये व्यावसायिक बैंक्स जनता को गृह निर्माण के लिए अर्थात होम लोन भी देती है तो जो प्रश्न बार – बार बच्चों की तरफ से आता है वह यह है कि यदि ये कमर्शियल बैंक जरुरतमंदों को होम लोन देती है तो आज भी गांवों और शहरों में निवास करनेवाली लगभग आधी से भी अधिक आबादी के पास अपने घर नहीं हैं, वे या तो बाहर आकाश के नीचे सोते हैं या फिर कई पारिवारिक तथा सामाजिक परिवर्जानाओं के बावजूद एक ही कमरे में जानवरों की तरह रात गुजर जाने का इंतजार करते हैं. बच्चों के इस तरह की फीडबैक पर मैं रियेक्ट नहीं कर पाता हूं. भारत की तक़रीबन  129 करोड़ आबादी में प्रायः एक तिहाई आबादी जो कि गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन गुजर बसर कर रही है उनके लिए आज भी एक घर की किल्लत हमारे लिए एक आत्ममीमांसा का विषय है. मौजूदा लेख में हम उन सभी बिन्दुओं पर विचार करेंगे जो कि देश में गृह निर्माण तथा सभी जरुरतमंदों को घर दिलाने की राह में अवरोध साबित हो रहा है –

होम लोन

जब बैंकों के द्वारा होम लोन देने का सवाल उठता है तो बैंक की अन्य औपचारिकताओं के अतिरिक्त सबसे बड़ा प्रश्न सिक्यूरिटी या जिसे कि कोलैटरल कहते हैं, का उठता है. आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में हासिये पर रहने वाले परिवारों के लिए बैंक के पास कोलैटरल रखने सरीखे शर्तों को पूरा करना एक गंभीर समस्या है जो कि दीर्घकाल में एक बड़े आर्थिक संकट का स्वरुप ले लेता है. इस स्तर पर एक प्रासंगिक प्रश्न यह उठता है कि बैंक से लोन लेने के लिए  उनके पास गिरवी रखने के लिए यदि सम्पति होती ही तो वे बैंक के पास क्यों आते?  1960 के दशक के हरित क्रांति के सफल राज्यों में पंजाब और हरियाणा का नाम अव्वल आता है. यहाँ पर किसानों को बैंकों के द्वारा प्रदान किये गये कृषि ऋण का अनुपात देश के तथाकथित बीमारो (बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा) राज्यों की तुलना में कई गुने अधिक हैं. इस तरह के विषमता का उत्तर बहुत ही पारदर्शी है. कमर्शियल बैंक्स इन समृद्ध किसानों को लोन देने में जरा भी आना-कानी नहीं करते. यही कारण है कि जब यूपीए की गवर्नमेंट ने अपने शासन काल में किसानों के हजारों करोड़ रूपये के कृषि ऋण को माफ़ कर दिए तो सामाजिक वैज्ञानिकों का यह मानना था कि सरकार के इस निर्णय से सामाजिक विषमता और भी बदतर होगी और और अंतर्राज्यीय निर्धनता का ग्राफ और भी ऊपर जायेगा. कारण और तर्क स्पष्ट था कि सरकार के द्वारा माफ किये गये लोन में सर्वाधिक ऋण लेनेवाले लोग इन्हीं समृद्ध राज्यों से हैं और इस प्रकार की सरकारी नीति के कारण आर्थिक रूप से सम्पन्न ये किसान और भी सम्पन्न होंगे और पूंजी के अभाव में कृषि कार्य नहीं कर पा सकने वाले गरीब किसान की आर्थिक स्थिति और भी बदतर होती जाएगी. कहने की आवश्यकता नहीं होगी कि देश के मुख्तलिफ हिस्सों में किसानों के द्वारा ख़ुदकुशी की बढ़ती वारदातों के पीछे उसी सामाजिक और आर्थिक विषमता का वीभत्स चेहरा साफ-साफ नजर आता है.

