ट्रैफिक जाम, हर काम तमाम …..

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    जावेद अख्तर साहब ने एक गाना लिखा…घर से निकलते ही कुछ देर चलते ही…रास्ते में है …उसका घर।यह तो फिल्मी गाने के हिसाब में घर ठीक बैठ जाता है लेकिन महानगर और उसके आस-पास के इलाके में रहने वाले से पूछिए तो इसे गाने को अपने रोजमर्रा से यों जोड़ेंगे और कहते हुए गाएंगे कि घर से निकलते ही और कुछ देर चलते ही…रास्ते में मिलता हैं ट्रैफिक जाम। यहां की जिन्दगी को तहस-नहस  दिया है इस जाम ने। यह समस्या तेजी से महामारी  का रूप ले चुकी है।

    इस जाम में फंसे किसी से भी पूछिए तो हाल बयां न करके आपको बताएंगे कि यह तो रोज़ का चिल्लम पों है। इससे बचने के लिए आप कितनी ही भूगोल बुद्धि लगा लो लेकिन इसके सामने सब बेकार है। जबकि सरकार इस समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए काफी हद तक सार्थक प्रयास कर रही है लेकिन ये समस्या है ऐसी की ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही है। हालात कितने बदतर हो गए हैं। यह जाम कभी-कभी किलोमीटर तक होते हैं और छोटी-छोटी दूरियों को तय करने में घंटों लग जाते हैं। चलिए इस ट्रैफिक जाम के बारे में कुछ ऐसी बात भी बताते हैं, जिसे हमें, आपको और सरकार को समझना बहुत ज़रूरी है।

    एक स्टडी में बताया गया है – द न्यूज़ीलैंड हैरल्ड रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है …जब कोई ट्रैफिक जाम में फंसता है तब से लेकर एक घंटे तक उसे दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। रिपोर्ट बताती है कि गाड़ी से निकलनेवाला धुआं, शोर-शराबा से उपजे तनाव.. दौरे का खतरा अचानक बढ़ा देता है।

    जहर…इसके भी कई रूप हैं। लेकिन ट्रैफिक जाम में फंसे होने पर जो जहर हवा में घुलता है, वो है सबसे ख़तरनाक। ज़्यादातर गाड़ियों से निकलनेवाले धुएँ में नाइट्रोजन ऑक्साइड और कैंसर पैदा करनेवाले कुछ पदार्थ होते हैं। कई गाड़ियाँ, खासकर वे जो डीज़ल इंजन से चलती हैं, धुएं के साथ बड़ी तादाद में छोटे-छोटे कण हवा में छोड़ती हैं। ये लोगों की सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा बने हुए हैं। अंदाज़ा लगाया गया है कि हर साल, करीब 30 लाख लोग प्रदूषित हवा से मर रहे हैं जो ज़्यादातर, गाड़ियों से निकलती है।

    इस मामले में सबसे ऊपर जो स्थान रखता है वो है दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में ट्रैफिक जाम की समस्या नेशनल ख़बर तक बनती रही है। हिसाब-किताब इससे इतना ख़राब है कि प्रत्येक साल सिर्फ दिल्ली को 60,000 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। आईआईटी मद्रास की रिपोर्ट बताती है कि ट्रैफिक जाम की यही समस्या बरकरार रही तो 2030 तक यह हानि करीब 98,000 करोड़ के पास पहुंच सकती है।

    यह हालत तब है जबकि यहां पर इन सालों में कई फ्लाईओवर और एलिवेटेड रोड का निर्माण किया गया है। और लगभग सभी जगहों पर मेट्रो अपनी पहुंच बना चुकी है। यहां के ट्रैफिक जाम के हालात बद से बदतर तब हो जाते हैं जब पीक ऑवर होता है। जिसे 9-10 बजे सुबह और रात के 9-10 बजे के बीच माना जाता है। खासकर, आप जब दिल्ली से बाहर नोएडा, गाज़ियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव की तरफ रुख करते हैं। तो आप मानकर चलिए कि आपको कहीं न कहीं जाम से सामना, सच के सामने जैसा करना होगा।

    दिक्कत तो इस बात है कि इस समस्या का निदान को लेकर कई उपाय तो किए जा रहे हैं लेकिन हल्की सी वर्षा भी इस उपाय को नकाफी साबित कर देती है।  इस समस्या को भले ही आप तरक्की की ग्राफ को जूम आउट मान लें लेकिन इसके जूम इन खतरनाक है। गाड़ियों की बढ़ती संख्या हमारे समृद्धि को दर्शाता है या कुछ और। इसके अपने-अपने तर्क हो सकते हैं…चाहे आप ओड नंबर या इवन नंबर का हिसाब लगा लो लेकिन इस हिसाब का किताब सही सरकारी रणनीति में ही संभव है। जो रोडमैप तैयार करके और ट्रैफिक जाम के मुख्य कारणों को जान लेने से ही ख़त्म हो सकते हैं।

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