मकान है बुढ़ापे की पूंजी  

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 नरेन्द्र देवांगन, खरोरा, जि़ला रायपुर (छ.ग.)

बदलते वक्त के साथ सब कुछ बदल रहा है। सामाजिक और इकॉनोमिक ढांचा भी काफी हद तक बदल गया है। परिवारिक मूल्य के स्वरूप पर भी इसका प्रभाव पड़ चुका है। इसके कॉन्सेप्ट पर बदलते वक्त हावी है। देखा जाय तो संयुक्त परिवार का प्रचलन धीरे-धीरे कम होता जा है। न्यूक्लिर फैमली का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में वर्तमान के साथ भविष्य के बारे में नहीं सोचना बुद्धिमानी का काम नहीं है। इकॉनोमी स्थिति वर्तमान में कितनी भी बेहतर क्यों नहीं हो लेकिन बढ़ती महंगाई के असर से आप बच नहीं सकते हैं। जब बात ऐसी हो तो बुढ़ापे को लेकर सोचना लाज़मी है। यदि समय रहते जो पूंजी एकत्र की जा रही है, उससे बेहतर लोकेशन पर ज़मीन-जायदाद (प्रॉपर्टी) खरीद ली जाए तो यह आपके बुढ़ापे का सहारा बन सकती है।

जीवन है तो बुढ़ापा भी

जीवन है तो बुढ़ापा भी निश्चित है। जीवन के अंतिम दिनों यानी बुढ़ापे के लिए कई लोग अपनी नौकरी के कार्यकाल में कुछ पूंजी जमा कर लेते हैं ताकि जीवन के आखिरी दिन बिना किसी चिंता के बेहतर तरीके से गुजार सके। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि समय रहते जो पूंजी एकत्र की जा रही है, उससे बेहतर लोकेशन पर ज़मीन-जायदाद (प्रॉपर्टी) खरीद ली जाए तो यह आपके बुढ़ापे का सहारा बन सकती है। अब बैंक भी ऐसे समय में लोन की सहायता देने लगे हैं। इससे आपका बुढ़ापा आसानी से परिवार के साथ हंसी-खुशी बीत जाएगा। बैंकों में ऋण देने के लिए कई तरह की योजनाएं चल रही हैं। बैंक मकान खरीदने, बनवाने से लेकर बुढ़ापे के दिनों में नकदी की ज़रूरत पडऩे पर भी मदद करते हैं। बैंक होम लोन के अलावा मकान रेहन रखकर एक निश्चित राशि (मकान का आकलन करके) प्रत्येक माह देता है। इसके लिए स्वयं के नाम का मकान और प्रॉपर्टी संबन्धी डॉक्यूमेंट होना ज़रूरी है।

बदलाव का दर्द

सामाजिक ताना-बाना में प्राय: यह देखा जाता है कि व्यक्ति सर्विस से रिटायर्ड हो गया और उसकी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, शादी-विवाह या सामाजिक कार्यों में खर्च हो गई। कतिपय कारणों से आमदनी के सारे रास्ते बंद हो गए और कहीं से पैसे मिलने की संभावना भी नहीं है। संपत्ति के रूप में व्यक्ति के पास सिर्फ मकान ही बचा है, जो उसके नाम है। ऐसी स्थिति में मकान रेहन रखकर भी बैंक से पैसा प्राप्त किया जा सकता है। सामाजिक बिखराव एवं आधुनिकता की तेज़ दौड़ में शामिल युवाओं की बदलती मानसिकता के चलते अधिकांश वृद्धजनों को इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना आम हो चला है। ऐसे लोगों के लिए बैंक से मासिक किस्त में पैसा मिलता है। ज़रूरतमंद को अपने ज़रूरी डॉक्यूमेंट लेकर बैंक तक पहुंचने की ज़रूरत है।