ग्रामीणों क्षेत्रों में आवास की समस्या

इसके अतिरिक्त ग्रामीणों क्षेत्रों में जहां की देश की आबादी का लगभग  75 फ़ीसदी हिस्सा निवास करती है वहां पर आवास की समस्या प्रतिवर्ष और भी गंभीर होती जा रही है. अशिक्षा और अज्ञानता से जनित बढ़ते प्रजनन दर की समस्या ने इन क्षेत्रों में आवास की समस्या में और भी वृद्धि कर दी है. वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों का तेजी से शहरीकरण होने के कारण भी हाउसिंग प्रॉब्लम और भी तीव्र होता जा रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों का शहर की तरफ पलायन ने जहाँ गांवों में इस समस्या में थोड़ी-सी ढील दी है वहीँ शहरों में यह समस्या और भी गंभीर होती जा रही है.औपचारिक क्षेत्र में डाक्यूमेंट्स फॉर्मेलिटी के साथ मार्जिनल रिक्वायरमेंट हाउस कंस्ट्रक्शन और लोन फैसिलिटी के लिए आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. वैसे नयी आर्थिक नीति के फलस्वरूप उदारीकरण की प्रक्रिया के तहत जिस प्रकार माइक्रोक्रोफिनान्सिंग के रूप में सेल्फ-हेल्प ग्रुप जैसे वित्तीय संस्थाओं का उदय हुआ है उसके कारण ग्रामीण क्षेत्र के ऋण उपलब्धता की समस्या के समाधान में बड़ी सहायता मिली है और बैंकों पर ऐसे असहाय लोगों को कर्ज देने के दबाव में भी काफी कमी आई है. उन्हन्हें घर न दिए जाने के भारत के एक गांव में आर्थिक समस्याओं के दृश्य को इन दो उदाहरणों में बखूबी पढ़ी जा सकती  है.

एक हकीकत ये भी

एक बूढी माँ तथा उसके तीन जबान बेटे. माँ की आँखों में रौशनी नहीं रही और बेटे की ऑंखें खुद की रौशनी की तलाश में पथरा गईं. मुश्किल से एक-डेढ़ बीघे का खेत, जो कि पूंजी के अभाव में प्रायः खाली रहता है. तीनों बेटे अपने खेतों पर कृषि का कार्य करने के साथ-साथ अपने गांव में ही अतिरिक्त छोटे-मोटे काम–धंधे करके अपने तथा अपनी बूढी माँ का पेट पालते हैं. एक बहन जो कि शादी के उम्र के लायक है, भविष्य के अँधेरे में आशा की किरण तलाश कर थक – हार बैठ गयी, और गांव के प्राथमिक स्कूल की कक्षा से आगे पढ़ाई नहीं कर पाई. गांव में एक छोटा-सा फूस का घर जिसके दालान पूरी तरह से झुके हुए हैं और घर के लोग बिना झुके घर के अन्दर नहीं जा सकते. बरसात में घर के अन्दर और बाहर पानी बराबर रूप से गिरता रहता है. कुछ महीने पूर्व ही उस बूढी माँ के तीनों बेटे रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर  पास के मेट्रोपोलिटन नगर चले गये. अब अपनी जबान बेटी के साथ वह बूढी तथा लाचार माँ अपने जीवन के अंतिम दिन रो-धोकर गुजार रही है. इस गांव के लिए और इस इसमें रहनेवाले इस गरीब परिवार के लिए हाउस लोन और उसके अभाव में घर पाने और बनाने के सपने की सम्भावनाओं के बारे में कल्पना करने के लिए किसी व्यक्ति को किसी बड़ी प्रोफेशनल डिग्री की तनिक भी आवश्यकता नहीं होगी.

शहर से बिलकुल करीब का गांव. बिजली के तार हर घर के सामने गड़े पोल में बंधे हुए हैं. हज़ारों की आबादी वाले इस गांव में प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च विद्यालय हैं. शाम के वक्त बच्चे लालटेन में या मिटटी के बने ढिबरी की रौशनी में अपनी किताबें खोलकर बैठ जाते हैं. हवा के झोंकों से ढिबरी की रौशनी बार-बार बुझती है और बच्चे उतनी बार उसे फिर जला उठते हैं. गर्मी की चिलचिलाती धूप तथा उमस की रात में भी बिजली नही आती. तार के पंखों से आती हवा में जीवन के दर्द का शमन किया जाता है.

