रेंट कंट्रोल एक्ट

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C   Kumar

प्रॉपर्टी बाजार की मनमानी को रोकने के लिए रेंट कंट्रोल एक्ट बनाया गया था। इस प्रावधान से प्रॉपर्टी मालिकों को फायदा कम नुकसान ज्यादा लगने लगा। इसकी काट भी खोज डाली। प्रॉपर्टी ऑनर्स प्रॉपर्टी को लीज या किराये पर देने के लिए समय सीमा को हथियार बनाया। रेंट कंट्रोल एक्ट सिर्फ उन्हीं लीज एग्रीमेंट पर लागू होता है जो न्यूनतम 12 माह के लिए हो। इस नियम की आड़ में देशभर में लीज एग्रीमेंट 11 माह का किया जा रहा है जिसे लीज एंड लाइसेंस एग्रीमेंट कहती हैं।

जिम्मेदारी

प्रॉपर्टी रख रखाव की जिम्मेवारी किसकी होगी। प्रॉपर्टी मालिक या किरायेदार। यह सवाल देशभर के हर एक प्रॉपर्टी सेक्टर में ज्वलंत मामला है। आसान रास्ता तो दोनों के बीच आपसी तालमेल है। बेहतर होगा कि लीज एग्रीमेंट के समय ही इस प्वाइंट को स्पष्ट कर लेना फायदेमंद है। हालांकि इसके लिए कानूनी प्रावधान भी है। केंद्र सरकार के किराया कानून के साथ-साथ राज्यों के अपने भी प्रावधान है। रेंट कंट्रोल एक्ट में प्रॉपर्टी को देने की अवधि से लेकर अन्य बातों को बताया गया है। रेंट कंट्रोल एक्ट में प्रॉपर्टी को अच्छी हालत में रखने की जिम्मेवारी प्रोपर्टी के मालिक की है। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि दी जाने वाली प्रॉपर्टी बेहतर हालत में है। अगर ऐसा नहीं है तो उसे लीज करने के पहले उसकी मरम्मत करानी होगी। अगर किरायेदार या लीज होल्डर को लगे कि मरम्मत की पुन: ज़रूरत है तो वह प्रॉपर्टी मालिक को नोटिस दे सकता है। अगर नोटिस की निश्चित अवधि में प्रॉपर्टी मालिक मरम्मत नहीं कराता है तो किरायेदार अथवा लीजधारक उसकी मरम्मत कराकर खर्च को किराये में एडजस्ट कर सकता है। दूसरी तरफ अगर किरायेदार प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाता है तो मालिक उसे नोटिस देकर मरम्मत के लिए कहने का अधिकार रखता है। सवाल रिपेयर कास्ट का है। किरायेदार खर्च में मनमानी नहीं कर सकता है। यह खर्च सालभर के किराये के 50 फीसदी से ज्यादा का नहीं होना चाहिये। रिपेयर उसी जगह का होना चाहिये जिसके बिना प्रॉपर्टी का उपयोग नहीं हो रहा हो। प्रॉपर्टी के नक्शे में बदलाव नहीं किया जा सकता है। अगर किरायेदार प्रॉपर्टी मालिक की सहमति के बिना स्वरूप बदलना है तो वह गैरकानूनी होगा। इस खर्च की जिम्मेवारी भी मालिक की नहीं होगी। अगर मालिक जानबूझकर रिपेयर नहीं करता है तो ऐसी स्थिति में किरायेदार अथवा लीजधारक किराया कानून के तहत रेंट आथोरिटी के पास आवेदन देकर अनुमति ले। इसके लिए उसे अनुमानित खर्च विवरण भी देना होगा। प्रोपर्टी मालिक भी किरायेदार को नोटिस के बावजूद मरम्मत न कराने पर अपील दायर कर सकता है। कंट्रोलर प्रॉपर्टी मालिक को अपना पक्ष रखने का मौका देता है। वह किरायेदार को खर्च की एक सीमा के अंदर मरम्मत की अनुमति देता है। अगर किरायेदार शेष राशि भी बर्दास्त कर सकता है तो वह ज्यादा भी खर्च कर सकता है। तब ज्यादा खर्च को किराये में एडजस्ट नहीं किया जा सकता है।

मनमानी को रोकने के लिए रेंट कंट्रोल एक्ट

प्रॉपर्टी बाजार की मनमानी को रोकने के लिए रेंट कंट्रोल एक्ट बनाया गया था। इस प्रावधान से प्रॉपर्टी मालिकों को फायदा कम नुकसान ज्यादा लगने लगा। इसकी काट भी खोज डाली। प्रॉपर्टी ऑनर प्रॉपर्टी को लीज या किराये पर देने के लिए समय सीमा को हथियार बनाया। रेंट कंट्रोल एक्ट सिर्फ उन्हीं लीज एग्रीमेंट पर लागू होता है जो न्यूनतम 12 माह के लिए हो। इस नियम की आड़ में देशभर में लीज एग्रीमेंट 11 माह का किया जा रहा है जिसे लीज एंड लाइसेंस एग्रीमेंट कहती हैं। किरायेदार को मात्र 11 माह तक ही संबन्धित प्रॉपर्टी के इस्तेमाल की इज़ाज़त होती है। लीज एग्रीमेंट के तहत किरायेदार ट्रांसफर आफ इंडरेस्ट का अधिकारी होता है। जबकि लीज एंड लाइसेंस के तहत उसे सिर्फ प्रॉपर्टी इस्तेमाल की अनुमति मिलती है। ऐसे में रेंट कंट्रोल एक्ट के प्रावधान दोनों पर ही लागू नहीं हो पाते।

 

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