कांग्रेस का अवसान…

    0
    56
    rahul-gandhi

    मंजीत ठाकुर 

    धराशायी होना एक शब्द है और इसका अगर मौजूदा परिप्रेक्ष्य में एक राजनीतिक अर्थ खोजा जाए, तो इस शब्द को चरितार्थ किया है, कांग्रेस और राहुल गांधी ने। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चार में हार कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है। इस साल उत्तराखंड और मणिपुर में उसे अपनी सरकार गंवानी पड़ी है तो 403 विधानसभा वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में उसके हाथ महज 7 सीटें आईं। एक के बाद एक लगातार हार से कांग्रेस नेताओं का धैर्य भी चुकने लगा है। कांग्रेसी भले राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर चुप हों, लेकिन वक्त आ गया ह कि सवाल उठाए जाएं।

    राहुल गांधी 2013 में कांग्रेस के उपाध्यक्ष बने, तब से लेकर आजतक वह 24 चुनाव हार चुके हैं। जब वह उपाध्यक्ष बने थे तब देश में 13 राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन आज स्थिति ये है कि पार्टी न तो लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल बन पाई, और अधिकतर राज्यों में पार्टी सत्ता से बाहर हो चुकी है।

    सियासी पार्टियों का अंत कैसे होता है? इसे समझने के लिए लंबे समय से धीरे-धीरे अंत की ओर बढ़ रही कांग्रेस पर निगाह डालने की जरूरत है। 1885 में स्थापित कांग्रेस आजादी के बाद से अभी तक महज तीन बार ही सत्ता से बाहर रही है। लेकिन, मौजूदा परिस्थितियों से साफ है कि यह पार्टी खत्म भले न हो, लेकिन राष्ट्रीय शक्ति के तौर निष्क्रिय जरूर हो रही है। कांग्रेस के पास अपने बुनियादी जनाधार वाले वोटरों के लिए के लिए भी स्पष्ट राजनीतिक संदेश नहीं है।

    2009 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस 2004 के मुकाबले और ज्यादा मजबूत होकर सामने आई तो उसका ज्यादातर श्रेय राहुल गांधी को ही दिया गया। खासकर यूपी में कांग्रेस को 21 सीटें मिलीं तो प्रचारित किया गया कि यह राहुल गांधी का ही करिश्मा है। इसके बाद मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल का जब भी विस्तार हुआ, राहुल गांधी के मंत्री बनने के कयास लगाए गए। 2013 में तो खुद प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने यह कह दिया कि वो राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं। लेकिन उसी वक्त से पासा पलटना शुरू हो गया कांग्रेस के खाते में हार के बाद हार लिखी जाने लगी।

    2012 में कांग्रेस चार राज्यों में हारी। यूपी में महज 28 सीटें कांग्रेस जीत पाई तो पंजाब और गुजरात में सत्ता में वापसी की उम्मीद धूल-धूसरित हुई। गोवा भी हाथ से फिसल गया।

    2013 में कांग्रेस को त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कारारी हार मिली। मिजोरम और मेघालय को छोड़ दिया जाए तो उसके लिए खुशखबरी महज कर्नाटक से आई।

    2014 के लोकसभा चुनावों में तय था कि कांग्रेस हारेगी, लेकिन महज 44 सीट तक सिमट जाना हैरतअंगेज रिजल्ट था। फिर हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू-कश्मीर में भी उसकी करारी हार हुई। 2015 में उसे असली झटका दिल्ली में मिला जहां उसे एक भी सीट नहीं मिली। 2016 भी कांग्रेस के लिए कोई अच्छी खबर लेकर नहीं आया। इस साल उसके हाथ से असम जैसा बड़ा राज्य चला गया। केरल में भी उसकी गठबंधन सरकार हार गई जबकि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद उसका सूपड़ा साफ हो गया। हालांकि पुड्डुचेरी में उसकी सरकार बनी।

    कांग्रेस का यह हश्र उसकी अपनी विचारधारा से विचलन की वजह से भी मानी जा सकती है। सेकुलर होने के एकमात्र गुणधर्म के अलावा राजीव गांधी के समय से ही कांग्रेस के पास कोई और बड़ा अजेंडा नहीं है और यही वजह है कि उसके जनादेश में धीरे-धीरे क्षरण आता गया है।

    उत्तर भारत के बड़े हिस्से में वह स्थायी तौर पर विपक्ष में है। गुजरात में उसने तीन दशक से एक भी चुनाव नहीं जीता है। कई दूसरे बड़े राज्यों में, जहां बीजपी सत्ता में है या विपक्ष में है, वहां कांग्रेस चौथे या पांचवें स्थान पर है, यानी अप्रासंगिक है। वह जितना सोच रही है, उससे कहीं ज्यादा तेजी से दक्षिण में बीजेपी के हाथों अपनी जमीन हार रही है और हिंदुत्व तमिलनाडु और केरल में अनवरत आगे बढ़ रहा है।

    कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ने काफी पहले इस पार्टी का अंत होते देख लिया था। उनमें से कुछ ने सफलतापूर्वक पार्टी को अपने कब्जे में लेकर अपनी जेबी पार्टियां खड़ी कर लीं। मिसाल के तौर पर, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी। हालांकि, शरद पवार जैसे दूसरे नेता भी थे लेकिन वे कम कामयाब रहे। फिर भी, उनके पास अपनी पार्टी का कांग्रेस में फिर से विलय का सवाल भी नहीं उठता।

    हाल के स्थानीय निकाय चुनाव में महाराष्ट्र में कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई है, उसका कारण उम्मीदवारों को पार्टी की तरफ से वित्तीय सहायता नहीं देना है। यह एक खतरनाक संकेत है। कांग्रेस के पास राहुल गांधी या थोड़ी देर के लिए मान लें तो प्रियंका वाड्रा के अलावा कोई और चेहरा जनता के सामने पेश करने के लिए नहीं है। एक ही परिवार कितने दिनों तक करिश्मा दिखा पाएगी, यह बात सवालों के घेरे में है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के तौर पर योगी आदित्यनाथ को आगे करके बीजेपी ने दूसरी पीढ़ी के नेताओं और संभवतया 2024 में केन्द्र में बीजेपी के अगले उम्मीदवारो को तैयाक करना शुरू कर दिया है।

    कांग्रेस अभी भी सकते में है, और अभी रहेगी। कांग्रेस को राहुल गांधी से आगे सोचने की ज़रूरत है, इस काम में जितनी जल्दी वह करेगी, उतना जल्दी रिकवर कर पाएगी।

    LEAVE A REPLY