माँ अक्सर फ़ोन करती है, “बेटा, दिल्ली गये हुए तुम्हारे तीन वर्ष हो गये हैं, कम से कम इस बार छठ के अवसर पर तो घर आ जाओ”. बेटा कहता है, “माँ ! मैं तो हमेशा गांव आकर तुमसे मिलना चाहता हूँ, लेकिन क्या करूँ, तुम्हारी बहू राजनंदिनी बिलकुल नहीं आना चाहती है. वह कहती है कि गांव में पक्के घर नहीं है, घास-फूस के घर हैं वहां, अच्छे क्वालिटी के टॉयलेट्स भी नहीं हैं गांव में बिजली रहती नहीं है, घर में कमरे छोटे – छोटे हैं और वहां पर मेरा दम घूंटता है. आसपास बड़ी गन्दगी फैली रहती है, कहीं बाहर निकलो तो सिर पर पल्लू लो, दिन भर किसी गुड़िया की भांति अपने आप में सिमट कर रहना मुझे बोरिंग तथा नाटकीय लगता है. बेटा है, वह कहता है कि पापा मैं गांव नहीं जाऊंगा, गर्मियों में फ्रीज़ का ठंडा पानी पीने को नहीं मिलता है, टीवी पर कार्टून देखे बिना मैं अपना वक्त नहीं गुजार सकता. अब तुम्हीं बताओं माँ मैं क्या करूँ?”

उपर्युक्त कथनों को पढ़कर क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि ये सभी बातें गोया हमारे खुद के जीवन की हों तथा हम और आप ही उस कहानी के असली पात्र हैं? फिर आपको ऐसा भी नहीं लगता है कि उपर्युक्त दृश्य हमारे अपने पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के वैसे मौजूं हैं जिनसे हमारा प्रति दिन वास्ता पड़ता है? हमारे देश की ही आबादी के ये निरादृत और वर्षों से आर्थिक और सामाजिक विद्रूपता के शिकार गरीब परिवारों के लिए आखिर एक घर का सपना एक मूलभूत आवश्यकता न होकर एक विलासिता की आवश्यकता बनकर क्यों रह गया है?

निश्चित आय का अभाव

बैंकों से कर्ज की अदायगी के लिए एक निश्चित आय का अभाव भी इस दिशा में एक बहुत बड़े अवरोध का कार्य करता है. कहते हैं कि किसान के पास कैश का सीधा सम्बन्ध कृषि से जुड़ा हुआ है और कृषि अब पूंजी आधारित तकनीक में तब्दील हो चुका है. पूंजी का अभाव ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और व्यक्ति की आर्थिक बदहाली का कारण और परिणाम दोनों है. एक ग्रामीण किसान इसीलिए निर्धन है क्योंकि उसके पास पूंजी नहीं है और उसके पास पूंजी का अभाव इसीलिए है कि वह गरीब है. ऐसी दशा में कोई भी बैंक इस तरह की आय अनिश्चितता वाले ऋण के इच्छुक लोगों को न तो कर्ज देती  और न ही उन्हें इस कर्ज की अर्हता के लायक समझती है. समाजवादी लोक कल्याणकारी राज्य की विशेषता वाले देश भारत में राष्ट्रीय स्तर पर चलाए गये कार्यक्रमों में इंदिरा आवास योजना ने इस दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किये हैं लेकिन वह लाभुकों की संख्या की विशालता को ध्यान में रखते हुए नाकाफी प्रतीत होता है. समाज के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के गृहनिर्माण के लिए केंद्रीय सरकार के द्वारा प्रदान की गयी आर्थिक सहायता ने भी इस दिशा में अहम भूमिका निभायी है. किन्तु इस देश के हर व्यक्ति को एक घर देने का महत्वाकांक्षी सपना तभी पूरा हो पायेगा जबकि ग्रामीण क्षेत्र बैंक और सहकारी समितियां इसके लिए उदारता नहीं दिखाती हैं. इस सच से कदाचित ही कोई इनकार कर पाए कि सरकारी बैंकों के प्रतिवर्ष बढ़ते नॉन-परफोर्मिंग एसेट्स के रूप में लाखों करोड़ रूपये के नुकसान के लिहाज से गृह निर्माण के लोन की सुविधा प्रदान करने के कार्य में व्यावसायिक बैंकों के द्वारा  बरती गयी सावधानियां बेवजह नहीं है और ना ही पक्षपातपूर्ण है. निजी क्षेत्र के बैंकों की भी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं और वो भी कई मजबूरियों से घिरकर काम करते हैं उनके मोरल ड्यूटी के घेरे में भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक रूप से विपन्न लोगों को कर्ज नहीं देने का प्रश्न कई मायनों में बेवजह नहीं है. दुविधा और दुर्दशा की ऐसी परिस्थिति में आखिर में एक प्रश्न अपनी विकरालता के साथ उठ खड़ा होता है कि हर व्यक्ति के सिर पर एक आशियाने के सपनों के साकार होने की काली रात की आखिर वह सुबह कब आएगी?

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