जानकारी का अभाव

समय के बदलाव के साथ बैंकों ने ऐसे लोगों के लिए जो प्रोडक्ट लॉन्च किए हैं, उसे साधारण रिवर्स मार्गेज नाम से जाना जाता है। बैंकर्स कहते हैं कि इस तरह की स्कीमों की ज्यादातर लोगों को जानकारी नहीं होती। लोग बैंकों या कॉल सेंटरों से जानकारी नहीं लेते। इसलिए योजनाएं लॉन्च होने के बाद भी ज्यादा पॉपुलर नहीं हो पातीं। रिवर्स मार्गेज लोन के तहत अपने घर की लंबे समय तक एक निश्चित मासिक आय प्राप्त होती है। बैंकों ने योजना का ज्यादा से ज्यादा लाभ देने के लिए बीमा कंपनियों से भी हाथ मिला लिया है। बीमा कंपनियां ग्राहकों को निश्चित राशि का भुगतान करती हैं। जहां तक मकान के बंधक या रेहन रखने का सवाल है तो बैंकर्स भी इस बात को मानते हैं कि ज्यादातर लोग (बुढ़ापे में भी) अपने मकान को गिरवी रखने से डरते हैं। वे अपनी आर्थिक ज़रूरत को किसी भी तरह पूरी करके समय पास करने की मंशा रखते हैं।

होम लोन

बैंकिंग क्षेत्र में कर्ज लेने की बात आती है तो सबसे ज्यादा होम लोन का ही चलन है। ज्यादातर ग्राहक व्हीकल, एजुकेशन के अलावा होम लोन ही लेने का प्रयास करते हैं। होम लोन और रिवर्स मार्गेज लोन में अंतर है। होम लोन उन परिस्थितियों में लिया जाता है जब आपका स्वयं के प्लॉट पर मकान बनवाना हो या तैयार मकान खरीदना हो। ऐसी संपत्ति पर बैंक आपसे कुछ ज़रूरी कागज़ात लेकर और प्रॉपर्टी के कागज़ात गिरवी रखकर एक निश्चित अवधि के लिए ऋण प्रदान कर देते हैं। ऋण पर मासिक किस्त(ईएमआई) कितनी आएगी इसका आंकलन करके बता दिया जाता है। होम लोन के लिए ऋण देते समय बैंक एक साल के एडवांस चेक भी ले लेते हैं। दूसरी ओर रिवर्स मार्गेज लोन में मकान को बंधक रखकर उस मकान की कीमत का आकलन कर आपको मासिक किस्त अदा की जाती है। ऐसा करके बैंक एक तरह से मकान मालिक की भूमिका में आ जाता है। नियमानुसार जब बैंक आपके मकान को बंधक रख लेता है तो उस मकान का सौदा किसी अन्य व्यक्ति से नहीं किया जा सकता और यदि पारिवारिक कारणों से मकान का सौदा करना ज़रूरी हो जाता है तो पहले बैंक द्वारा दिए गए ऋण की भरपाई ब्याज देकर करनी पड़ती है। बंधक मकान का सौदा गलत तरीके से करने पर क्रेता और विक्रेता के लिए बड़ी परेशानी सामने आ सकती है।

मृत्यु के बाद क्या?

यदि मकान पति-पत्नी के संयुक्त नाम से है और दोनों की मृत्यु हो जाती है तो भी बैंक अपनी उधारी की चिंता नहीं करता। ऐसी परिस्थिति में बैंक के पास ऑप्शन है। बैंक ऐसी संपत्ति को बेचकर या नीलाम करके दिए गए ऋण की भरपाई कर लेगा। इसके लिए बैंक पहले घर के सदस्यों को मकान के लिए प्राथमिकता देगा। यदि पारिवारिक सदस्य आगे नहीं आते तो बैंक किसी को भी बंधक मकान बेच सकता है। यदि मकान का बीमा है तो बीमा कंपनी बची हुई राशि बैंक को वापस कर देगी। बैंक इस राशि का उपयोग कर्ज समाप्त होने की प्रक्रिया के तहत करता है और बची हुई रकम संपत्ति बेचकर भी प्राप्त कर लेता है। बैंकिंग सेक्टर से जुड़े जानकारों का कहना है कि बैंक दिए गए कर्ज को व्यक्ति के जीवन या मृत्युपरांत भी पैसा वापस ले लेता है, क्योंकि प्रॉपर्टी संबन्धी सभी ओरिजनल डॉक्यूमेंट बैंक में जमा रहते हैं।

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